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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » द इंडियन ट्राइबल / उप्लाब्धिकर्ता » बचपन में नक्सलियों को करीब से देखा, अब उनके खिलाफ अभियान चलाए

बचपन में नक्सलियों को करीब से देखा, अब उनके खिलाफ अभियान चलाए

छत्तीसगढ़ में तैनात आदिवासी पुलिस अधिकारी ने सात बड़े ऑपरेशनों में हिस्सा लेकर महिलाओं के लिए नई मिसाल कायम की है। उनका मानना है कि महिलाओं को नेतृत्व की जिम्मेदारी भी संभालनी चाहिए। The Indian Tribal की रिपोर्ट

June 1, 2026
The Indian Tribal

भीषण गर्मी और मानसून की भारी बारिश अभियान के दौरान सबसे बड़ी चुनौतियों थीं

नई दिल्ली

इस वर्ष 30 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में घोषणा की थी कि भारत प्रभावी रूप से नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है और छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में तैनात DSP अमृता पैंकरा, जो 30 वर्ष की हैं, ने फरवरी-मार्च 2024 से शुरू हुए सात एंटी-माओवादी अभियानों में हिस्सा लेकर नक्सलवाद के खात्मे में एक अहम् भूमिका अदा किया।

नारायणपुर कभी राज्य के सबसे अधिक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में गिना जाता था और इसे सुकमा तथा बीजापुर के साथ जोड़ा जाता था।

माओवादी प्रभावित एक अन्य जिला सरगुजा में पली-बढ़ीं अमृता पैंकरा ने याद किया कि बचपन में उनके गांव में माओवादी आया करते थे। सरगुजा, नारायणपुर से लगभग 570 किलोमीटर दूर स्थित है।

उन्होंने The Indian Tribal से बातचीत में बताया, “सुबह-सुबह जब मैं घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठती थी, तब उन्हें बंदूकें लेकर मार्च करते हुए देखती थी। लेकिन उस इलाके में लोगों पर उनका प्रभाव सीमित था। बस्तर क्षेत्र जैसी स्थिति वहां कभी नहीं रही।”

हालांकि उत्तर और मध्य छत्तीसगढ़ के सरगुजा और कबीरधाम जैसे जिलों में भी उग्रवाद का असर महसूस किया गया था, लेकिन राज्य के दक्षिणी हिस्से के सात जिलों वाला बस्तर क्षेत्र लगभग चार दशकों तक ‘लाल आतंक’ के लिए जाना गया।

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अमृता एक ऐसे बोर्ड के सामने खड़ी हैं, जो आम लोगों के लाभ के लिए बनाए गए शिविर को दर्शाता है

DSP अमृता ने बताया कि जब वह कबीरधाम में पदस्थ थीं, तभी अचानक उनका तबादला नारायणपुर के लिए कर दिया गया। उन्होंने कहा, “तबादले के बीच मुझे ज्यादा समय नहीं मिला। केवल तीन-चार दिनों के भीतर मैं नारायणपुर पहुंच गई। मैंने 29 अगस्त 2024 को आधी रात के करीब आधिकारिक रूप से कार्यभार संभाला। उस समय एंटी-माओवादी अभियान चल रहे थे और मुझे जल्दी पहुंचना पड़ा, जबकि दोनों जिलों के बीच लगभग 350 किलोमीटर की दूरी है।”

उन्होंने बताया कि पुलिस सेवा की शुरुआत में कई नए अधिकारियों की पोस्टिंग वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में की जाती है। अमृता को याद है कि उनके तबादले के बाद कबीरधाम के छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश सीमा पर स्थित चिल्फी घाटी इलाके में सक्रिय दो उग्रवादियों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। वे बस से नारायणपुर पहुंचे थे। अधिकारी ने कहा कि यह नारायणपुर में चल रहे सघन पुलिस अभियानों का असर था।

उन्होंने कहा, “वहां भी जंगल घने हैं और उग्रवादियों को छिपने के लिए अच्छा आवरण मिल सकता है।” लेकिन कबीरधाम में, सरगुजा की तरह, माओवादी स्थानीय जनता, खासकर बैगा आदिवासियों पर वैसा प्रभाव स्थापित नहीं कर पाए। “यह पुलिस की पहल का परिणाम था, जिसके तहत अंदरूनी गांवों में स्थानीय बच्चों के लिए स्कूल चलाए गए। इस अभियान ने वास्तव में उग्रवाद को दूर रखने में मदद की,” उन्होंने कहा।

स्वाभाविक रूप से जब उनके परिवार को नारायणपुर तबादले की जानकारी मिली, तो सुरक्षा को लेकर वे चिंतित हो गए। कई दिनों तक फोन नेटवर्क से बाहर रहने पर परिवार बेहद परेशान हो जाता था।

एंटी-माओवादी अभियानों का अनुभव

नारायणपुर में पोस्टिंग के बाद अमृता ने बस्तर संभाग के कांकेर जिले में जंगल युद्धकला का 40 दिनों का कठिन प्रशिक्षण लिया। कांकेर में कई पहाड़ियां हैं, जिनका उपयोग पुलिस प्रशिक्षण के लिए किया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें वजन उठाकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में जंगलों में रात गुजारने और जीवित रहने के तरीके भी सीखे। अभियानों के दौरान वह हथियारों के अलावा सूखा भोजन और पानी भी साथ रखती थीं।

उन्होंने कहा, “कई बार महिलाओं को शारीरिक क्षमता की कमी के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शुरुआत में मुझे लगता था कि दुश्मन की गोली से पहले थकान ही मुझे मार डालेगी। अपने शरीर की क्षमता बढ़ाने में मुझे समय लगा।”

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अमृता (सिर पर पगड़ी पहने) सात एंटी-माओवादी अभियानों का हिस्सा रह चुकी हैं

मौसम भी अपने साथ बेहद कठिन चुनौतियां लेकर आता था। बस्तर क्षेत्र में गर्मियां काफी कठोर होती हैं और तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है। “कई बार जंगल में छिपने के लिए उपयुक्त कॉम्बैट यूनिफॉर्म इतनी गर्म और भारी लगती थी कि हममें से कुछ लोग स्ट्रेचेबल टी-शर्ट पहनना पसंद करते थे।”

गर्मी के अलावा मक्खियों ने भी जीवन मुश्किल बना दिया था। बारिश के मौसम में गीले कपड़े और जूते बदलने का अवसर नहीं मिलता था, जिससे त्वचा संक्रमण हो जाते थे।

इसके बावजूद मानसून के दौरान अभियान रोके नहीं जा सकते थे, क्योंकि आशंका रहती थी कि इस दौरान उग्रवादी खुद को फिर से संगठित कर सकते हैं।

अमृता ने बताया कि अधिकतर मौकों पर माओवादी IED विस्फोटों पर निर्भर रहते थे और गोलियों का इस्तेमाल केवल भागने की स्थिति में करते थे। इसका मतलब था कि अभियानों के दौरान मेटल डिटेक्टर साथ रखना पड़ता था और जहां तक संभव हो वाहनों के उपयोग से बचना पड़ता था। उन्होंने कहा कि अभियानों के दौरान हर समय सतर्क रहना जरूरी होता था। सबसे पहली जिम्मेदारी खुद की सुरक्षा और टीम के अन्य सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होती थी। उन्होंने कहा कि दूसरी ओर के लोगों के लिए भी सभी यही चाहते थे कि वे आत्मसमर्पण कर दें।

“शुरुआत में मुझे डर लगता था, लेकिन यह एक अच्छा अनुभव रहा। बहुत कम महिला अधिकारी इन अभियानों में शामिल हुई थीं। कई महिलाएं दफ्तर का काम पसंद करती हैं। मैंने भी सोचा था कि शायद मुझे इससे छूट मिल जाएगी। लेकिन एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे कहा कि मुझे केवल डेस्क तक सीमित नहीं रहना चाहिए। महिलाएं हमेशा पीछे नहीं रह सकतीं। अगर हम जिम्मेदारी नहीं लेंगी, तो ऊंचे पदों तक कैसे पहुंचेंगी?”

जिन माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है, उन्हें विभिन्न शिविरों में रखा गया है और अब उन्हें सिलाई, ड्राइविंग तथा कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

जंगलों में बीती रातें

एक अवसर पर अमृता और उनकी टीम अबूझमाड़ क्षेत्र के घने जंगलों और पहाड़ियों में स्थित नीलांगुर पहुंचे, जिसे कभी माओवादियों का मुख्यालय माना जाता था। वे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के लाहेरी गांव में भी गए, जो छत्तीसगढ़ सीमा के करीब है, जहां उन्होंने लगातार कई रातें बिताईं।

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अमृता (बच्चे को गोद में लिए हुए) ने बताया कि कांकेर में उनका प्रशिक्षण बेहद कठिन था

जंगलों के भीतर रात बिताना आसान नहीं था। कई बार शिविर लगाए जाते थे, लेकिन अन्य समय में सुरक्षाबलों को नंगी चट्टानों पर सोना पड़ता था। उन्होंने कहा, “खाने की समस्या नहीं होती थी। ज्यादातर समय हम छोटे सिलेंडर और स्टोव साथ रखते थे ताकि जंगल में ठीक से खाना बना सकें। बारिश के मौसम में यह बहुत उपयोगी साबित होता था। आखिर अगले दिन पूरे दिन सक्रिय रहने के लिए ताकत की जरूरत होती थी।”

उग्रवादियों के अलावा अधिकारी का सामना वन्यजीवों से भी हुआ। उन्होंने बताया, “एक बार हमारी टीम का सामना एक भालू से हो गया, जो हमें देखकर उतना ही चौंक गया जितना हम उसे देखकर हुए थे। लेकिन इतने लोगों को साथ देखकर वह वहां से चला गया।”

दिलचस्प बात यह रही कि उनका कभी सांपों से सामना नहीं हुआ, लेकिन मच्छरों से बचने के लिए मजबूत रिपेलेंट का इस्तेमाल करना पड़ता था। संभव है कि इतने लोगों के एक साथ चलने से पैदा होने वाले कंपन के कारण सांप दूर रहते हों।

अमृता ने कहा कि महिला अधिकारी लोगों से बेहतर तरीके से जुड़ पाती हैं, खासकर उन लोगों से जिन्होंने आत्मसमर्पण कर नई जिंदगी शुरू की है। उन्होंने स्वीकार किया कि एक समय केवल महिला अधिकारियों की एंटी-माओवादी फोर्स बनाने की योजना थी, लेकिन फिलहाल उग्रवाद अतीत की परछाई जैसा लगने लगा है।

उन्होंने कहा कि उनकी सबसे अच्छी यादों में से एक अंदरूनी इलाकों में पहली बार चुनाव कराने में अधिकारियों की मदद करना रहा है।

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In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

Tribal quartet from Jharkhand in Asian Games hockey squad

Hockey India has announced the 20-member Indian women's hockey team for the 20th Asian Games, scheduled to be held in Japan from September 19 to October 4. Four tribal players from Jharkhand—captain Salima Tete, Nikki Pradhan, Beauty Dungdung, and Deepika Soreng, have earned their place in the national squad. While all four have previously represented India at the international level, this will be the first Asian Games appearance for Beauty Dungdung and Deepika Soreng, marking a significant milestone in their careers. Midfielder Salima Tete, who will lead the Indian side, has played more than 150 international matches and has been captaining the team for the past two years. Veteran defender Nikki Pradhan, with over 200 international appearances, continues to be a key pillar of India's defensive unit.
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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