डाल्टनगंज/नई दिल्ली
झारखंड का पलामू टाइगर रिजर्व राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) से मंजूरी मिलने के बाद बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश से मादा बाघों को लाने की तैयारी कर रहा है। इसी के साथ राज्य वन विभाग ने रिजर्व के निवासियों को संरक्षण अभियान का सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है।
इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए आदिवासी समुदायों के साथ मिलकर पवित्र उपवनों (सरना) के संरक्षण का अभियान शुरू किया गया है तथा इन जैव-विविधता से भरपूर आस्था स्थलों को लोककथाओं में पहले से प्रतिष्ठित वाघ देवता अर्थात बाघ देवता से जोड़ा जा रहा है।

झारखंड के पलामू और लातेहार जिलों में फैला 1,130 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला यह टाइगर रिजर्व वर्ष 1960 में स्थापित किया गया था। यह भारत के सबसे पुराने टाइगर रिजर्वों में से एक है और वर्षों से फिल्मकारों तथा लेखकों को प्रेरित करता रहा है।
रिजर्व के बफर क्षेत्र में उत्तर कोयल और औरंगा नदियों के संगम पर स्थित केचकी गांव का वन विश्रामगृह, वर्ष 1970 में सत्यजीत रे की फिल्म ‘अरण्येर दिन रात्रि (Days and Night in the Forest)’ की शूटिंग का प्रमुख स्थल था। इस फिल्म का 4K-रीस्टोर संस्करण पिछले वर्ष कान फिल्म समारोह में प्रदर्शित किया गया था।
पलामू टाइगर रिजर्व और उसके आसपास लंबे समय तक कार्य कर चुके तथा नेचर कंजर्वेशन सोसाइटी नामक गैर-सरकारी संगठन का संचालन करने वाले डी.एस. श्रीवास्तव ने बताया कि इस क्षेत्र के लगभग हर गांव में पवित्र उपवन (सरना) मौजूद हैं। श्रीवास्तव भारत में मानव-हाथी संघर्ष के जाने-माने विशेषज्ञ भी हैं।
पवित्र उपवनों और वाघ देवता का पुनर्जीवन
टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक प्रजेश कांता जेना के अनुसार, रिजर्व क्षेत्र में लगभग 60 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। इसलिए सरना स्थलों का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है। रिजर्व के क्रिटिकल हैबिटेट क्षेत्र में 33 गांव हैं, जबकि बफर जोन में 150 अन्य गांव स्थित हैं। इन 33 गांवों में से सात गांव इस वर्ष पुनर्वास की प्रक्रिया के दायरे में हैं।
भारतीय वन सेवा के अधिकारी ने The Indian Tribal से कहा, “आदिवासी हमेशा से प्रकृति पूजा में भाग लेते रहे हैं। मेरे प्रभाग में प्रत्येक त्योहार की शुरुआत सरना में विशेष अनुष्ठानों से होती है। चूंकि लोग पीढ़ियों से इन स्थलों की देखभाल करते आए हैं, इसलिए ये काफी हद तक सुरक्षित बने हुए हैं। लेकिन वन विभाग ने अब ‘परब भागीदारी’ की अवधारणा शुरू की है, जिसके तहत वनकर्मी और स्थानीय निवासी साझा भागीदारी के रूप में मिलकर अनुष्ठानों और त्योहारों का आयोजन करते हैं।”

चूंकि बाघ संरक्षण विभाग का एक प्रमुख उद्देश्य है और पलामू में बाघों की संख्या बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं, इसलिए मार्च में सरहुल पर्व के अवसर पर आदिवासी समुदाय और वन विभाग ने मिलकर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया।
पलामू टाइगर रिजर्व उत्तर प्रभाग में तैनात रेंजर अजय टोप्पो ने बताया कि इस दौरान लाट ग्राम पंचायत के सरना स्थल, जो बाघों के लिए एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर का कार्य करता है, वहां हाथ से चित्रित बाघ की आकृतियों वाले मिट्टी के कलश रखकर वाघ देवता को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। स्थानीय लोग बाघ को पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न हिस्सा मानते हैं।
जेना ने बताया कि यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि कभी बाघ स्थानीय लोककथाओं का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था, लेकिन वर्षों के दौरान पलामू में बाघों की संख्या घटने के साथ वह गांवों की स्मृतियों और कथाओं से भी लगभग गायब हो गया।
उन्होंने कहा, “वन विभाग चाहता था कि बुजुर्गों की सामूहिक स्मृतियों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से बाघों से जुड़ी कहानियों को फिर से जीवित किया जाए। नई पीढ़ी बाघों और लोककथाओं में उनके स्थान के बारे में बहुत कम जानती है।”
दिलचस्प बात यह है कि अब बाघ एक बार फिर पलामू में दिखाई देने लगे हैं। हालांकि वर्ष 2023 की अखिल भारतीय बाघ आकलन रिपोर्ट में पलामू में केवल एक बाघ का उल्लेख है, लेकिन वर्तमान में सात बाघ इस रिजर्व का उपयोग कर रहे हैं।
वन अधिकारी ने बताया कि ये बाघ वर्ष 2022 के बाद संभवतः मध्य प्रदेश से सक्रिय कॉरिडोर के माध्यम से पलामू पहुंचे हैं। यह कॉरिडोर मध्य भारत के बांधवगढ़ तथा गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व को झारखंड से जोड़ता है। जेना इसे सकारात्मक संकेत मानते हैं।

उन्होंने कहा, “पन्ना और सरिस्का के विपरीत, जहां बाघों के पूरी तरह समाप्त हो जाने के बाद उन्हें दोबारा बसाना पड़ा था, पलामू में बाघ स्वाभाविक रूप से लौट रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि नर बाघ नए क्षेत्रों की तलाश में निकलते हैं और अपना क्षेत्र स्थापित करते हैं। बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए मानसून अथवा मानसून के बाद के मौसम में बांधवगढ़ से दो मादा और एक नर बाघ लाए जाएंगे, क्योंकि दोनों क्षेत्रों का भू-दृश्य काफी समान है।”
सरना संरक्षण की ‘घेराबंदी योजना’
वर्ष 2019-20 के आसपास झारखंड सरकार ने घेराबंदी योजना शुरू की, जिसके तहत सरना स्थलों की सुरक्षा के लिए चारदीवारी और प्रवेश द्वार बनाए जाने लगे ताकि अतिक्रमण रोका जा सके। हालांकि अभी तक सभी सरना इस योजना के दायरे में नहीं आ पाए हैं।
पश्चिमी सिंहभूम जिले के बरकुंडिया गांव के निवासी सतीश चंद्र बिरुली गांव के देसाउली (जाहेरथान) में देउरी यानी पुजारी की भूमिका निभाते हैं। हो समुदाय बहुल पश्चिमी सिंहभूम में सरना को इन्हीं दो नामों से जाना जाता है। झारखंड के प्रत्येक सरना में साल वृक्ष में निवास करने वाले आदिवासी देवता सिंग बोंगा की पूजा की जाती है।
बिरुली का मानना है कि उनके गांव के पवित्र स्थल की सुरक्षा के लिए चारदीवारी उपयोगी हो सकती है, लेकिन इसके लिए पहले ग्रामसभा की बैठक में स्वीकृति लेनी होगी और साथ ही देवता की अनुमति भी प्राप्त करनी होगी।
अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी के पुजारी बिरुली ने बताया कि कई वर्ष पहले गांव में एक देउरी को खेती के लिए भूमि दी गई थी, लेकिन धीरे-धीरे खेती का विस्तार पवित्र उपवन की ओर होने लगा। इसी कारण उनका मानना है कि चारदीवारी अतिक्रमण रोकने में कुछ हद तक मददगार साबित हो सकती है।
पश्चिमी सिंहभूम के तांबो गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक बागान बोदरा ने बताया कि उनके गांव में घेराबंदी का कार्य पूरा हो चुका है।
उन्होंने कहा, “पहले लोग पवित्र उपवन वाले क्षेत्र को गंदा कर देते थे। लेकिन अब यह सुरक्षित और स्वच्छ है। गांव में माघे और बाहा पर्व के दौरान यहां पूजा की जाती है।”
पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा स्थित आकाशवाणी में कार्यरत डोब्रो बुरिउली का मानना है कि चारदीवारी और प्रवेश द्वार भूमि पर अवैध कब्जे से सुरक्षा प्रदान करते हैं, जो आज लगभग हर जगह एक गंभीर समस्या बन चुका है।
झारखंड में खनन, सुरक्षा शिविरों और विकास परियोजनाओं के कारण अनेक पवित्र उपवन या तो लगभग समाप्त हो चुके हैं अथवा गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं।

पूर्वी सिंहभूम जिले के दातोबेरा गांव के निवासी आशुतोष गोपे ने उस समय विरोध प्रदर्शन किया था जब एक पत्थर खदान कंपनी गांव में अपना संचालन शुरू करना चाहती थी। इस विरोध के कारण उनके और छह अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए और आज भी गोपे को जमशेदपुर सिविल कोर्ट में पेश होना पड़ता है।
उन्होंने कुछ वर्ष पहले इस संवाददाता से कहा था, “कंपनी ने हमें बहुत परेशान किया। वह बार-बार गांव आती रही, जिसके कारण कुछ ग्रामीण नाराज हो गए, लेकिन कुछ लोगों ने उसका समर्थन भी किया। जब मैंने और मेरे साथियों ने विरोध किया तो हमारे खिलाफ मुकदमे दर्ज कर दिए गए।”
दातोबेरा गांव का सरना बुरु बोंगा कहलाता है और यह पहाड़ी वन क्षेत्र में स्थित है।
जनभागीदारी के अलावा झारखंड के कुछ वन प्रभागों में इन पवित्र उपवनों का दस्तावेजीकरण भी किया जा रहा है। चतरा दक्षिण के प्रभागीय वनाधिकारी मुकेश कुमार ने इसकी जानकारी दी।
रांची के सामाजिक कार्यकर्ता दीपक बाड़ा का कहना है कि चारदीवारी और प्रवेश द्वार बनने के बाद सरना अब बंद और संरचित स्थानों जैसे दिखाई देने लगे हैं। उनका मानना है कि इन जैव-विविधता से भरपूर पवित्र स्थलों को खुले स्वरूप में न रहने देना लोगों और जंगलों के बीच के प्राकृतिक संबंध को कमजोर करता है।
सरना न केवल वन्यजीवों का संरक्षण करते हैं, बल्कि आसपास के जंगलों की भी रक्षा करते हैं।

उन्होंने कहा, “चारदीवारी बनने के बावजूद कुछ लोग उसके ठीक बाहर के पेड़ों को अब भी काट सकते हैं।”
झारखंड के एकमात्र टाइगर रिजर्व पलामू में, जहां इतिहास और विरासत का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, उग्रवाद लगातार कम हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप पहले दुर्गम और पहुंच से बाहर रहे क्षेत्रों में अब संरक्षण कार्यों का रास्ता खुल रहा है।
जहां एक ओर रिजर्व बाघों की संख्या में वृद्धि की प्रतीक्षा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वाघ देवता से जुड़ी लोककथाएं संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी के महत्व को और मजबूत कर रही हैं। बाघ के प्रति सम्मान इस बात का प्रतीक है कि महुआ के फूल चुनने और पवित्र सरना स्थलों में पूजा-अर्चना करने की आदिवासी परंपरा भविष्य में भी निरंतर जारी रहेगी।
















