नई दिल्ली
ऐतिहासिक रूप से आर्थिक विकास से हाशिए पर रहे भारत के आदिवासी समुदायों के मानव विकास संकेतकों में गंभीर कमियां थीं। लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता की नींव रखने और 2021 में साक्षरता दर को अभूतपूर्व 71.6% तक पहुंचाने से न केवल उनकी पारिवारिक आय में वृद्धि हुई, बल्कि इसने एक बहुत बड़े बदलाव के लिए आवश्यक आधार भी तैयार किया, जिसने लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय उग्रवाद को कमजोर किया और राष्ट्रीय शासन के सर्वोच्च स्तरों पर ऐतिहासिक आदिवासी प्रतिनिधित्व का स्पष्ट मार्ग प्रशस्त किया।
सुरक्षा के संवेदनशील क्षेत्रों से आर्थिक मुख्यधारा तक
स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे के विस्तार को आर्थिक सशक्तीकरण के साथ जोड़ने के व्यावहारिक प्रभाव उन क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं, जहां अतीत में गंभीर नागरिक संघर्ष का अनुभव रहा है। बस्तर छत्तीसगढ़ क्षेत्र का घने जंगलों वाला इलाका है, जो कई वर्षों से वामपंथी उग्रवाद की गतिविधियों का गढ़ रहा है।
अतीत में इन क्षेत्रों के प्रति राज्य प्राधिकारियों का दृष्टिकोण मुख्य रूप से सुरक्षा-केंद्रित था, जिससे स्थानीय लोगों में अलगाव की भावना और बढ़ी। नीतिगत बदलाव तब आया, जब केंद्र सरकार ने सुरक्षा संबंधी गतिविधियों के समान ही नागरिक और बुनियादी ढांचे के विकास को भी महत्व देने की आवश्यकता को महसूस किया।
उग्रवाद को पनपने का अवसर देने वाले भौतिक अलगाव को खत्म करने के लिए राज्य ने बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे के विकास का अभियान शुरू किया। इस बहुआयामी दृष्टिकोण ने राज्य व्यवस्था को उसके नागरिकों के और करीब ला दिया तथा लंबे समय से अलग-थलग पड़े गांवों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं, बैंकिंग प्रणाली और औपचारिक बाजारों तक पहुंच खोली।
हालिया नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) की रिपोर्टों के अनुसार, जनजातीय उप-योजना क्षेत्रों में लक्षित बुनियादी ढांचा हस्तक्षेपों ने लाखों नागरिकों को गरीबी से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पिछले एक दशक में आदिवासी क्षेत्रों में अत्यधिक गरीबी की दर में लगभग 15-20% की कमी आई है।
पुनर्वास का मानवीय चेहरा
इस प्रक्रिया की प्रमुख विशेषता आत्मसमर्पण और पुनर्वास के लिए एक दूरदर्शी रणनीति थी। सजा देने के बजाय ध्यान को दूसरी दिशा में ले जाते हुए राज्य ने ऐसी व्यवस्था बनाई, जिसमें उग्रवादियों के मनोवैज्ञानिक उपचार के साथ-साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण और आर्थिक एकीकरण को प्राथमिक महत्व दिया गया। इसका उद्देश्य लड़ाई का एक विकल्प तैयार करना था।
इस नीतिगत बदलाव का एक जीवंत उदाहरण इस वर्ष छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह के दौरान देखने को मिला, जब सुकमा और अन्य क्षेत्रों के घने जंगलों में नक्सली विद्रोहियों के रूप में लड़ चुकी महिलाएं पेशेवर मॉडल बनकर रैंप पर उतरीं। अपनी वर्दी की जगह बारीकी से डिजाइन की गई कोसा साड़ियां पहनकर उन्होंने हथकरघे की अपनी स्थायी परंपरा को उजागर किया।
व्यावसायिक शिक्षा के कारण जो महिलाएं कभी व्यवस्था के लिए खतरा हुआ करती थीं, वे अब आत्मनिर्भर कारोबारी महिलाएं बन गई हैं। यह इस बात का शानदार प्रदर्शन था कि यदि समान अवसर उपलब्ध कराया जाए, तो आर्थिक सशक्तीकरण हिंसा को समाप्त करने का रास्ता है।
अंतिम राजनीतिक बाधा को तोड़ना
जब जमीनी स्तर पर हो रहे बदलाव अर्थव्यवस्था में स्थिरता और संघर्ष वाले क्षेत्रों में शांति ला रहे थे, तब वर्ष 2022 में एक ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव सामने आया। इसी वर्ष द्रौपदी मुर्मू भारत की 15वीं राष्ट्रपति बनीं और गणराज्य के लिए एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक क्षण का निर्माण हुआ। ओडिशा के एक दूरस्थ छोटे गांव में रहने वाले एक गरीब संथाल परिवार से आने वाली उनकी स्कूल शिक्षिका से लोक सेवक और फिर भारत के राष्ट्राध्यक्ष बनने तक की यात्रा ने देश के लिए एक मजबूत संदेश दिया।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व करने वाली पहली महिला आदिवासी नेता का चुनाव ऐसा गहरा राजनीतिक प्रभाव लेकर आया, जो सामान्य दलगत सीमाओं से परे था। राष्ट्रपति भवन में एक आदिवासी नेता के पद की शपथ लेने की ऐतिहासिक तस्वीर इतनी प्रभावशाली थी कि उसने प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक धड़ों को एकजुट कर दिया। विभिन्न क्षेत्रीय दलों के नेताओं, जिनमें गैर-आदिवासी निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता और विभिन्न विपक्षी गुट भी शामिल थे, ने इस क्षण के ऐतिहासिक महत्व को पहचाना और उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में भारी बहुमत से मतदान किया। उनकी भारी जीत ने 75 साल पुरानी राजनीतिक बाधा को तोड़ दिया और यह संकेत दिया कि भारत के आदिवासी समुदाय राजनीतिक हाशिए से निकलकर राष्ट्रीय निर्णय लेने की प्रक्रिया के केंद्र में निर्णायक रूप से पहुंच चुके हैं।
समाज के हाशिए पर मौजूद वर्गों के लिए इन उच्चस्तरीय राजनीतिक सफलता की कहानियों को व्यावहारिक वास्तविकता में बदलने के लिए शासन के नए विकसित मॉडलों ने विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
ये विशेष जनजातियां ज्यादातर बिखरी हुई और दूरदराज की बस्तियों में रहती हैं, जहां आबादी स्थिर रहने या यहां तक कि घटने की प्रवृत्ति रखती है। इस स्थिति को सुधारने के लिए सरकार ने 2023 में प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (PM JANMAN) नामक एक कार्यक्रम शुरू किया, जिसका विशाल बजट ₹24,104 करोड़ है। हाशिए पर मौजूद क्षेत्रों के उत्थान के एक साधन के रूप में यह कार्यक्रम अस्थायी घरों के बजाय 4.90 लाख पक्के मकानों का निर्माण कर रहा है।
इसके अलावा, इस कार्यक्रम में अलग-थलग बस्तियों को पड़ोसी कस्बों से जोड़ने के लिए 8,000 किलोमीटर लंबी सभी मौसम में चलने योग्य सड़कों का निर्माण भी शामिल है। बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच के लिए 1,000 मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयां भी उपलब्ध कराई गई हैं, जो इन दूरदराज के क्षेत्रों में आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रही हैं।
पिछले एक दशक के दौरान भारत के आदिवासी क्षेत्रों में आए बदलाव को राष्ट्र-राज्य और उसकी स्वदेशी आबादी के बीच संबंधों में बदलाव से कम कुछ नहीं, बल्कि एक प्रतिमान बदलाव कहा जा सकता है। पहले आदिवासी लोगों को संरक्षणवादी कल्याण की एक पुरानी व्यवस्था के तहत देखा जाता था, जिसमें जनजाति राज्य की ओर से दी जाने वाली धर्मार्थ सहायता की केवल एक निष्क्रिय लाभार्थी थी। अब ऐसा नहीं है, क्योंकि हमारे पास एक नया दृष्टिकोण है, जो उनकी संस्कृति के सम्मान और उन्हें अर्थव्यवस्था तथा राजनीति की मुख्यधारा में शामिल करने पर आधारित है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और रॉयल हिस्टोरिकल सोसाइटी, लंदन के पोस्ट ग्रेजुएट सदस्य हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

















