Saturday, September 12, 2026
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छत्तीसगढ़ में आदिवासी ट्रैकर्स और AI मिलकर बचा रहें हैं दुर्लभ वन्यजीव

वन विभाग की पहल से उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में शिकार में कमी आई है और मालाबार पाइड हॉर्नबिल और विशाल गिलहरी जैसी दुर्लभ प्रजातियां अब फिर से जंगलों में दिखाई देने लगी हैं। दीपन्विता गीता नियोगी की रिपोर्ट

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हाशिए से राष्ट्रीय केंद्र तक: बदल रही है भारत के आदिवासी समुदायों की कहानी

भाग-2 भारत के आदिवासी समुदाय अब केवल सरकारी कल्याण योजनाओं के लाभार्थी नहीं रह गए हैं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मुख्यधारा में अपनी जगह मजबूत कर रहे हैं। बुनियादी ढांचे, शिक्षा, पुनर्वास और PVTGs पर केंद्रित नीतियों ने इस बदलाव को नई गति दी है, लिखते हैं [...]

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शिक्षा, वन उपज में मूल्य संवर्धन से आदिवासी समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण की नई राह

भाग-1शिक्षा पर नए सिरे से जोर, वन उपज में मूल्य संवर्धन और जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण अब अधिक आर्थिक और सामाजिक सशक्तीकरण की राह तैयार कर रहे हैं। लगभग आठ दशकों के विकासात्मक पिछड़ेपन के बाद आदिवासी क्षेत्रों में बदलाव की एक नई प्रक्रिया दिखाई दे रही [...]

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मणिपुर में संघर्ष के बीच आदिवासी कोचों ने संभाली नई पीढ़ी के खिलाड़ियों की कमान

उखरूल में पूर्व पेशेवर फुटबॉलर सीमित संसाधनों और वर्षों की अस्थिरता के बावजूद आदिवासी बच्चों को फुटबॉल की ट्रेनिंग दे रहे हैं। उनका मानना है कि भारत का फुटबॉल भविष्य मजबूत ग्रासरूट्स प्रणाली और शुरुआती प्रशिक्षण पर निर्भर करता है, लिखती हैं दीपान्विता गीता नियोगी

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ओडिशा के आदिवासी किसान ने 10 सालों में बचाईं धान की 100 से ज्यादा देशी किस्में

उनकी पहल दिखाती है कि आदिवासी ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी आने वाली पीढ़ियों के लिए देशी फसल विविधता के संरक्षण में किस तरह मददगार हो सकती है। नीरोज रंजन मिश्रा की रिपोर्ट

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आदिवासी समुदायों में पारंपरिक दाइयों की भूमिका क्यों अब भी कायम है, जब सरकार संस्थागत प्रसव पर दे रही है जोर?

हमने हाल ही में "आदिवासी दाइयों का सम्मान: जीवन और कल्याण की सुरक्षा" विषय के साथ विश्व के आदिवासी लोगों का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया। अर्चना ज्योति दो अध्ययनों के जरिए यह बताती हैं कि आदिवासी समुदायों में पारंपरिक दाइयाँ अब भी क्यों अपरिहार्य बनी हुई हैं

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ओडिशा के विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की सदियों पुरानी विवाह संस्कृति एवं परंपराएँ बदलाव के दौर में भी कायम

उत्कल विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन स्टडीज़ ऑन ट्राइबल एंड मार्जिनलाइज़्ड कम्युनिटीज़ की रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि तीव्र सामाजिक-आर्थिक बदलाव से सदियों पुरानी आदिवासी विवाह परंपराएँ विलुप्त होने से पहले उनका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए। The Indian Tribal की रिपोर्ट। भाग-2

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आदिवासी महोत्सव में झारखंड के विद्यार्थियों को मिलेगा फिल्म निर्माण सीखने का अवसर

फिल्म फेस्टिवल के दौरान आदिवासी जीवन, स्वदेशी संस्कृति, सामाजिक सरोकारों और उत्कृष्ट सिनेमा पर आधारित फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा। महोत्सव में 33 जनजातियों की संस्कृति और परंपराओं की प्रस्तुति भी होगी। The Indian Tribal की रिपोर्ट

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‘ट्री ऑफ लाइफ’ सखुआ: पत्तों से रोजगार, बीजों से उद्योग, राल से औषधि और संरक्षण में छिपा भविष्य

यह वृक्ष केवल जंगलों की शान नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक चिकित्सा, जैव विविधता और जलवायु सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार माना जाता है। The Indian Tribal की रिपोर्ट भाग-2

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रांची से उठेगी सखुआ क्रांति: क्यों है सखुआ झारखंड की संस्कृति, आस्था और प्रकृति का प्रहरी?

महापौर रोशनी खलखो के सपने से शुरू हो रही अनूठी पहल, ‘सखुआ महोत्सव’, के बहाने जानिए उस वृक्ष की कहानी, जिसने सदियों से आदिवासी जीवन, सरहुल, जंगल और झारखंड की पहचान को जीवित रखा है। The Indian Tribal की रिपोर्ट भाग-1

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705
Individual ethnic groups are notified as Scheduled Tribes as per Census 2011
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