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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » विविध » सरना से कोया पुनेम तक: जनगणना 2027 में अलग आदिवासी धर्म श्रेणी की मांग क्यों तेज हुई?

सरना से कोया पुनेम तक: जनगणना 2027 में अलग आदिवासी धर्म श्रेणी की मांग क्यों तेज हुई?

आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक आस्थाओं को अलग धार्मिक श्रेणी के रूप में दर्ज करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि अलग कोड के अभाव में उनकी विशिष्ट धार्मिक पहचान बड़े धर्मों में समाहित होकर अदृश्य हो जाती है। विशाल तिवारी की रिपोर्ट

June 25, 2026
The Indian Tribal

सरना धर्म कोड की मांग को लेकर पारंपरिक वेशभूषा में आदिवासी महिलाएं प्रदर्शन करती हुईं

सागर/नई दिल्ली

आगामी जनगणना 2027 केवल एक जनसांख्यिकीय अभ्यास से कहीं अधिक होने की संभावना है; यह भारत के मूल निवासियों की विशिष्ट पहचान को पुनः स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। अमरकंटक की प्राचीन चोटियों से लेकर भोपाल के प्रशासनिक गलियारों तक, एक अकेली किंतु दृढ़ आवाज़ गूंज रही है: “हम केवल वनवासी नहीं हैं; हम अपने स्वयं के धर्म वाले मूल निवासी हैं।”

अप्रैल 2026 से, जब जनगणना 2027 का पहला चरण प्रारम्भ हुआ, मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र, जहाँ 1.53 करोड़ से अधिक अनुसूचित जनजाति के लोग निवास करते हैं और जो राज्य की जनसंख्या का 21.1 प्रतिशत हैं, एक महत्वपूर्ण आंदोलन का केंद्र बन गए।

मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा प्रारम्भ किए गए इस अभियान के तहत आदिवासी प्रतिनिधियों ने आगामी जनगणना में अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान को संरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार से “जनजातीय/आदिवासी धर्म कोड” शामिल करने की स्पष्ट अपील की। यह केवल एक और धर्म श्रेणी जोड़ने का प्रयास नहीं है, बल्कि उस प्रक्रिया का प्रतिरोध भी है जिसे समर्थक “वर्गीकरण मिटाव” (Classification Erasure) कहते हैं।

वर्गीकरण मिटाव को समझना

वर्तमान जनगणना ढाँचा केवल छह धार्मिक कोड प्रदान करता है। एक समर्पित श्रेणी के अभाव में, आदिवासी आस्थाओं के प्रशासनिक समावेशन को रोकने और आधिकारिक अभिलेखों में उनके अस्तित्व को सुनिश्चित करने के इच्छुक लोगों के लिए अलग “सातवें कॉलम” की मांग एक मूलभूत आवश्यकता के रूप में उभरी है।

भारत के जनसंख्या आंकड़ों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संकेत किया है कि उनके राज्य में जनगणना आंकड़ों में दर्ज आदिवासियों का अनुपात पिछले आठ दशकों में 38 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत रह गया है। अलग कोड के समर्थकों का तर्क है कि यह गिरावट आवश्यक रूप से जनसंख्या में जैविक कमी को नहीं दर्शाती, बल्कि उस प्रक्रिया को प्रतिबिंबित करती है जिसे वे “वर्गीकरण मिटाव” कहते हैं—एक ऐसी नौकरशाही प्रक्रिया जिसके माध्यम से किसी समूह की विशिष्ट पहचान आधिकारिक अभिलेखों से गायब हो जाती है, जब व्यक्तियों को स्वयं को व्यापक श्रेणियों के अंतर्गत वर्गीकृत करने के लिए बाध्य किया जाता है।

भिन्न शब्दावलियों के कारण यह बहस और जटिल हो जाती है। “वनवासी” शब्द, जो वन में रहने वालों को संदर्भित करता है और अक्सर व्यापक हिंदू सांस्कृतिक ढाँचे से जुड़ा माना जाता है, तथा “आदिवासी” शब्द, जिसका अर्थ मूल निवासी है और जिसे आदिवासी नेताओं एवं संगठनों द्वारा व्यापक रूप से पसंद किया जाता है, के उपयोग को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है।

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 10.4 करोड़ से अधिक अनुसूचित जनजाति के लोग हैं, लेकिन उनमें से केवल लगभग 0.7 प्रतिशत को “अन्य धर्म एवं मत” श्रेणी के अंतर्गत दर्ज किया गया था। विद्वान डॉ. विनय एन. पटेल इस स्थिति को “गैर-जनजातीयकरण” (Non-Tribalisation) बताते हैं। उनका तर्क है कि स्वदेशी आस्थाओं के लिए अलग श्रेणी के अभाव के कारण अधिकांश आदिवासियों को बड़े धार्मिक वर्गों के अंतर्गत दर्ज कर दिया जाता है।

जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 89 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों को हिंदू और 5.53 प्रतिशत को ईसाई के रूप में दर्ज किया गया था। समर्थकों का कहना है कि 1951 के बाद “एनिमिस्ट” श्रेणी को हटाए जाने से उस प्रक्रिया को बल मिला जिसे “सांख्यिकीय आत्मसातीकरण” (Statistical Assimilation) कहा जाता है।

कई कार्यकर्ताओं को यह भी आशंका है कि अलग आदिवासी धर्म श्रेणी की निरंतर अनुपस्थिति का प्रभाव भूमि अधिकारों, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा) के तहत स्वशासन संबंधी प्रावधानों तथा आरक्षण नीतियों पर पड़ सकता है, विशेषकर समान नागरिक संहिता से जुड़ी भविष्य की बहसों में।

कानूनी विरोधाभास: कानून में अलग, आंकड़ों में खोए हुए

भारत के कानूनी ढाँचे में एक उल्लेखनीय विडम्बना मौजूद है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 दोनों की धारा 2(2) कहती है कि ये कानून अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर लागू नहीं होंगे, जब तक कि सरकार विशेष रूप से ऐसा निर्देश न दे। यह प्रावधान अलग आदिवासी प्रथागत कानूनों और परंपराओं के अस्तित्व को स्वीकार करता है।

हालाँकि, भारत की जनगणना केवल छह प्रमुख धार्मिक श्रेणियों को मान्यता देती है—हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म। 2026 तक अनुसूचित जनजातियों की संख्या 11 करोड़ से अधिक होने की संभावना है। इतनी बड़ी आबादी के बावजूद, समर्थकों का तर्क है कि आधिकारिक धार्मिक वर्गीकरण प्रणाली में आदिवासी आस्थाएँ काफी हद तक अदृश्य बनी हुई हैं। समर्पित कोड के अभाव में व्यक्तियों को या तो किसी मुख्यधारा के धर्म का चयन करना पड़ता है या उन्हें व्यापक “अन्य” श्रेणी के अंतर्गत रखा जाता है।

पारिस्थितिक धर्मदृष्टि: दुनिया के सबसे हरित धर्म

राजनीति और प्रशासन से परे, समर्थक इस मांग को पर्यावरण संरक्षण के प्रश्न के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं। सरना और कोया पुनेम जैसी आस्था परंपराएँ प्रकृति—जिसमें पर्वत, नदियाँ और पवित्र उपवन शामिल हैं—को अपनी आध्यात्मिक विश्वदृष्टि का केंद्रीय तत्व मानती हैं।

The Indian Tribal
साल वृक्ष की पूजा करते आदिवासी

“पवित्र उपवन” के लिए प्रयुक्त मुंडारी शब्द से निकला “सरना” एक प्रकृति-केंद्रित आस्था प्रणाली है, जो मौखिक परंपराओं पर आधारित है और जंगलों, नदियों तथा पहाड़ियों को पवित्र सत्ता के रूप में पूजती है। समर्थकों का तर्क है कि ऐसी परंपराओं को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने से पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भू-दृश्यों के संरक्षण के प्रयास मजबूत हो सकते हैं और जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती चिंताओं के समय स्वदेशी पर्यावरणीय ज्ञान को प्रमुखता मिल सकती है।

विभिन्न क्षेत्रों में एक साझा संघर्ष

हालाँकि मांग व्यापक रूप से समान है, विभिन्न आदिवासी समुदाय अपनी आस्था परंपराओं के लिए अलग-अलग नामों का उपयोग करते हैं:

क्षेत्रप्रमुख मांगप्रमुख जनजातीय समूह
मध्य प्रदेशकोया पुनेम/कोइतुरगोंड, भील और सहरिया
झारखंड, पश्चिम बंगालसरना कोडसंथाल, मुंडा, हो और उरांव
छत्तीसगढ़आदिवासी धर्ममाड़िया, गोंड और असुर

पहचान का विरोधाभास: धर्मांतरण और बदलते आंकड़े

अलग धर्म कोड के अभाव ने धार्मिक धर्मांतरण और बदलते जनसांख्यिकीय पैटर्न पर भी बहस को जन्म दिया है।

ज़ाक्सा समिति रिपोर्ट (2014) ने मानवविज्ञानी वेरियर एल्विन के अवलोकनों का उल्लेख करते हुए कहा कि बाहरी समूहों के साथ बढ़ती सहभागिता अक्सर भूमि, जंगलों और सांस्कृतिक संस्थाओं पर पारंपरिक आदिवासी नियंत्रण के कमजोर पड़ने के साथ देखी गई है।

2001 और 2011 की जनगणनाओं के बीच धार्मिक जनसांख्यिकी में हुए बदलावों का इस संदर्भ में अक्सर उल्लेख किया जाता है:

• अनुसूचित जनजातियों में ईसाई धर्म मानने वालों की संख्या 63 प्रतिशत बढ़कर 63.90 लाख से 1.03 करोड़ हो गई।
• अनुसूचित जनजातियों में इस्लाम मानने वालों की संख्या 51.6 प्रतिशत बढ़कर 12.25 लाख से 18.58 लाख हो गई।
• 89 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जनजातियों को हिंदू धर्म के अंतर्गत दर्ज किया गया।

इन आंकड़ों की व्याख्या को लेकर मतभेद बने हुए हैं। 2021 में भाजपा सांसद संजय सेठ ने कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान कथित धर्मांतरण गतिविधियों को लेकर लोकसभा में चिंता व्यक्त की थी। सरना कोड आंदोलन के कई समर्थकों सहित आदिवासी नेताओं का तर्क है कि धार्मिक धर्मांतरण और बड़े धार्मिक वर्गों में सांख्यिकीय समावेशन, दोनों ही झारखंड जैसे राज्यों में दर्ज आदिवासी जनसंख्या अनुपात में दिखाई देने वाली गिरावट में योगदान करते हैं।

डॉ. विनय एन. पटेल के अनुसार, आदिवासी समुदायों के बीच धार्मिक धर्मांतरण ने कई सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं। इनमें ईसाई और गैर-ईसाई समूहों के बीच विभाजन, नई आंतरिक पदानुक्रमों का उद्भव, धर्मांतरित व्यक्तियों की पहचान संबंधी दुविधाएँ तथा पारंपरिक संस्थाओं और सांस्कृतिक प्रथाओं का धीरे-धीरे कमजोर होना शामिल है। आलोचकों का तर्क है कि ये परिवर्तन सांस्कृतिक असंगति और स्वदेशी पहचानों के क्षरण में योगदान दे सकते हैं।

जनगणना 2027 का मार्ग: डिजिटल दीवार को तोड़ना

जैसे-जैसे जनगणना प्रक्रिया डिजिटल गणना की ओर बढ़ रही है, समर्थक उस संभावना को लेकर चेतावनी दे रहे हैं जिसे वे “प्रौद्योगिकीय मिटाव” (Technological Erasure) कहते हैं। उनका तर्क है कि यदि जनगणना सॉफ्टवेयर में आदिवासी धर्मों के लिए समर्पित विकल्प नहीं होगा, तो प्रगणक मुख्यधारा के धार्मिक वर्गों को डिफॉल्ट रूप से चुन सकते हैं।

इस मुद्दे के समाधान के लिए कई प्रस्ताव सामने आए हैं:

  1. जनगणना कोड निर्देशिका का अद्यतन: आदिवासी आस्थाओं के लिए अलग संख्यात्मक कोड निर्धारित किए जाएँ।
  2. झारखंड मॉडल को अपनाना: 2020 के झारखंड विधानसभा प्रस्ताव का अनुसरण करना, जिसमें सरना धर्म कोड को आधिकारिक मान्यता देने की मांग की गई थी।
  3. संवैधानिक और कानूनी प्रश्नों का समाधान: वर्तमान कानूनों के तहत आदिवासी प्रथागत कानूनों की मान्यता के अनुरूप जनगणना वर्गीकरण पद्धतियों को समायोजित करना तथा अलग आदिवासी व्यक्तिगत कानून व्यवस्था की रूपरेखा का परीक्षण करना।

इस आंदोलन के नेताओं और समर्थकों के लिए लक्ष्य स्पष्ट है। वे चाहते हैं कि जनगणना 2027 जल, जंगल और जमीन की पूजा को किसी बड़े धार्मिक वर्ग की उपश्रेणी के रूप में नहीं, बल्कि एक विशिष्ट, संरक्षित और संप्रभु आध्यात्मिक परंपरा के रूप में मान्यता दे। जैसे-जैसे भारत अपनी अगली जनगणना की तैयारी कर रहा है, अलग आदिवासी धर्म कोड पर बहस पहचान, प्रतिनिधित्व और स्वदेशी अधिकारों से जुड़े व्यापक विमर्श के सबसे अधिक चर्चित प्रश्नों में से एक बनने की संभावना रखती है।

(लेखक डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश में शोधार्थी एवं वरिष्ठ शोध फेलो (एसआरएफ) हैं। व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

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आईएचएम रांची की ‘मडुआ लड्डू’ कृति को मिला कॉपीराइट पंजीकरण

इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग टेक्नोलॉजी एंड अप्लाइड न्यूट्रिशन, रांची (आईएचएम रांची) ने शोध, नवाचार और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में एक और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार के कॉपीराइट कार्यालय ने संस्थान द्वारा विकसित “मडुआ लड्डू” शीर्षक कृति को कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अंतर्गत औपचारिक रूप से पंजीकृत किया है। इसके लिए आवेदन 16 मई 2026 को दाखिल किया गया था तथा पंजीकरण प्रमाणपत्र 22 जुलाई 2026 को जारी किया गया। यह कृति आईएचएम रांची के प्राचार्य डॉ. भूपेश कुमार, वरिष्ठ व्याख्याता रवि कुमार तथा व्याख्याता रजनीश कुमार सिंह द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है। झारखंड के घर-घर में लोकप्रिय मडुआ आधारित पारंपरिक व्यंजन को सुव्यवस्थित, मानकीकृत और वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजीकृत विधि में प्रस्तुत करना इस कार्य की प्रमुख विशेषता है। मडुआ, जिसे रागी या फिंगर मिलेट के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड की खाद्य संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पोषण की दृष्टि से उपयोगी होने के साथ-साथ यह कम पानी में उगने वाली जलवायु-अनुकूल फसल भी है। ऐसे में मडुआ आधारित उत्पादों के वैज्ञानिक विकास और दस्तावेजीकरण से स्थानीय खाद्य परंपराओं के संरक्षण, पोषण संवर्धन, उद्यमिता और रोजगार सृजन की नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। आईएचएम रांची लंबे समय से झारखंड के स्थानीय अनाजों, जनजातीय खाद्य परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक आतिथ्य शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहा है।
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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