रांची
झारखंड की राजधानी रांची में 8 से 31 अगस्त तक आयोजित होने वाले ‘सखुआ महोत्सव’ की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। रांची नगर निगम की महापौर रोशनी खलखो की परिकल्पना पर आधारित यह महोत्सव केवल पौधारोपण कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और जनभागीदारी के माध्यम से झारखंड की पहचान रहे सखुआ वृक्ष को फिर से जनआंदोलन का स्वरूप देने की पहल है।
महोत्सव का लक्ष्य शहर में 1,00,000 सखुआ पौधों का रोपण है। हालांकि नगर निगम का आकलन है कि शहरी क्षेत्र में पर्याप्त स्थान उपलब्ध न होने के कारण वास्तविक संख्या कुछ कम रह सकती है। इसके बावजूद 50,000 से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य पूरी प्रतिबद्धता के साथ रखा गया है।
The Indian Tribal से बातचीत में महापौर रोशनी खलखो ने बताया कि इस अभियान की प्रेरणा उन्हें बचपन में अपनी दादी से मिली।
उन्होंने कहा, “मेरा पालन-पोषण मेरी दादी ने किया। उन्होंने ही मुझे हर वर्ष ‘चलती मेला’ (जगन्नाथ रथ यात्रा के पहले दिन) के अवसर पर एक पौधा लगाने की सीख दी। मान्यता है कि इस शुभ दिन लगाया गया पौधा आगे चलकर एक मजबूत और विशाल वृक्ष बनता है। यह भी कहा जाता है कि इस दिन मानसून की वर्षा पौधों के लिए सबसे अनुकूल होती है। बचपन से ही यह आदत मुझमें विकसित हुई और तभी से मेरा सपना था कि जब भी मुझे अवसर मिलेगा, मैं इसे बड़े स्तर पर आगे बढ़ाऊंगी।”
उन्होंने बताया, “हमने 1,00,000 सखुआ पौधे लगाने की योजना बनाई है, लेकिन शहर में पर्याप्त स्थान उपलब्ध न होने के कारण हमें संख्या सीमित रहने की आशंका है। फिर भी हमें विश्वास है कि हम 50,000 से अधिक सखुआ पौधों का रोपण करेंगे। इस अभियान की शुरुआत रांची स्थित इक्कीसो महादेव धाम से की जाएगी, जहां स्वर्णरेखा नदी के किनारे प्राकृतिक चट्टानों पर 21 पवित्र शिवलिंग विराजमान हैं।”

महापौर ने बताया कि हरमू और स्वर्णरेखा नदियों के संगम पर स्थित इस स्थल को भविष्य में एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की भी योजना है।
पौधारोपण से कहीं आगे की पहल
सखुआ महोत्सव का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि इसमें हजारों पौधे लगाए जाएंगे। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य उस वृक्ष को फिर से समाज के केंद्र में स्थापित करना है, जिसने सदियों से झारखंड के जंगलों, आदिवासी संस्कृति, लोकजीवन और पर्यावरण को जीवंत बनाए रखा है।
झारखंड की पहचान यदि उसकी खनिज संपदा, जलप्रपातों और जनजातीय संस्कृति से बनती है, तो इन सभी के केंद्र में सखुआ (साल) वृक्ष खड़ा दिखाई देता है जिसने सदियों से इस धरती के इतिहास, संस्कृति और प्रकृति को अपने भीतर समेट रखा है। वैज्ञानिक जगत इसे शोरिया रोबस्टा (Shorea robusta Gaertn. f.) के नाम से जानता है।
झारखंड के लिए सखुआ सिर्फ एक वन प्रजाति नहीं, बल्कि जीवन का आधार, आस्था का प्रतीक, लोकसंस्कृति का संवाहक और पारिस्थितिकी का प्रहरी है।
आदिवासी समाज के लोकगीतों, विवाह गीतों, धार्मिक अनुष्ठानों, सरना परंपरा, कृषि चक्र और सामुदायिक जीवन में सखुआ की उपस्थिति इतनी गहरी है कि इसके बिना झारखंड की सांस्कृतिक पहचान की कल्पना अधूरी लगती है। यही कारण है कि झारखंड में प्रचलित कहावत—”हजार साल खड़ा, हजार साल पड़ा, हजार साल सड़ा”—सिर्फ इसकी लकड़ी की मजबूती का बखान नहीं, बल्कि इसकी दीर्घजीवी उपयोगिता और सामाजिक महत्व का प्रतीक है।
एक वृक्ष, अनेक नाम—लेकिन समान श्रद्धा
सखुआ डिप्टेरोकार्पेसी कुल का सदस्य है। भारतीय उपमहाद्वीप के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों (Tropical Deciduous Forests) की यह प्रमुख प्रजाति है। झारखंड के विभिन्न जनजातीय समुदाय इसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। संताल समुदाय में सरजोम, मुंडा और हो समाज में सरजोम अथवा सोसो, जबकि उरांव समुदाय इसे सखुआ, सरई या खद्दी के नाम से जानता है। हिंदी में इसे साल, बांग्ला में शाल, ओड़िया में सर्गी और संस्कृत में अश्वकर्ण अथवा अग्निवल्लभ कहा गया है।
इन विविध नामों के बावजूद इसकी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा सभी समुदायों में समान है।
वनस्पति विज्ञान के अनुसार सखुआ एक दीर्घजीवी, विशाल और कठोर वृक्ष है जिसकी ऊंचाई सामान्यतः 30 से 40 मीटर तक और अनुकूल परिस्थितियों में 45 मीटर तक पहुंच सकती है। इसकी मोटी छाल, सीधा तना और चमड़े जैसी पत्तियां इसे गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क जलवायु में भी जीवित रहने योग्य बनाती हैं। यही कारण है कि झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और मध्य भारत के विशाल वन क्षेत्रों में इसका प्रभुत्व दिखाई देता है।
सरहुल और सखुआ: प्रकृति पूजा का सबसे सुंदर उत्सव
झारखंड में प्रकृति को देवतुल्य मानने की परंपरा रही है। इसी परंपरा का सबसे बड़ा उत्सव है सरहुल, जो सखुआ के फूलों के खिलने के साथ मनाया जाता है।
फागुन और चैत्र के बीच जब सखुआ के वृक्षों पर दूधिया सफेद फूल खिलते हैं, तब पूरा जंगल मानो नवजीवन का संदेश देता है। सरना स्थलों पर पाहन सखुआ के फूल अर्पित कर धरती माता, सूर्य और ग्राम देवताओं की पूजा करते हैं। यह सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के सह-अस्तित्व का उत्सव है।
लोकविश्वास है कि अगर सखुआ पर भरपूर फूल आए हैं तो वर्षा अच्छी होगी, खेत लहलहाएंगे और समाज समृद्ध होगा। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यह कहावत सुनाई देती है—”सखुआ फूले, धरती झूले।”

आदिवासी समाज में सखुआ के फूल महज पूजा की सामग्री नहीं, बल्कि समुदाय की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। विवाह, ग्रामसभा, पारंपरिक निर्णय और अनेक सांस्कृतिक अवसरों पर भी इसकी उपस्थिति शुभ मानी जाती है।
झारखंड के जंगलों का आधार
रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, लातेहार, चतरा और पलामू सहित झारखंड के अनेक जिलों के वन सखुआ प्रधान हैं। ये वन हाथी, हिरण, भालू, जंगली सूअर, तेंदुआ, असंख्य पक्षियों, सरीसृपों और कीटों के प्राकृतिक आवास हैं।
सखुआ की घनी छत्रछाया जंगल के सूक्ष्म जलवायु तंत्र को संतुलित रखती है, मिट्टी में नमी बनाए रखती है और भूजल पुनर्भरण में सहायता करती है।
वन विशेषज्ञों का मानना है कि सखुआ वन सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि एक जटिल पारिस्थितिक तंत्र हैं। इन वनों की जड़ें मिट्टी को बांधती हैं, वर्षा के दौरान मृदा अपरदन रोकती हैं तथा बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
रांची विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. लाडली रानी कहती हैं कि सखुआ झारखंड की जैव विविधता, संस्कृति और पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। इसके संरक्षण का अर्थ सिर्फ एक वृक्ष को बचाना नहीं, बल्कि संपूर्ण वन पारिस्थितिकी, आदिवासी सांस्कृतिक विरासत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी इसके औषधीय और पारिस्थितिक महत्व की पुष्टि करते हैं।
(क्रमशः भाग-2 में पढ़िए)













