भुवनेश्वर
अध्ययन का संभवतः सबसे आकर्षक निष्कर्ष यह है कि कई विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) में विवाह की शुरुआत औपचारिक बातचीत से नहीं, बल्कि प्रकृति और दैनिक जीवन से जुड़े सांस्कृतिक रूप से स्वीकृत स्नेह-प्रदर्शन से होती है।
जुआंग समुदाय में ऐसी ही एक परंपरा ‘आम लेसारे कनिया’ कहलाती है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—”आम फेंककर विवाह”। एक युवक जिस युवती से विवाह करना चाहता है, उसकी ओर एक पका हुआ आम फेंककर अपनी इच्छा व्यक्त करता है। यदि युवती इस संकेत को स्वीकार कर लेती है, तो विवाह की प्रक्रिया शुरू मानी जाती है। इसी तरह ‘कादा लेसारे कनिया’ नामक परंपरा में मिट्टी का ढेला फेंका जाता है।
ये केवल सामान्य या मनोरंजक क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त प्रणय-प्रस्ताव की विधियाँ हैं। ये दर्शाती हैं कि प्राकृतिक परिवेश किस प्रकार आदिवासी समुदायों में संवाद और भावनात्मक अभिव्यक्ति का अभिन्न माध्यम बन जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, जुआंग समुदाय बातचीत के जरिए तय होने वाले विवाह, प्रेम-विवाह के लिए घर से भागकर किए गए विवाह तथा अन्य पारंपरिक वैवाहिक रूपों को भी मान्यता देता है। इससे स्पष्ट होता है कि यह समाज सामुदायिक मान्यताओं के भीतर विवाह के अनेक स्वीकार्य मार्गों को स्थान देता है।
पाउड़ी भुइयाँ समुदाय में भी ‘धुकी पसिबा’ नामक एक अत्यंत उल्लेखनीय परंपरा प्रचलित है। इसके तहत एक युवती संभावित वर के घर जाकर घरेलू कार्यों में भाग लेने लगती है। यदि परिवार उसे स्वीकार कर लेता है, तो निर्धारित पारंपरिक रस्में पूरी होने के बाद यह संबंध धीरे-धीरे विवाह में परिवर्तित हो जाता है।
रिपोर्ट इस परंपरा को महिलाओं की निष्क्रिय भूमिका के रूप में नहीं, बल्कि पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं के भीतर उनके सक्रिय निर्णय और अधिकार (एजेंसी) के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करती है।
विवाह कभी दुल्हन खरीदने का माध्यम नहीं था
इस रिपोर्ट से निकलने वाले सबसे महत्वपूर्ण मानवशास्त्रीय निष्कर्षों में से एक यह है कि वधू मूल्य और दहेज के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए।
सार्वजनिक विमर्श में ‘ब्राइड प्राइस’ शब्द सुनते ही अक्सर यह धारणा बन जाती है कि मानो दुल्हन की खरीद-फरोख्त की जा रही हो। अध्ययन का कहना है कि ऐसी व्याख्या इस परंपरा की मूल भावना को समझने में भूल करती है।
सभी 10 PVTGs में यह आदान-प्रदान व्यापार नहीं, बल्कि पारस्परिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित है। चावल परिवार का भरण-पोषण करने की क्षमता और खाद्य सुरक्षा का प्रतीक है। पशुधन कृषि आधारित जीवन के लिए आवश्यक उत्पादक संपत्ति को दर्शाता है। माता, मामा तथा अन्य रिश्तेदारों को दिए जाने वाले वस्त्र, वधू के पालन-पोषण में उनकी सामाजिक भूमिका का सम्मान करते हैं। वहीं पीतल के बर्तन धन-प्रदर्शन नहीं, बल्कि नए परिवार की स्थापना के प्रतीक माने जाते हैं।
यहाँ तक कि नकद राशि भी केवल प्रतीकात्मक है—हिल खड़िया में Rs 2.50, जुआंग में Rs 3, बिरहोर में Rs 7, तथा लोधा समुदाय में ऐतिहासिक रूप से केवल Rs 5–7। इससे स्पष्ट है कि धन का महत्व गौण है, जबकि रिश्तेदारों की भागीदारी और पारिवारिक संबंधों की सार्वजनिक स्वीकृति सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
अध्ययन बार-बार यह रेखांकित करता है कि इन समुदायों में विवाह आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि दो विस्तारित परिवारों और उनके समुदायों के बीच दीर्घकालिक पारस्परिक संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया है।
हर समुदाय ने अपनी अलग विवाह परंपरा विकसित की
हालांकि वधू मूल्य की परंपरा सभी समुदायों में मौजूद है, लेकिन कोई भी दो PVTGs इसे एक समान तरीके से नहीं निभाते।
बिरहोर (मांकिड़िया) समुदाय आज भी ‘गनंग’ (Ganang) परंपरा का पालन करता है, जिसमें चार मुर्गियाँ, दो बकरियाँ और 50 किलोग्राम चावल के साथ प्रतीकात्मक नकद राशि दी जाती है।
भारत की सबसे प्राचीन आदिवासी संस्कृतियों में से एक माने जाने वाले बोंडा समुदाय में ‘गिनिंग’ (Ginning) परंपरा प्रचलित है, जिसमें मवेशी और अनाज दिए जाते हैं। यह उनकी पहाड़ी कृषि अर्थव्यवस्था को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
डिडायी समुदाय ‘गिनेंग’ (Gineng) अथवा ‘झोला डाबू’ (Jhola Dabu) परंपरा का पालन करता है, जिसमें चावल, नकद राशि, एक बकरी और पर्याप्त मात्रा में सागो पाम से तैयार पेय शामिल होता है। इससे सामुदायिक भोज के महत्व का पता चलता है।
डोंगरिया कंधा समुदाय में ‘मोदार’ (Modar) परंपरा निभाई जाती है, जिसमें केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि दुल्हन की दादी और गाँव के अन्य लोगों को भी पारंपरिक हिस्सेदारी दी जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि विवाह केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे गाँव के सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा है।
हिल खड़िया समुदाय में ‘पाना’ (Pana) परंपरा के अंतर्गत प्रतीकात्मक नकद राशि के साथ चावल और वस्त्र दिए जाते हैं।
कुटिया कंधा समुदाय की ‘जाला’ (Jala) या ‘कालू तापिनेरु’ (Kalu Tapineru) परंपरा में माता-पिता के साथ-साथ मामा की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, जो मातृ पक्ष के रिश्तों के स्थायी महत्व को दर्शाती है।
लोधा समुदाय की ‘कन्या पाना’ (Kanya Pana) परंपरा बदलाव के बावजूद निरंतरता का उदाहरण है। यद्यपि पारंपरिक नकद राशि Rs 5–7 से बढ़कर लगभग Rs 501 हो गई है, लेकिन इसके साथ दी जाने वाली बकरी या मुर्गी, वस्त्र और पीतल के बर्तन आज भी परंपरा के प्रतीक हैं, न कि व्यावसायिक लेन-देन के।
वहीं लंजिया सौरा समुदाय ‘पानशाल’ (Panshal) परंपरा का पालन करता है, जिसमें नकद राशि और उपहार दोनों आज भी पारंपरिक भेंट के रूप में दिए जाते हैं।
इन सभी परंपराओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि आदिवासी विवाह की कोई एक प्रणाली नहीं है, बल्कि परिवार निर्माण की दस अलग-अलग स्वदेशी अवधारणाएँ हैं, जिन्हें स्थानीय पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था, भाषा और इतिहास ने आकार दिया है।
परंपरा और परिवर्तन का संगम
रिपोर्ट इन परंपराओं को समय में जमी हुई स्थिर परंपराओं के रूप में प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि ऐसे समाजों के रूप में देखती है जो परिवर्तन के साथ संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
शिक्षा, सड़क संपर्क, बाजार, सरकारी कल्याण योजनाएँ, पलायन और आधुनिक संचार के बढ़ते प्रभाव से पारंपरिक संस्थाएँ धीरे-धीरे बदल रही हैं। पहले की तुलना में नकद भुगतान अधिक सामान्य हो गया है। वस्त्र, आभूषण और घरेलू सामान अब बाजार में उपलब्ध वस्तुओं के अनुरूप बदल रहे हैं। लंजिया सौरा समुदाय के कुछ हिस्सों में ईसाई धर्म के प्रभाव से विवाह संस्कारों में परिवर्तन आया है, जबकि अन्य समुदायों में भी मुख्यधारा के समाज से बढ़ते संपर्क ने कई रस्मों को प्रभावित किया है।
फिर भी, इन परिवर्तनों के बावजूद रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि इन परंपराओं का मूल दर्शन आज भी उल्लेखनीय रूप से मजबूत बना हुआ है।
गाँव के बुजुर्ग अब भी विवादों का समाधान करते हैं। मातृ पक्ष के रिश्तेदार आज भी प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। समुदाय की स्वीकृति अब भी सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। अनेक बस्तियों में विवाह की वैधता आज भी सामूहिक सहभागिता से ही निर्धारित होती है।
इसीलिए अध्ययन इन संस्थाओं को अतीत के अवशेष नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालती हुई जीवंत सांस्कृतिक परंपराएँ मानता है, जो अपनी मूल सांस्कृतिक नींव को बनाए हुए हैं।
अध्ययन दल के व्यापक निष्कर्ष
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि ओडिशा के PVTGs में विवाह संबंधी परंपराएँ आज भी रिश्तेदारी व्यवस्था, सामाजिक एकजुटता, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक सहभागिता को बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण संस्थाओं के रूप में कार्य कर रही हैं। यद्यपि विभिन्न जनजातियों की परंपराओं में भिन्नता है, लेकिन सामूहिक रूप से वे पारस्परिकता पर आधारित स्वदेशी सामाजिक व्यवस्था को प्रतिबिंबित करती हैं, जिसने पीढ़ियों के सामाजिक परिवर्तन के बावजूद स्वयं को बनाए रखा है। अध्ययन यह भी स्वीकार करता है कि शिक्षा, पलायन, धर्म, बाजार और राज्य-प्रेरित विकास के प्रभाव से ये परंपराएँ धीरे-धीरे बदल रही हैं, जिससे उनका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
अध्ययन से उभरती प्रमुख सिफारिशें
रिपोर्ट के व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर निम्नलिखित प्राथमिकताओं पर बल दिया गया है—
- तीव्र सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के कारण पारंपरिक ज्ञान के क्षरण से पहले ओडिशा की अमूर्त आदिवासी सांस्कृतिक विरासत के हिस्से के रूप में स्वदेशी विवाह परंपराओं का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।
- आदिवासी विकास कार्यक्रमों में पारंपरिक संस्थाओं को केवल मुख्यधारा की सामाजिक व्यवस्थाओं के संदर्भ में नहीं, बल्कि जीवंत सामाजिक संस्थाओं के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
- स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका में सुधार के साथ-साथ आदिवासी भाषाओं, पारंपरिक कानूनों और रिश्तेदारी संस्थाओं के संरक्षण के लिए अधिक मानवशास्त्रीय अनुसंधान और समुदाय-आधारित दस्तावेजीकरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- नीतिगत हस्तक्षेपों में सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पारंपरिक प्रथाएँ गरिमा, सहमति और लैंगिक समानता के सिद्धांतों का पालन करती रहें।














