भुवनेश्वर
भारत के अधिकांश हिस्सों में विवाह आज भव्य समारोहों, बढ़ते खर्च और दहेज जैसी सामाजिक बुराई का पर्याय बनता जा रहा है। लेकिन ओडिशा के जंगलों, पहाड़ियों और दूरदराज़ की बस्तियों में एक ऐसी अलग परंपरा आज भी जीवित है, जो धन-दौलत से अधिक रिश्तों को, व्यापार से अधिक समुदाय को और लेन-देन से अधिक पारस्परिकता को महत्व देती है।
‘सोशियो-कल्चरल, डेमोग्राफिक, न्यूट्रिशन एंड हेल्थ स्टेटस ऑफ द पार्टिकुलर्ली वल्नरेबल ट्राइबल ग्रुप्स (PVTGs) ऑफ ओडिशा’ शीर्षक वाली एक विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट इन स्वदेशी विवाह प्रणालियों की दुर्लभ झलक प्रस्तुत करती है।
ओडिशा सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के विश्व बैंक समर्थित ओडिशा हायर एजुकेशन प्रोग्राम फॉर एक्सीलेंस एंड इक्विटी (WB-OHEPEE) के अंतर्गत उत्कल विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन स्टडीज़ ऑन ट्राइबल एंड मार्जिनलाइज़्ड कम्युनिटीज़ (CoE in STMC) द्वारा तैयार इस अध्ययन में ओडिशा के 13 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) में से 10 के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया गया है।
यह बहु-विषयक अध्ययन रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर–इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (RMRC-ICMR), भुवनेश्वर के सहयोग तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (SCSTRTI) के समर्थन से किया गया। यह रिपोर्ट 20 जुलाई को ओडिशा के राज्यपाल को सौंपी गई।
रिपोर्ट के सबसे रोचक निष्कर्षों में वधू मूल्य (Bride Price) की परंपरा शामिल है, जो नाम से भले ही ऐसी प्रतीत होती हो, लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित दहेज व्यवस्था से इसका बहुत कम साम्य है।
अध्ययन के अनुसार, यह व्यवस्था महिलाओं का आर्थिक मूल्य निर्धारित नहीं करती, बल्कि पारस्परिकता पर आधारित एक सांस्कृतिक संस्था है। इसके माध्यम से परिवारों के योगदान को सम्मान दिया जाता है, रिश्तेदारी के संबंध मजबूत होते हैं और एक नए सामाजिक गठबंधन की सार्वजनिक स्वीकृति मिलती है। अनेक समुदायों में पारंपरिक उपहारों की व्यवस्था केवल वधू के माता-पिता ही नहीं, बल्कि मामा, चाचा, गाँव के बुजुर्ग और पारंपरिक मध्यस्थ भी मिलकर करते हैं। इस प्रकार विवाह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक उत्तरदायित्व बन जाता है।
ओडिशा के 10 PVTGs में वधू मूल्य की परंपराएँ
| PVTG | स्थानीय नाम | योगदानकर्ता | पारंपरिक वधू मूल्य |
| बिरहोर/मांकिड़िया | गनंग | वधू के माता-पिता | Rs 7 (चार आना), चार मुर्गियाँ, दो बकरियाँ और 50 किलोग्राम चावल |
| बोंडा | गिनिंग | वधू के माता-पिता | एक गाय, एक बैल और 20–30 किलोग्राम अनाज |
| डिडायी | गिनेंग/झोला डाबू | वधू के माता-पिता | 10 किलोग्राम चावल, नकद राशि, एक बकरी और पाँच गैलन सागो पाम पेय |
| जुआंग | कनिया मूला | वधू का पिता, पिता का छोटा भाई, मामा और खंडारिया (पारंपरिक मध्यस्थ) | Rs 3, लगभग 50 किलोग्राम चावल, एक मुर्गी, चावल की बनी पारंपरिक मदिरा और वधू की माँ के लिए एक साड़ी |
| पाउड़ी भुइयाँ | कनिया मूला | वधू का पिता, पिता का छोटा भाई, मामा और गाँव का मुखिया | लगभग 25 किलोग्राम चावल, तीन बकरियाँ, तीन बैल और मामा के लिए एक धोती |
| डोंगरिया कंधा | मोदार | वधू का परिवार; दादी और ग्रामीणों के लिए भी पारंपरिक हिस्सेदारी | 50 किलोग्राम चावल, दो भैंसें, शराब, साड़ी, बर्तन और पीतल की थालियाँ |
| हिल खड़िया | पाना | वधू के माता-पिता | Rs 2.50, चावल तथा वधू, उसकी माँ और रिश्तेदारों के लिए वस्त्र |
| कुटिया कंधा | जाला/कालू तापिनेरु | माता-पिता और मामा | चावल, भैंस, खाद्यान्न, वस्त्र और आभूषण |
| लोधा | कन्या पाना | वधू के माता-पिता | परंपरागत रूप से Rs 5–7 (अब लगभग Rs 501), वस्त्र, बकरी या मुर्गी तथा पीतल के बर्तन |
| लंजिया सौरा | पानशाल | वधू के माता-पिता | नकद राशि और वस्तुओं—दोनों के रूप में |
स्रोत: तकनीकी रिपोर्ट से रूपांतरित।
विवाह एक सामुदायिक संस्था है
रिपोर्ट की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इन समुदायों में विवाह का निर्णय केवल वर-वधू के बीच नहीं होता, बल्कि यह रिश्तेदारी और सामाजिक दायित्वों के व्यापक ताने-बाने से जुड़ा होता है।

जुआंग समुदाय की ‘कनिया मूला’ परंपरा इसका स्पष्ट उदाहरण है। वधू मूल्य की पूरी जिम्मेदारी केवल माता-पिता पर नहीं होती। वधू का पिता, उसका छोटा भाई, मामा तथा ‘खंडारिया’ नामक पारंपरिक मध्यस्थ भी इसमें योगदान देते हैं। इस पारंपरिक आदान-प्रदान में चावल, चावल की बनी मदिरा, एक मुर्गी, वधू की माँ के लिए साड़ी और प्रतीकात्मक नकद राशि शामिल होती है। प्रत्येक वस्तु परिवार की अलग-अलग शाखाओं की भागीदारी को दर्शाती है और आर्थिक दायित्व की बजाय सामाजिक एकजुटता को मजबूत करती है।
पाउड़ी भुइयाँ समुदाय इस सिद्धांत को और आगे बढ़ाता है। यहाँ निकट संबंधियों के अलावा गाँव का मुखिया भी इस पारंपरिक आदान-प्रदान में भाग लेता है। उसकी उपस्थिति इस बात का प्रतीक है कि विवाह केवल दो परिवारों का नहीं, बल्कि दो समुदायों के बीच भी एक सामाजिक समझौता है। ऐसी परंपराएँ आदिवासी सामाजिक व्यवस्था में सामूहिक स्वीकृति और गाँव की एकजुटता के महत्व को रेखांकित करती हैं।
कुटिया कंधा समुदाय में वधू मूल्य की व्यवस्था करने में मामा की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है। उनका योगदान आदिवासी सामाजिक संरचना में मातृ पक्ष के रिश्तों के निरंतर महत्व को दर्शाता है। मुख्यधारा के अनेक समाजों में जहाँ यह परंपरा काफी हद तक कमजोर पड़ चुकी है, वहीं आदिवासी परिवार व्यवस्था में यह आज भी केंद्रीय स्थान रखती है।
चावल, पशुधन और वस्त्र: स्वदेशी पारस्परिकता की भाषा
विवाह के दौरान आदान-प्रदान की जाने वाली वस्तुएँ स्वयं अपनी कहानी कहती हैं।
लगभग हर समुदाय के वधू मूल्य में चावल शामिल होता है, जो खाद्य सुरक्षा, समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक है। बकरियाँ, गाय, बैल और भैंस जैसे पशुधन इन समुदायों की कृषि और वन-आधारित अर्थव्यवस्था को प्रतिबिंबित करते हैं। साड़ियाँ, धोतियाँ, पीतल के बर्तन और आभूषण उन रिश्तेदारों के सामाजिक योगदान को सम्मान देते हैं, जिन्होंने वधू के पालन-पोषण और देखभाल में भूमिका निभाई है। चावल की पारंपरिक मदिरा और सागो पाम से बने पेय जैसे पारंपरिक पेय सामुदायिक भोज का अभिन्न हिस्सा हैं, जो विवाह को सामूहिक उत्सव में बदल देते हैं।
जहाँ नकद राशि दी भी जाती है, वहाँ उसका स्वरूप प्रायः प्रतीकात्मक होता है। उदाहरण के लिए, लोधा समुदाय में पारंपरिक रूप से वधू मूल्य केवल Rs 5–7 निर्धारित था। महँगाई के कारण यह राशि अब बढ़कर लगभग Rs 501 हो गई है, लेकिन इसका मूल सिद्धांत नहीं बदला है—यह भुगतान व्यापारिक नहीं, बल्कि केवल सांकेतिक और औपचारिक है।
गनंग, गिनिंग, गिनेंग, कनिया मूला, मोदार, पाना, जाला, कन्या पाना और पानशाल जैसे अलग-अलग नाम भी ओडिशा के PVTGs की भाषाई समृद्धि को दर्शाते हैं। प्रत्येक शब्द अपने भीतर एक विशिष्ट सांस्कृतिक दृष्टिकोण समेटे हुए है और यह याद दिलाता है कि भारत के स्वदेशी समाजों के विवाह को किसी एक मॉडल में नहीं बाँधा जा सकता।
(भाग-2 अगली कड़ी में)














