भुवनेश्वर
1960 के दशक के मध्य में जब धान उत्पादन बढ़ाने के लिए उच्च उपज देने वाली (हाई-यील्डिंग) किस्मों को प्राथमिकता दी जाने लगी, तब देशी धान की किस्मों का भंडार तेजी से सिमटने लगा। लेकिन ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के धरुडीही गांव के आदिवासी किसान सुरथा किसान ने इन किस्मों को विलुप्त होने से बचाने के उद्देश्य से वर्ष 2014-15 में सिंघा बहिनी सीड बैंक (एसबीएसबी) की स्थापना की।
संबलपुर स्थित गैर-सरकारी संगठन देसी बिहाना सुरक्षा मंच (डीबीएसएम) के सहयोग से सुरथा ने स्वयं यह बीज बैंक स्थापित किया, ताकि देशी बीजों को गुमनामी और विलुप्ति से बचाया जा सके। वर्ष 2015-16 से धीरे-धीरे उनके क्षेत्र के 20 से 25 किसान एक-एक कर इस पहल से जुड़े और देशी बीजों के संरक्षण के इस अभियान को मजबूत बनाया।
किसान जनजाति से आने वाले स्नातक सुरथा ने The Indian Tribal से कहा, “हमारे एसबीएसबी की शुरुआत केवल 35 देशी धान की किस्मों से हुई थी। अब हमारे बीज बैंक में ऐसी लगभग 110 किस्में हैं। इसके अलावा यहां छह देशी दलहन, 18 मोटे अनाज (मिलेट), 10 सब्जियों और दो तिलहन फसलों के बीज भी संरक्षित हैं। वर्तमान में हमारे बीज बैंक से लगभग 80 सक्रिय किसान जुड़े हुए हैं और हम जितनी अधिक संभव हो सके, उतनी देशी बीज किस्मों का संग्रह और संरक्षण कर रहे हैं।”
किसान जनजाति मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है और धान, मोटे अनाज तथा तिलहन की खेती करती है। यह समुदाय कुरुख बोली, ओड़िया और संबलपुरी भाषा बोलता है। इसके अलावा समुदाय के लोग विभिन्न प्रकार के लघु वनोपज का संग्रह और विक्रय भी करते हैं। समुदाय का एक वर्ग खजूर के पत्तों से चटाई और झाड़ू जैसे हस्तशिल्प उत्पाद बनाने के कार्य में भी लगा हुआ है।

जब वर्ष 2014-15 में एसबीएसबी की स्थापना हुई, तब इसके संग्रह में काले रंग की कालाजीरा, महीन सुनाकाठी, लाल लुसुरी, सुगंधित कर्पूरा क्रांति और साधारण गैर-सुगंधित पटेनी जैसी देशी धान की किस्में शामिल थीं। इसके बाद बीज बैंक में काली कालाबती, महीन मच्छा कांटा, सुगंधित कर्पूरा क्रांति, लाल जुईगुड़ा और साधारण गैर-सुगंधित कटिया जैसी किस्में भी जोड़ी गईं। इसके अलावा लाल भिंडी, तोरई, खीरा, टमाटर, करेला और लोबिया जैसी देशी सब्जियों के बीज भी यहां संरक्षित किए जाते हैं।
सुरथा के दिवंगत पिता बनेश्वर किसान लगभग पांच एकड़ भूमि पर नीलमणि, भोस्का और बांसभोट्टा जैसी देशी धान की किस्मों की खेती करते थे। हालांकि, बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के लिए उन्होंने वर्ष 1995 में स्वर्णा और प्रतीक्षा जैसी उच्च उपज देने वाली किस्मों की खेती शुरू कर दी। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जहां उच्च उपज वाली किस्में प्रति एकड़ 12 से 14 क्विंटल उत्पादन देती हैं, वहीं देशी किस्मों की उपज प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल रहती है।
हालांकि, वर्ष 2012 में डीबीएसएम से जुड़ने के बाद सुरथा को यह एहसास हुआ कि उच्च उपज वाली किस्मों की खेती में उपयोग होने वाले रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का पर्यावरण पर कितना दुष्प्रभाव पड़ता है। अध्ययनों के अनुसार, रासायनिक उर्वरकों के कारण मिट्टी अम्लीय हो जाती है, उसकी उर्वरता घटती है और मिट्टी सख्त होने लगती है। दूसरी ओर, कई देशी किस्में स्वाभाविक रूप से कीट-प्रतिरोधी और सूखा-सहिष्णु होती हैं। सुरथा के अनुसार, ये किस्में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का भी बेहतर ढंग से सामना करने में सक्षम हैं।

सुरथा ने कहा, “तब से मैं पांच एकड़ में देशी धान और लगभग 25 डिसमिल भूमि पर सब्जियों की खेती कर रहा हूं। पहले उच्च उपज वाली धान की खेती पर प्रति एकड़ प्रतिवर्ष 6,000 से 8,000 रुपये खर्च होते थे, जबकि अब देशी किस्मों की खेती पर केवल 3,000 से 4,000 रुपये प्रति एकड़ प्रतिवर्ष खर्च आता है।”
उनके इस सतत प्रयास के लिए विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया संस्थानों तथा ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।
सुरथा केवल प्राकृतिक खेती के माध्यम से देशी फसलों की खेती ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने अन्य किसानों को भी पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित किया है। आज उनके गांव में लगभग 25 एकड़ क्षेत्र में देशी धान और करीब पांच एकड़ में देशी सब्जियों की खेती की जा रही है।
डीबीएसएम के संयोजक सरोज कुमार मोहंती ने कहा, “सुरथा को पारिस्थितिक खेती की शुरुआती शिक्षा डीबीएसएम ने दी। वर्ष 2013-14 के दौरान वे नयागढ़ जिले के पद्मश्री प्रो. राधामोहन, महाराष्ट्र के पद्मश्री डॉ. सुभाष पालेकर और कटक जिले के प्रसिद्ध कृषिविज्ञानी नटबर सारंगी से भी अत्यंत प्रभावित हुए। इन सभी ने उन्हें न केवल देशी किस्मों की खेती के लिए प्रेरित किया, बल्कि एसबीएसबी की स्थापना कर ‘बीज संरक्षक’ के रूप में पहचान बनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया।”
देशी फसलों के सफल उत्पादक और देशी बीजों के संरक्षक बनने की अपनी यात्रा में सुरथा ने डीबीएसएम तथा सुंदरगढ़ जिले के किरेई स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) द्वारा आयोजित कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया।
केवीके, किरेई के मृदा विज्ञान वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार जेना के अनुसार, “हमने सुरथा को ‘पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम’, ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन’ तथा सरकार की ‘परंपरागत कृषि विकास योजना’ के अंतर्गत विभिन्न चरणों में प्रशिक्षण दिया। उन्हें बीज उपचार, मिट्टी में पोषक तत्वों के आकलन, बीज संरक्षण, मल्चिंग तथा वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया।”
उन्होंने आगे कहा, “प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने ‘बीजामृत’ और ‘जीवामृत’ जैसे जैव उर्वरकों तथा ‘नीमास्त्र’, ‘ब्रह्मास्त्र’, ‘अग्निअस्त्र’ और ‘दशपर्णी’ जैसे जैव कीटनाशकों को तैयार करने और उनके उपयोग की विधियां भी सीखीं।”

सुरथा का एसबीएसबी आसपास के किसानों को देशी बीज उधार भी देता है। जो किसान बीज लेते हैं, वे फसल कटाई के बाद अतिरिक्त मात्रा को ब्याज के रूप में जोड़कर बीज वापस करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई किसान 10 किलोग्राम बीज लेता है, तो उसे कटाई के बाद 15 किलोग्राम बीज लौटाना होता है।
सुरथा ने बताया, “बीज बैंक दूर-दराज के किसानों को भी बीज बेचता है। उदाहरण के तौर पर, ‘कुसुमकली’ और ‘मच्छाकांता’ धान की किस्में क्रमशः 30 रुपये और 40 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेची जाती हैं। हालांकि, यदि कोई गैर-सरकारी संगठन या संस्था किसी सरकारी परियोजना के तहत एसबीएसबी से बीज खरीदती है, तो प्रति किलोग्राम कीमत में मामूली वृद्धि हो जाती है।”
उन्होंने कहा, “यदि हमारे बीज बैंक में किसी विशेष किस्म का बीज उपलब्ध नहीं होता, तो मेरा बीज बैंक पश्चिमी ओडिशा के अन्य बीज बैंकों के साथ बीजों का आदान-प्रदान भी करता है।”
सुरथा बीज बैंक की निरंतर आपूर्ति बनाए रखने के लिए विशेष रूप से देशी बीजों का उत्पादन भी करते हैं। विविधता बनाए रखने के लिए वे आधे एकड़ भूमि पर मिलेट, सब्जियों और धान के बीज उगाते हैं, जबकि अधिक मांग वाली मच्छाकांता जैसी किस्मों की खेती डेढ़ एकड़ क्षेत्र में की जाती है।














