किन्नौर
एक ऐसे स्थान पर जहां पहाड़ अस्थिर हैं, सड़कें अक्सर टूट जाती हैं और विकास के प्रभाव सीधे जमीन पर महसूस किए जाते हैं, वहां 31 वर्षीय एक युवा की जीत ने चर्चा पैदा कर दी है। इसे जिले में हो रहे एक व्यापक बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है, जहां युवा पर्यावरणीय चिंताओं, भूमि की राजनीति और संवैधानिक अधिकारों को सार्वजनिक जीवन के केंद्र में ला रहे हैं। और इस जनजातीय जिले में इसका विशेष महत्व है।
रारंग ग्राम पंचायत के नवनिर्वाचित उप प्रधान योवन नेगी ने कहा कि वह अपने घोषणा-पत्र में किए गए वादों के अनुरूप कार्य जारी रखेंगे, विशेष रूप से जनभागीदारी को मजबूत करने, स्थानीय शासन में जवाबदेही सुनिश्चित करने और स्थानीय सहमति पर आधारित निर्णय लेने के लिए।
उन्होंने दोहराया, “विकास लोगों की भागीदारी से होना चाहिए, उनकी आवाज को नजरअंदाज करके नहीं।”
उनकी टिप्पणियां जमीनी लोकतंत्र में पर्यावरणीय चिंताओं, संवैधानिक अधिकारों और सामुदायिक भागीदारी के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती हैं।
राज्यभर में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव 26 मई, 28 मई और 30 मई को तीन चरणों में आयोजित किए गए थे, जबकि मतगणना 31 मई को हुई थी।
पर्यावरणीय चिंता ने किन्नौर की राजनीति को कैसे बदला
किन्नौर वर्षों से भूस्खलन, ढलानों के धंसने और सड़कों तथा बागानों को बार-बार होने वाले नुकसान का सामना कर रहा है। बटसेरी और निगुलसरी भूस्खलनों ने जिले पर गहरा प्रभाव छोड़ा और इस आशंका को और मजबूत किया कि जब हिमालयी क्षेत्र की नाजुक भू-आकृति पर अत्यधिक दबाव डाला जाता है तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं।
गांव-गांव में लोगों ने देखा है कि सुरंग निर्माण, विस्फोट, जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार और भारी सड़क निर्माण कार्य किस प्रकार ढलानों को अस्थिर कर सकते हैं और परिदृश्य को ऐसे बदल सकते हैं जिसकी भरपाई आसान नहीं है।
ऐसी परिस्थितियों में विकास से जुड़े प्रश्न केवल परियोजनाओं तक सीमित नहीं रह जाते। वे सुरक्षा, अस्तित्व और इस सवाल से जुड़े होते हैं कि क्या पहाड़ स्वयं उस दबाव को सहन कर सकता है जो उस पर डाला जा रहा है।
इसी माहौल में किन्नौर में नेगी का “नो मीन्स नो” आंदोलन आकार लेने लगा। यह आंदोलन केवल एक जलविद्युत परियोजना के खिलाफ विरोध नहीं था। यह उन समुदायों की असहमति का प्रतीक बन गया जो महसूस कर रहे थे कि उनसे ऐसे फैसलों को स्वीकार करने को कहा जा रहा है जो कहीं और लिए गए हैं और जिनमें उनकी जमीन और जीवन को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
जिले के अनेक युवाओं के लिए इस आंदोलन ने एक सरल विचार को आकार दिया—यदि किसी समुदाय को पर्यावरणीय कीमत चुकानी है, तो निर्णय लेने में उसकी वास्तविक भागीदारी भी होनी चाहिए। नेगी ने कहा, “यदि फैसले सीधे गांवों को प्रभावित करते हैं, तो गांवों की भी उन फैसलों में सार्थक भूमिका होनी चाहिए।”
राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि किन्नौर के युवा अब केवल विरोध तक सीमित नहीं हैं। वे लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर प्रतिनिधित्व भी चाहते हैं।
जनजातीय हिमालयी क्षेत्र में संविधान क्यों महत्वपूर्ण है
यह विचार किन्नौर में संवैधानिक महत्व भी रखता है। जिला संविधान के अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जिनका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति समुदायों के अधिकारों और शासन व्यवस्था की रक्षा करना है।
इन संवैधानिक प्रावधानों का उद्देश्य स्पष्ट है। जनजातीय समुदायों का भूमि, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के साथ विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक संबंध होता है, जिसे दूर बैठकर लिए गए प्रशासनिक या नियोजन संबंधी फैसलों में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि योवन नेगी की जीत केवल एक गांव तक सीमित महत्व नहीं रखती। यह संस्थाओं के बाहर विरोध से संस्थाओं के भीतर भागीदारी की ओर स्पष्ट बदलाव को दर्शाती है।
किन्नौर के अनेक युवाओं के लिए राजनीति अब केवल रैलियों, जनसभाओं या आपत्तियों तक सीमित नहीं रही। यह स्थानीय शासन में प्रवेश कर निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बनने के बारे में भी है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि पर्यावरणीय चिंता अब लोकतंत्र के बाहर नहीं, बल्कि उसका हिस्सा बन रही है। कई मायनों में यह किन्नौर की राजनीति में व्यापक पीढ़ीगत परिवर्तन को भी दर्शाता है। युवा प्रतिनिधि अब पारिस्थितिकी, संवैधानिक अधिकारों और शासन को अलग-अलग विषयों के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े मुद्दों के रूप में देख रहे हैं।
संविधान इस परिवर्तन को मजबूत आधार प्रदान करता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है और समय के साथ न्यायालयों ने इसके अंतर्गत सुरक्षित एवं स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को भी शामिल माना है।
ऐसे जिले में जहां भूस्खलन, अस्थिर ढलानें और क्षतिग्रस्त भूमि लोगों के घरों, खेती और दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं, वहां यह संबंध स्पष्ट दिखाई देता है। जब कोई ढलान धंसती है, तो वह केवल पर्यावरणीय नुकसान नहीं होता, बल्कि जीवन और गरिमा का प्रश्न बन जाता है।
अनुच्छेद 19 भी महत्वपूर्ण है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति व्यक्त करने और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार देता है। जब किन्नौर के ग्रामीण उन परियोजनाओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं जिन्हें वे पहाड़ों के लिए हानिकारक मानते हैं, तो वे लोकतंत्र के बाहर नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उपयोग कर रहे होते हैं।
अनुच्छेद 14 एक और आयाम जोड़ता है। कानून के समक्ष समानता का अर्थ तब अधूरा रह जाता है जब पहाड़ी समुदाय सबसे अधिक पर्यावरणीय बोझ उठाएं, लेकिन निर्णयों में उनकी भागीदारी सबसे कम हो।
विरोध से प्रतिनिधित्व तक
किन्नौर के युवा इन प्रश्नों का अलग तरीके से उत्तर देना शुरू कर चुके हैं। उन्होंने सड़कों को भूस्खलन से कटते, बागानों को मौसमीय बदलावों से प्रभावित होते और पहाड़ों को निर्माण कार्यों से बदलते देखा है। वे ऐसे क्षेत्र की विरासत संभाल रहे हैं जहां पारिस्थितिक अनिश्चितता दैनिक जीवन का हिस्सा है।
जिले के अनेक युवाओं के लिए स्थानीय चुनाव अब केवल नेतृत्व के पदों तक सीमित नहीं हैं। वे पर्यावरण संरक्षण, प्रतिनिधित्व और सामुदायिक भागीदारी पर खुली बहस के मंच भी बन रहे हैं। यहीं पर “पारिस्थितिक लोकतंत्र” की अवधारणा प्रासंगिक हो जाती है। किन्नौर की बहस का मूल प्रश्न यह है कि क्या नाजुक पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों की अपनी भूमि और भविष्य से जुड़े निर्णयों में वास्तविक आवाज है।

योवन नेगी की जीत को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह केवल एक व्यक्तिगत जीत नहीं है। यह संकेत है कि किन्नौर की राजनीतिक कल्पना बदल रही है।
भूस्खलनों, पर्यावरणीय चिंताओं और “नो मीन्स नो” आंदोलन से प्रभावित एक पीढ़ी अब अलग अपेक्षाओं के साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं में प्रवेश कर रही है। वह केवल वादे नहीं, अधिकार चाहती है। वह केवल संवाद नहीं, प्रतिनिधित्व चाहती है। वह ऐसे फैसले चाहती है जो लोगों के साथ मिलकर लिए जाएं, उन पर थोपे न जाएं।
इसलिए नेगी की जीत केवल एक सामान्य पंचायत चुनाव परिणाम नहीं है। यह संकेत देती है कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती पर्यावरणीय चिंता जमीनी लोकतंत्र की भाषा को धीरे-धीरे बदल रही है।
शायद रारंग का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है। एक नाजुक पर्वतीय क्षेत्र में लोकतंत्र का आकलन केवल चुनावों से नहीं किया जा सकता। इसका मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि क्या समुदायों के पास अभी भी अपनी भूमि, जंगलों और जल स्रोतों की रक्षा करने की शक्ति है, जो जीवन को संभव बनाते हैं।
(लेखिका पंजाब विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)















