नई दिल्ली
वित्तीय असुरक्षा, मौसमी पलायन और सामाजिक सहयोग की कमी गर्भावस्था के दौरान आदिवासी पुरुषों में मानसिक तनाव का जोखिम बढ़ा सकती है। यह स्थिति भारत में मातृ एवं पारिवारिक स्वास्थ्य के उस उपेक्षित पहलू को सामने लाती है, जिसमें होने वाले पिताओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
इंडियन जर्नल ऑफ साइकोलॉजिकल मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन में केरल के अट्टापडी में रहने वाले आदिवासी होने वाले पिताओं में 17.5 प्रतिशत में अवसाद (डिप्रेशन) के लक्षण और 10 प्रतिशत में चिंता के लक्षण पाए गए। अध्ययन में शामिल 10 में से चार प्रतिभागियों ने खराब मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य की भी जानकारी दी। ये निष्कर्ष रेखांकित करते हैं कि गर्भावस्था से संबंधित मानसिक स्वास्थ्य सहायता केवल गर्भवती महिलाओं तक सीमित न रहकर होने वाले पिताओं तक भी पहुंचनी चाहिए।
साइकोसोशल कोरिलेट्स ऑफ प्रीनेटल डिप्रेशन एंड एंग्जायटी अमंग फादर्स फ्रॉम ट्राइबल कम्युनिटीज इन इंडिया: ए क्रॉस–सेक्शनल स्टडी शीर्षक वाला यह अध्ययन जुलाई से दिसंबर 2025 के बीच केरल के पलक्कड़ जिले के अट्टापडी में किया गया। इसमें इरुला, मुदुगा और कुरुम्बा समुदायों के 80 पुरुषों को शामिल किया गया था।
अध्ययन के निष्कर्ष आर्थिक दबाव और अवसाद के लक्षणों के बीच गहरे संबंध की ओर इशारा करते हैं। मौसमी पलायन करने वाले पुरुषों में अवसाद के लक्षणों की समायोजित ऑड्स सात गुना अधिक थी, जबकि आर्थिक कर्ज में डूबे पुरुषों में यह उन प्रतिभागियों की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक थी, जो इन परिस्थितियों से नहीं गुजर रहे थे।
80 प्रतिभागियों में से 14 ने मानक स्क्रीनिंग प्रश्नावलियों में अवसाद के लक्षण बताए, जबकि आठ ने चिंता के लक्षणों की जानकारी दी। अध्ययन की प्रमुख लेखिका डॉ. किमनेहाइत वैफेई ने स्पष्ट किया कि ये परिणाम संभावित मानसिक तनाव का संकेत देते हैं और इन्हें चिकित्सकीय निदान नहीं माना जाना चाहिए।
शोधकर्ताओं ने आगाह किया कि प्रतिभागियों की कम संख्या और लक्षणों की जानकारी देने वाले लोगों की सीमित संख्या के कारण निष्कर्षों को प्रारंभिक माना जाना चाहिए। अध्ययन यह भी साबित नहीं करता कि कर्ज या पलायन सीधे तौर पर अवसाद का कारण बनते हैं।
आर्थिक असुरक्षा और पारिवारिक दबाव
प्रतिभागियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति अध्ययन के निष्कर्षों को समझने के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ उपलब्ध कराती है। इनमें से 82.5 प्रतिशत प्रतिभागी गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों से थे। वहीं, 56.3 प्रतिशत दिहाड़ी मजदूरी करते थे, 31.3 प्रतिशत ने मौसमी पलायन की जानकारी दी और 37.5 प्रतिशत पर आर्थिक कर्ज था। अधिकांश प्रतिभागी संयुक्त परिवारों में रहते थे, जबकि 70 प्रतिशत ने किसी न किसी प्रकार के नशीले पदार्थ के सेवन की जानकारी दी।
आकस्मिक मजदूरी और मौसमी रोजगार पर निर्भर परिवारों में गर्भावस्था के दौरान कमाई, घरेलू खर्च और स्थायी काम मिलने को लेकर अनिश्चितता बनी रह सकती है। पलायन के कारण जीवनसाथी से अलग रहने का तनाव भी बढ़ सकता है। इसके अलावा, होने वाले पिता गर्भावस्था और प्रसव के दौरान अपनी साथी के साथ मौजूद रह पाएंगे या नहीं, इसे लेकर भी अनिश्चितता हो सकती है।
हालांकि, ये उन संभावित कारणों की व्याख्याएं हैं, जो शोधकर्ताओं द्वारा पहचाने गए संबंधों को समझने में मदद कर सकती हैं। अध्ययन ने इन्हें प्रत्यक्ष कारण के रूप में स्थापित नहीं किया है।
निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि गर्भावस्था से जुड़े अनुभव महत्वपूर्ण हो सकते हैं। जिन पुरुषों की साथी की गर्भावस्था नियोजित थी, उनमें चिंता के लक्षणों की समायोजित ऑड्स कम थी। इसके विपरीत, पहले गर्भपात या गर्भावस्था के नुकसान का इतिहास चिंता के लक्षणों की काफी अधिक ऑड्स से जुड़ा पाया गया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने आगाह किया कि गर्भावस्था के नुकसान से जुड़े अनुमान सटीक नहीं थे, क्योंकि चिंता के लक्षण बताने वाले प्रतिभागियों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी।

सामाजिक सहयोग भी एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामने आया। जिन पुरुषों को अपने आसपास से अधिक सहयोग मिलने का एहसास था, उनमें अवसाद और चिंता के लक्षण कम पाए गए। वहीं, बेहतर मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का संबंध अधिक सामाजिक सहयोग महसूस करने से था। ये निष्कर्ष बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान परिवार के सहयोगपूर्ण रिश्ते और सामुदायिक नेटवर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, खासकर उन परिवारों में जो आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
आदिवासी होने वाले पिताओं पर ध्यान क्यों जरूरी
यह अध्ययन आदिवासी स्वास्थ्य से जुड़े शोध में मौजूद एक कमी को दूर करने की दिशा में प्रयास करता है। अब तक इस क्षेत्र में मुख्य रूप से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित किया जाता रहा है। सामान्य आबादी पर किए गए अध्ययनों के निष्कर्षों को स्वतः आदिवासी पुरुषों पर लागू नहीं किया जा सकता। इसी तरह, आदिवासी महिलाओं पर किए गए अध्ययनों के निष्कर्षों को भी जरूरी नहीं कि आदिवासी पिताओं पर समान रूप से लागू किया जा सके।
अध्ययन की सह-लेखिका डॉ. प्रभा एस. चंद्रा ने कहा कि ये निष्कर्ष प्रसवपूर्व देखभाल में पिताओं को भी शामिल करने वाली व्यवस्था को बेहतर बनाने और गर्भावस्था से प्रसव के आसपास की अवधि में मानसिक तनाव से जूझ रहे पुरुषों की शुरुआती पहचान करने में मदद कर सकते हैं।
इसके निहितार्थ केवल मानसिक स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं हैं। प्रसवपूर्व स्वास्थ्य सेवाएं होने वाले पिताओं में आर्थिक तनाव, पलायन से जुड़ी कठिनाइयों, नशीले पदार्थों के सेवन से संबंधित चिंताओं और सामाजिक सहयोग की कमी की पहचान करने का अवसर दे सकती हैं। इसके बाद मौजूदा मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के साथ उचित परामर्श और जरूरत के अनुसार अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के लिए रेफरल की व्यवस्था की जा सकती है।
ऐसा दृष्टिकोण गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों से ध्यान हटाने के बजाय उन्हें पूरक सहायता प्रदान करेगा। यह इस बात को भी स्वीकार करेगा कि परिवार की भावनात्मक और आर्थिक परिस्थितियां गर्भावस्था के अनुभव तथा प्रसव की तैयारी को प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि, अध्ययन की कुछ महत्वपूर्ण सीमाएं भी हैं। यह केवल एक आदिवासी क्षेत्र तक सीमित था और इसमें महज 80 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। साक्षात्कार मलयालम भाषा में मानक स्क्रीनिंग प्रश्नावलियों का उपयोग करके किए गए थे, लेकिन अध्ययन क्षेत्र के आदिवासी पिताओं के लिए इन उपकरणों का सांस्कृतिक अनुकूलन और उनकी वैधता स्थापित नहीं की गई थी।
शोधकर्ताओं ने बड़े स्तर पर ऐसे अध्ययन किए जाने की जरूरत बताई है, जिनमें गर्भावस्था से लेकर प्रसव के बाद की अवधि तक पुरुषों पर नजर रखी जाए। इससे विभिन्न आदिवासी समुदायों में मानसिक तनाव की व्यापकता का पता लगाने और प्रभावी हस्तक्षेपों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
अध्ययन का मूल संदेश यह नहीं है कि सभी आदिवासी होने वाले पिता मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते हैं, बल्कि यह है कि उनके अनुभवों पर अधिक शोध और ध्यान देने की जरूरत है। कर्ज, असुरक्षित रोजगार और मौसमी पलायन के भावनात्मक प्रभावों को दूर करना अधिक समावेशी मातृ एवं पारिवारिक स्वास्थ्य सेवाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
















