गिरिडीह
मारांग बुरू की धार्मिक आस्था, आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने आदिवासी समाज के लोगों से एकजुट होने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि मारांग बुरूधोरोमगढ़ का संरक्षण और देखभाल हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है। आदिवासी समाज को अपने अधिकारों, सम्मान और पहचान की रक्षा के लिए संगठित होना होगा।
मुख्यमंत्री गुरुवार को गिरिडीह जिले के पीरटांड़ स्थित मधुबन थाना मैदान में आयोजित ‘मारांग बुरू धोरोमगाड़ महासम्मेलन’ को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने संताली भाषा में जनसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि आदिवासी समाज को विशिष्ट सामाजिक अधिकार प्राप्त हैं और भारतीय संविधान में भी इन्हें मान्यता दी गई है। देश के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां आदिवासी समाज की सहमति और अनुमति के बिना कोई कार्य नहीं किया जा सकता। समाज के सर्वांगीण विकास के लिए सामूहिक सहभागिता और आपसी सहयोग जरूरी है।
महासम्मेलन के बाद सोशल मीडिया पर अपने संदेश में हेमन्त सोरेन ने मारांग बुरूको आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और स्वाभिमान का प्रतीक बताया। उन्होंने विभिन्न राज्यों से पहुंचे आदिवासी प्रतिनिधियों और सामाजिक अगुआओं का स्वागत करते हुए कहा कि सभी ने समाज, धर्म, संस्कृति और भविष्य को लेकर अपने विचार साझा किए। मारांग बुरूहमारी आस्था और पहचान के प्रतीक हैं और इन्हें बचाने के लिए सबको एकजुट होकर खड़ा होना होगा।

अपने दिवंगत पिता दिशोम गुरु शिबू सोरेन के संघर्ष को याद करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासी-मूलवासी समाज को एकजुट करने और उसके हक-अधिकारों की लड़ाई लड़ने में लगा दिया। गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया और उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाया। झारखंड राज्य के गठन के 25 वर्ष से अधिक समय बाद भी यदि आदिवासी समाज पीछे रह जाता है, तो यह चिंता का विषय है। उनके संघर्ष को आगे बढ़ाना और समाज को बिखरने से बचाना ही दिशोम गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
विधायक कल्पना सोरेन ने भी महासम्मेलन में अपनी भागीदारी का उल्लेख करते हुए मारांग बुरूके महत्व पर सवाल उठाने वालों को जवाब दिया। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा कि मारांग बुरूकेवल एक पहाड़ नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा, पहचान और अस्तित्व का आधार हैं। उन्होंने सवाल किया कि आज आदिवासी समाज से पूछा जा रहा है कि मारांग बुरूसे उसका संबंध कितना पुराना है और किस अभिलेख में इसका उल्लेख है। क्या किसी समाज की आस्था और सदियों पुरानी परंपरा का प्रमाण केवल कागजों में दर्ज कुछ पंक्तियां ही हो सकती हैं? मारांग बुरूहमारी आस्था भी हैं और पहचान भी।
मुख्यमंत्री ने आदिवासी समाज को देश का सबसे पुराना समाज बताते हुए कहा कि इसकी जड़ें मजबूत हैं, लेकिन समय के साथ इसकी शाखाएं अलग-अलग हो गई हैं। समाज के कुछ लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, जबकि कुछ सरना परंपरा से अपनी पहचान जोड़ते हैं। उन्होंने युवाओं से अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने की अपील की। अपने पिता दिशोम गुरु शिबू सोरेन और माता रूपी सोरेन के पारंपरिक विधि-विधान से संपन्न द्वादशकर्म का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को भी अपनी पारंपरिक मान्यताओं से परिचित होना चाहिए।
हमारे समाज में जीविकोपार्जन का मुख्य साधन पशुपालन व कृषि कार्य था, लेकिन वर्तमान पीढ़ी इससे दूर हो रहा है। उन्होंने कहा स्थानीय स्तर पर आप सभी ने सुदिव्य कुमार सोनू जी को विधायक बनाया था और मैने उन्हें मंत्री पद देकर क्षेत्र का मान बढ़ाया था, परंतु कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। वे हमलोग से दूर हो गये।

उन्होंने शिक्षा, बौद्धिक विकास और आर्थिक स्थिति के लिहाज से आदिवासी समाज की चुनौतियों पर चिंता जताई। कहा कि पूर्वजों से मिली विरासत और कृषि-पशुपालन जैसे पारंपरिक आजीविका के साधनों से नई पीढ़ी दूर होती जा रही है। झारखंड के विकास के लिए समाज को संगठित होकर आगे बढ़ना होगा।
हेमन्त सोरेन ने नशाखोरी को आदिवासी समाज की प्रगति में बड़ी बाधा बताते हुए लोगों से नशामुक्त समाज बनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार इसके लिए सामूहिक जागरूकता अभियान चला रही है। हड़िया और अवैध शराब के निर्माण एवं बिक्री से जुड़ी महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका और स्वरोजगार से जोड़ने के लिए फूलो-झानो आशीर्वाद योजना भी संचालित की जा रही है। मुख्यमंत्री ने महासम्मेलन में मिले ज्ञापन पर न्यायसंगत कार्रवाई और समाज को हरसंभव मदद का भरोसा भी दिया।
महासम्मेलन और मारांग बुरू का महत्व
गिरिडीह के पीरटांड़ स्थित पारसनाथ पहाड़ी को संताल समुदाय मारांग बुरूयानी महान पर्वत के रूप में पूजता है। यह आदिवासी समाज, विशेषकर संताल समुदाय की धार्मिक आस्था, प्रकृति से जुड़ी परंपराओं और सामूहिक सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है। मारांग बुरूधोरोमगाड़ महासम्मेलन का महत्व इसलिए भी विशेष है कि यह धार्मिक आस्था और विरासत के संरक्षण के साथ आदिवासी समाज के अधिकारों, पहचान और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों को एक साझा मंच पर लाता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वह पिछले 2 साल से कई सारे नजदीकी लोगों की मृत्यु से आहत हैं। उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि मंच के द्वारा जो ज्ञापन दिया गया है, उसपर पर न्याय संगत बात होगी। समाज के लोगों को हर संभव मदद मिलेगी।
महासम्मेलन में विधायक सोमेश सोरेन, कल्पना सोरेन, मारांग बुरूबचाओ संघर्ष मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष फागू बेसरा, महासचिव हीरालाल मांझी, जिला अध्यक्ष महावीर मुर्मू और सचिव विष्णु किस्कू सहित झारखंड के विभिन्न जिलों तथा असम, ओडिशा, बिहार, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आए आदिवासी प्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे।














