भुवनेश्वर
पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय और लोक कला का अनूठा संगम देखने को मिलता है। ओडिशा के खुर्दा जिले में एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील चिलिका के पास बरकुल में ओडी कला केंद्र के कलात्मक परिवेश में बसा यह संग्रहालय पुराने और नए कला रूपों व कलाकृतियों का अद्भुत मेल प्रस्तुत करता है। लोक वस्त्रों के साथ-साथ जनजातीय वस्त्र भी इसके संग्रह की विविधता और समृद्धि को बढ़ाते हैं।
32 दीर्घाओं में फैले इस संग्रहालय में 2,000 से अधिक प्रदर्श हैं, जो न केवल ओडिशा की कला और संस्कृति का प्रतिबिंब हैं, बल्कि भारत के अन्य राज्यों और विभिन्न देशों की सांस्कृतिक परंपराओं का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
संग्रहालय में रखे कुछ प्रदर्श सदियों पुराने हैं। इनमें 1 क्विंटल से अधिक वजन वाली पीतल की पूजा घंटी भी शामिल है। एक अन्य उल्लेखनीय प्रदर्श 6 फीट लंबा और 3 फीट चौड़ा नक्काशीदार लकड़ी का दरवाजा है, जिस पर सौरा शैली के चित्रांकन उकेरे गए हैं। 200 वर्ष से अधिक पुराना यह दरवाजा जनजातीय ओडिशा की समृद्ध कलात्मक विरासत का प्रमाण है। इनके अलावा संग्रहालय के भंडार कक्ष में रखी 500 से अधिक कलाकृतियां भी इसकी सांस्कृतिक संपदा की व्यापकता का प्रमाण देती हैं और प्रदर्शन के इंतजार में हैं।

“यह संग्रहालय, जहां जनजातीय और लोक कला तथा कलाकृतियां एक साथ आकर सांस्कृतिक समृद्धि को प्रतिबिंबित करती हैं, ओडिशा में अपनी तरह का अनूठा है। मुझे लगता है कि पूरे भारत में भी यह विशिष्ट है,” पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय के सचिव और फिल्म निर्माता बिश्वेश्वर दास ने द इंडियन ट्राइबल से कहा।
पट्टचित्र, ताड़पत्र उत्कीर्णन और बारीक शिल्पकारी
लोक चित्रकला की शैली पट्टचित्र में बना ‘शंख नवि क्षेत्र’, जिसमें तीर्थनगरी पुरी और उसकी दिव्य त्रिमूर्ति—भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा—का चित्रण है, बिश्वेश्वर के दावे को सही साबित करता है।
11 फीट ऊंची और 15 फीट चौड़ी संग्रहालय की पूरी दीवार पर फैली यह प्रभावशाली कृति 150 वर्ष पुराने एक कहीं बड़े मूल चित्र की पुनर्रचना है, जो डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय ‘न्यू कार्ल्सबर्ग ग्लिप्टोटेक’ में रखा गया है।
हालांकि, यह पुनर्रचना मूल कृति की हूबहू प्रतिकृति नहीं है। ओडी कला केंद्र और पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय के संस्थापक-निदेशक प्रसन्न कुमार दाश के अनुसार, इसमें कुछ बदलाव किए गए हैं ताकि ओडिया कलाकारों और शिल्पकारों की कलात्मक उत्कृष्टता और विशिष्टता को सामने लाया जा सके।


“मूल शंख नवि क्षेत्र में पुरी को शंख के भीतर धर्म क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है और इसमें ब्रिटिश नाविकों का एक समूह दिखाई देता है। लेकिन हमारे शंख नवि क्षेत्र में, जिसे 2017 में भुवनेश्वर के प्रसिद्ध पट्टचित्र कलाकार तन्मय महापात्र ने बनाया था, ब्रिटिश नाविकों की जगह उनके भारतीय समकक्षों को दिखाया गया है,” प्रसन्न कहते हैं।
शंख नवि क्षेत्र के अलावा, ताड़पत्र उत्कीर्णन की दीर्घा भी तुरंत ध्यान आकर्षित करती है। यहां एक प्रदर्श में महाकवि कालिदास की संस्कृत की शास्त्रीय कृति ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ ताड़पत्रों पर अंकित है, जिसके साथ रंगीन चित्र भी बनाए गए हैं।
एक अन्य उल्लेखनीय प्रदर्श 9 फीट ऊंची देवी दुर्गा की प्रतिमा है, जिसे सींगों से बने शिल्प से तैयार किया गया है। इसके दोनों ओर देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं हैं। यह पूरी कलाकृति कांच की पृष्ठभूमि के सामने प्रदर्शित की गई है।
शिल्पकला की यह जटिल कृति गजपति जिले के जिला मुख्यालय पारलाखेमुंडी से संग्रहित की गई थी। पारलाखेमुंडी के कारीगरों ने बंगाल के अपने समकक्षों के साथ मिलकर इसे तैयार किया था। 20 वर्ष से अधिक पहले कोलकाता के हाटी बागान सार्वजनीन क्लब के दुर्गा पूजा पंडाल के लिए बनाई गई इस उत्कृष्ट कृति के मुख्य कलाकार संजीव साहा ने बाद में इसे पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय को भेंट कर दिया।
जनजातीय वस्त्रों में बुनी ओडिशा की सांस्कृतिक विविधता
कालाहांडी के जनजातीय कुटिया कोंध समुदाय से जुड़े हबासपुरी वस्त्र और कोरापुट जिले के मिरगन समुदाय द्वारा बुने गए कोटपाड़ कपड़े संग्रहालय की दीर्घाओं की शोभा बढ़ाते हैं। रायगढ़ा के डोंगरिया कोंध समुदाय की कढ़ाईदार कपड़ागंधा शॉल भी यहां का प्रमुख आकर्षण हैं।

सुबर्णपुर के बोमकाई वस्त्र और गंजाम का बेरहामपुर पट्टा, जिसे गैर-जनजातीय बुनकर अपनी विशिष्ट बंधा या इकत तकनीक से तैयार करते हैं, एक अलग खंड में प्रदर्शित किए गए हैं। जनजातीय और गैर-जनजातीय कारीगरों द्वारा तैयार टेराकोटा और डोकरा शिल्प के साथ पुरी जिले की कागज-मिट्टी की कलाकृतियां भी संग्रहालय के संग्रह की भव्यता बढ़ाती हैं।
प्रदर्शित वस्त्रों में एक और अद्भुत उदाहरण केरंग है। यह कोरापुट जिले के ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले गदबा जनजातीय समुदाय द्वारा हाथ से बुना कपड़ा है। गदबा कारीगर जंगली केरंग पौधे की भीतरी छाल निकालते हैं। इसके बाद उसे धोकर धूप में सुखाया जाता है, पीटा जाता है और मरोड़कर धागे तैयार किए जाते हैं। इन धागों को तकली और चावल की भूसी की मदद से काता जाता है और फिर जमीन पर लगाए गए करघों पर बांस की छड़ों, सींग से बने विभाजकों और साही की हड्डी की सहायता से बुना जाता है। वनस्पति रंगों से रंगे केरंग कपड़े की प्रमुख पहचान लाल, सफेद और नील रंग की खड़ी धारियां हैं।
संग्रहालय में डोकरा, टेराकोटा, सजावटी पैबंदकारी, काइंचा यानी सुनहरी घास और सबाई घास से बने शिल्प, पत्थर की मूर्तियां और मुखौटे समेत कई अन्य शिल्प भी प्रदर्शित किए गए हैं।
गंजाम जिले की ओसाकौठी चित्रकला के साथ-साथ ओडिशा की छाया कठपुतली परंपरा से जुड़े पुतले और आकृतियां भी संग्रहालय के समृद्ध संग्रह में चार चांद लगाते हैं।
भील और गोंड चित्रों से अंतरराष्ट्रीय कला तक
संग्रहालय में भारत के अन्य राज्यों की कला और कलाकृतियां भी प्रदर्शित हैं। इनमें मध्य प्रदेश के भील और गोंड जनजातीय समुदायों की चित्रकलाएं, छत्तीसगढ़ के संताल समुदाय से जुड़ी चित्रकलाएं, आंध्र प्रदेश की छाया कठपुतली से संबंधित कलाकृतियां, बिहार की मधुबनी चित्रकला, उत्तर प्रदेश की सांझी कला, राजस्थान की लघु चित्रकला, महाराष्ट्र की वारली चित्रकला और हिमाचल प्रदेश की थंका चित्रकला शामिल हैं।


इन सभी को एक साथ देखा जाए तो यह संग्रहालय शिल्प और संस्कृति, कला और कलात्मकता, विरासत और साहित्य, रीति-रिवाज और परंपराओं का भंडार बन जाता है।
इसके अंतरराष्ट्रीय खंड में भी कई देशों के प्रदर्श रखे गए हैं। इनमें घाना के समुदायों से जुड़ा पारंपरिक ग्यिल नामक वाद्य यंत्र, साथ ही कोरियाई, नेपाली और वियतनामी चित्रकलाएं तथा जापानी गुड़ियां शामिल हैं।
संग्रहालय में भारतीय जनजातीय वाद्य यंत्रों में धुदुकी, ढोल, चांगू, बांसुरी और तुमदक भी रखे गए हैं। संग्रहालय की मार्गदर्शक दीप्ति रंजन के अनुसार, केंद्रा, मर्दला, महुरी, वीणा, बज्र वीणा और सरोद जैसे पारंपरिक वाद्य भी यहां के प्रमुख प्रदर्श हैं।
सांस्कृतिक जुनून और जन सहयोग से बना संग्रहालय
पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय का विकास जगतसिंहपुर जिले में स्थित सांस्कृतिक गैर-लाभकारी संस्था ग्रामीण साहित्य विकास समिति ने किया है। इसका उद्घाटन 2017 में ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने किया था।
शुरुआत में संग्रहालय 2 भवनों में फैली 16 दीर्घाओं वाला था, जहां 800 से अधिक कलाकृतियां प्रदर्शित थीं। 2024 में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों भारतीय जीवन बीमा निगम और पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड की कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व पहल के तहत वित्तीय सहायता से 16-16 दीर्घाओं वाले 2 अतिरिक्त भवन विकसित किए गए। दोनों संस्थाओं ने इन 2 अतिरिक्त भवनों की स्थापना के लिए करीब 50-50 लाख रुपये का योगदान दिया।
“मैं केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय का आभारी हूं, जिसने पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अपनी संग्रहालय अनुदान योजना के तहत 3 करोड़ रुपये दिए। मैं राज्य पर्यटन एवं संस्कृति विभाग का भी आभारी हूं, जिसने कलाकृतियों के संग्रह के लिए करीब 50 लाख रुपये उपलब्ध कराए,” सेवानिवृत्त नौकरशाह प्रसन्न कहते हैं।
वह याद करते हैं कि 2011 में संग्रहालय पर काम शुरू होने के बाद वह और उनकी टीम कलाकृतियां जुटाने के लिए व्यापक यात्राओं पर निकले थे।
“मिसाल के तौर पर, हमने सौरा शैली की नक्काशी वाला 200 वर्ष पुराना लकड़ी का दरवाजा राजस्थान से संग्रहित किया। इसी तरह, हमने पंजाब के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित भटिंडा से पाकिस्तान द्वारा दागा गया एक विस्फोटित न हुआ मोर्टार भी संग्रहित किया। उसे सजाकर हमने अपने संग्रहालय में एक दीपक के रूप में प्रदर्शित किया है,” प्रसन्न कहते हैं।
चेन्नई में जन्मा विचार, बना सांस्कृतिक केंद्र
संग्रहालय स्थापित करने का विचार 2007–08 में चेन्नई की एक आधिकारिक यात्रा के दौरान आकार लेने लगा। उस समय प्रसन्न नई दिल्ली स्थित केंद्रीय वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे।


यात्रा के दौरान उन्होंने दक्षिणचित्र का दौरा किया, जो मुख्य रूप से तमिलनाडु की पारंपरिक वास्तुकला को प्रदर्शित करने वाला संग्रहालय है। इस अनुभव ने उन्हें पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय स्थापित करने के लिए प्रेरित किया—ऐसा स्थान जो ओडिशा और पूरे भारत की व्यापक कलात्मक, सांस्कृतिक और विरासत परंपराओं का एक लघु रूप प्रस्तुत कर सके।
प्रेरणा का एक अन्य स्रोत दिवंगत जर्मन विद्वान हरमन कुल्के थे। जब प्रसन्न प्रबंध संपादक और कुल्के संपादक के रूप में कार्य कर रहे थे, तब उन्होंने 30 विद्वानों—जिनमें 29 विदेशी थे—के योगदान से 2 खंडों में ‘इमेजिंग ओडिशा: द इमर्जेंस ऑफ कल्चरल आइडेंटिटी ऑफ एन इंडियन स्टेट’ नामक प्रकाशन तैयार किया।
प्रकाशन के लिए जुटाई गई कलात्मक और स्थापत्य तस्वीरों को देखने के बाद कुल्के ने प्रसन्न को संग्रहालय स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
“हमने दोनों खंडों के लिए ब्रिटिश संग्रहालय और ब्रिटिश पुस्तकालय से 100 से अधिक तस्वीरें जुटाई थीं। तस्वीरों में कैद ओडिशा की कला और वास्तुकला की सुंदरता से प्रभावित होकर कुल्के ने मुझे संग्रहालय स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसी तरह पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय की अवधारणा ने आकार लिया,” प्रसन्न कहते हैं।
संग्रहालय के विस्तार की बड़ी योजनाएं
5 एकड़ में फैला ओडी कला केंद्र ओडिशा और भारत की परंपराओं तथा संस्कृति की समृद्धि को समेटे हुए है और इसमें अंतरराष्ट्रीय रंग भी जुड़ा है। भुवनेश्वर के शिक्षक भवानी कुमार स्वैन के अनुसार, करीब 1 एकड़ में फैला इसका संग्रहालय जनजातीय और लोक कला तथा कलाकृतियों का लघु स्वरूप प्रस्तुत करता है।


स्वैन, जो इस केंद्र और संग्रहालय को भारत में एक दुर्लभ संयोजन मानते हैं, पिछले वर्ष अपने परिवार के साथ चिलिका झील, ओडी कला केंद्र और पुरवाशा लोक एवं जनजातीय संग्रहालय देखने पहुंचे थे।
आगंतुक लगातार संग्रहालय और इसके संग्रह की प्रशंसा करते हैं, लेकिन प्रसन्न इसे और विस्तार देने तथा विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहे हैं, ताकि इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के महानगरीय संग्रहालयों के स्तर तक पहुंचाया जा सके।
“हम क्यूआर कोड शुरू करने की योजना बना रहे हैं। हम शोधकर्ताओं को प्रत्येक कलाकृति के इतिहास और ऐतिहासिक महत्व का अध्ययन करने के लिए भी आमंत्रित करेंगे। संग्रहालय के विस्तार के लिए 16 और दीर्घाएं जोड़ी जाएंगी। संग्रहालय को चौबीसों घंटे चालू रखने के लिए हम सौर ऊर्जा प्रणाली लगाएंगे। इस तरह संग्रहालय को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए हमारे पास बहुत कुछ करने को है,” प्रसन्न कहते हैं।
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