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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » कला और संस्कृति » नक्सली गढ़ से पर्यटन हब तक, बदलाव की ओर बस्तर

नक्सली गढ़ से पर्यटन हब तक, बदलाव की ओर बस्तर

एक समय था जब छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला नक्सली गढ़ के रूप में कुख्यात था, लेकिन अपनी प्राकृतिक सुंदरता और अनूठी आदिवासी जीवनशैली के लिए अब पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हो रहा है। The Indian Tribal की रिपोर्ट

November 27, 2023
Bastar Homestay

धुरवा डेरा बस्तर होमस्टे का स्वागत द्वार

जगदलपुर

बहुत समय नहीं गुजरा जब आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ के बस्तर और दंतेवाड़ा का नाम आते ही लोगों में भय फैल जाता था। नक्सलियों का खौफ इस कदर कि उन क्षेत्रों में जाने से भी लोग कतराते, लेकिन वामपंथी उग्रवाद अब कुंद पड़ गया है। अब जिले में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी के साथ उभर कर आ रहा है नया बस्तर।

कभी इस बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था, लेकिन अब आश्चर्य की बात नहीं है कि गांव-गांव बिजली पहुंच रही है। जल जीवन मिशन के तहत सौर ऊर्जा के माध्यम से पेयजल आपूर्ति की परियोजनाएं चल रही हैं। साथ ही साथ पर्यटकों के लिए होमस्टे (विश्राम स्थल)  और जंगल ट्रेल्स बन रहे हैं।

जिला मुख्यालय जगदलपुर से 40 किलोमीटर दूर कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के गांवों में रोजगार के साधन बढ़ाने के लिए स्थानीय युवाओं को पर्यटक गाइड के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है।

Dhurwa Dera, Bastar
धुरवा डेरा में कायाकिंग का आनंद लें (तस्वीर – अन्ज़ार नबी)

होमस्टे विकास परियोजना के तहत 10 लाभार्थियों को एक लाख रुपये का ऋण वितरित किया गया है। इस क्षेत्र के धुरवा डेरा में कयाकिंग और कांगेर घाटी के तीरथगढ़ जलप्रपात क्षेत्र में मानसून ट्रेल्स पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनते जा रहे हैं।

पर्यावरण पर्यटन यानी ईको टूरिज्म को बढ़ावा देने के सरकार के प्रयासों के बारे में कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक धम्मशिल गणवीर ने The Indian Tribal को बताया कि जितनी बड़ी संख्या में लोग बस्तर देखने आने के लिए रूचि दिखा रहे हैं, इसके मद्देनजर यहां और अधिक होमस्टे बनाने की आवश्यकता है। कांगेर घाटी पार्क प्रबंधन केंद्र सरकार को 50 नए होमस्टे बनाने का प्रस्ताव भेजने की प्रक्रिया में है। इसके साथ ही इस जगह को यूनेस्को विरासत स्थल का दर्जा देने का प्रस्ताव भी भेजा जा रहा है।

उन्होंने कहा कि कांगेर घाटी को यूनेस्को विरासत स्थल का दर्जा देने के प्रयासों के तहत एक परामर्शदात्री कार्यशाला का आयोजन किया गया था। इस उपलब्धि को हासिल करने के लिए भारतीय पर्यटन और यात्रा प्रबंधन संस्थान के साथ मिलकर कदम उठाए जा रहे हैं। 

उन्होंने कहा कि आदिवासियों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है, ताकि वे भविष्य में अपने दम पर होमस्टे यानी विश्राम स्थलों का संचालन कर सकें। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग एक साथ मिलकर सामुदायिक होमस्टे बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

Bastar Tourism
धुरवा डेरा में कयाकिंग सुविधाएं उपलब्ध हैं
Bastar District, Chhattisgarh
चरम मानसून के दौरान तीरथगढ़ जलप्रपात की ताकत और मात्रा बढ़ जाती है

रोजगार के अवसर सुनिश्चित करने के लिए पर्यटन को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है, लेकिन ये प्रयास कहीं-कहीं हानिकारक भी हो सकते हैं। विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में, जहां बड़ी संख्या में आदिवासी रहते हैं।

लेकिन कांगेर घाटी से लगभग आठ किमी दूर दूधमारस गांव में धुरवा डेरा होमस्टे के मालिक मानसिंह बघेल कहते हैं कि यदि स्थिरता के पहलू को ध्यान में रखा जाए, तो पर्यटकों का आना कोई समस्या नहीं है। उनका यह विश्राम स्थल पिछले साल दिसंबर में ही खुला था। इसी तरह तीरथगढ़ जलप्रपात में भी कांगेर घाटी प्रबंधन ने पर्यटकों की मदद के लिए पर्यावरण विकास समिति बनाई है।

इस समिति के एक सदस्य उमेश बघेल ने कहा कि वर्तमान में समिति के 23 सदस्य हैं। इनमें 13 महिलाएं हैं। हालांकि, कुछ युवा उच्च शिक्षा के लिए चले गए हैं, जबकि कुछ महिलाओं की शादी हो गई है। 

उमेश के अनुसार, इस क्षेत्र में तीरथगढ़ झरना मुख्य आकर्षण का केंद्र है। हालांकि आसपास भी कई छोटे झरने हैं, जहां पर्यटकों को घुमाने ले जाया जाता है। हां, यदि इनमें पानी का स्तर अधिक होता है, तो पर्यटकों को वहां जाने से रोक दिया जाता है। यहां आना काफी साहसिक और रोमांचक होता है, लेकिन पर्यटकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अनावश्यक जोखिम से बचते हैं। हालांकि, यहां पर्यटकों को वास्तविक जंगल का अनुभव होता है और वे बड़े शौक से आदिवासी भोजन का स्वाद चखते हैं। यदि बारिश न हो तो हम पर्यटकों के लिए अलाव के साथ-साथ गाने और नृत्य की भी व्यवस्था करते हैं।

Bastar Tourism
धुर्वा डेरा होमस्टे जहां यात्रियों को आदिवासी भोजन का स्वाद मिलता है

उमेश कहते हैं कि चूंकि पर्यटक आदिवासी संस्कृति को खूब पसंद करते हैं और इसे सराहते हैं, इसलिए समिति से जुड़े हम जैसे युवाओं की यह जिम्मेदारी बनती है कि अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाएं और इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।

पर्यावरण विकास समिति पर्यटकों द्वारा छोड़े गए प्लास्टिक सामान और बोतलों के जिम्मेदारीपूर्ण निपटान के बारे में भी जागरूकता फैलाती है। समिति यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती है कि पर्यटन क्षेत्र पूरी तरह साफ-सुथरे रहें। जो पर्यटक बहुत अधिक रोमांचपूर्ण गतिविधियों में हिस्सा लेने में रूचि नहीं रखते, उनके लिए धुरवा डेरा होमस्टे हमेशा तैयार रहता है, जहां अब तक पर्यटकों के लगभग 20 समूह अपना समय गुजारने आ चुके हैं।

मानसिंह बघेल कहते हैं कि यहां अकेले पर्यटक कम आते हैं। नाममात्र भोजन शुल्क के साथ यहां एक रात ठहरने का 1500 रुपये लगता है। हम यहीं खाना बनाते और मेहमानों को परोसते हैं। पर्यटकों के लिए बस्तर की मैना एक अतिरिक्त आकर्षण होता है, जो यहां आसानी से देखी जा सकती है। पिछले साल स्थानीय युवाओं को मैना मित्र के रूप में शामिल करने वाले गणवीर कहते हैं कि बस्तर में मैना की आबादी पुन: बढ़ रही है और यह पक्षी अब 15 गांवों में बहुतायत में दिखाई दे रहे हैं।

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मुख्यमंत्री सोरेन से मुंडा समाज का अनुरोध

झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन से आज मुंडा समाज के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात कर उन्हें अवगत कराया कि तमाड़ विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत बुंडू अंचल की छह पंचायतों के 18 गांवों के ऑनलाइन खतियान में जाति का नाम ‘मुंडा’ के स्थान पर ‘स्वासी’ अंकित है, जिसके कारण संबंधित ग्रामीणों को विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से ऑनलाइन खतियान में जाति के नाम के गलत अंकन में सुधार कराते हुए ‘स्वासी’ के स्थान पर ‘मुंडा’ दर्ज कराने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल की समस्याओं को गंभीरतापूर्वक सुना तथा इस संबंध में नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की दिशा में पहल करने का आश्वासन दिया।
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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