प्रयागराज/नई दिल्ली
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2013 में फैसला दिया था कि डोंगरिया कोंध समुदाय की ग्राम सभाएं ही अंतिम निर्णय लेंगी। जुलाई और अगस्त 2013 के बीच ओडिशा की नियामगिरि पहाड़ियों के सभी 12 गांवों ने ‘ना’ में मतदान किया। उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनियों में से एक वेदांता रिसोर्सेज के खिलाफ वोट दिया, जो उनके पवित्र पर्वत पर खनन करना चाहती थी। अदालत ने इन सभी फैसलों को बरकरार रखा।
“सभी आदिवासी जेल जाने के लिए तैयार हैं, लेकिन हम सरकार के दबाव के सामने नहीं झुकेंगे,” नियामगिरि सुरक्षा समिति के अध्यक्ष कुमुटी माझी ने कहा, जिसने इस प्रतिरोध का नेतृत्व किया था।
डोंगरिया कोंध समुदाय के उस सामूहिक फैसले ने जैव विविधता से समृद्ध उस पर्वतीय क्षेत्र को बचाया, जो भारत के महत्वपूर्ण वन कार्बन सिंकों में से एक है। अब कल्पना कीजिए कि जब डोंगरिया कोंध जैसे समुदायों के पास ‘ना’ कहने की कानूनी शक्ति ही न रहे तो क्या होगा।
आदिवासी वनों पर टिकी भारत की जलवायु प्रतिबद्धता
भारत ने दुनिया के सामने एक बड़ा वादा किया है। संयुक्त राष्ट्र को सौंपे गए अपने संशोधित नेशनल डिटरमाइंड कॉन्ट्रिब्यूशन (NDC) के तहत भारत ने 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन अतिरिक्त CO2 समतुल्य कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य रखा है, जो मुख्य रूप से वन क्षेत्र बढ़ाने के जरिए हासिल किया जाना है।
यह लक्ष्य केवल कागजों तक सीमित नहीं है। दिसंबर 2024 में UNFCCC को सौंपी गई भारत की द्विवार्षिक जलवायु रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में देश के वन और भूमि उपयोग क्षेत्र ने कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का लगभग 22 प्रतिशत अवशोषित किया। यह भारत की पूरी जलवायु संरचना में सबसे बड़ा घरेलू कार्बन ऑफसेट है।
इन जंगलों की रक्षा कौन करता है? नेशनल मिशन फॉर ग्रीन इंडिया इसका स्पष्ट उत्तर देता है। भारत में 27.5 करोड़ ग्रामीण लोग अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। इनमें 8.9 करोड़ आदिवासी हैं, जो पीढ़ियों से इन जंगलों में रहकर उनका संरक्षण और प्रबंधन करते आए हैं।
भारत अपने अंतरराष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जंगलों पर निर्भर है और जंगलों की रक्षा के लिए आदिवासी समुदायों पर। लेकिन इन समुदायों को कानूनी रूप से सशक्त बनाने वाले ढांचे अब भी बेहद कमजोर तरीके से लागू किए गए हैं।
वह कानून जिसने सब कुछ देने का वादा किया, लेकिन बहुत कम दिया
अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006, जिसे आमतौर पर वनाधिकार कानून (FRA) कहा जाता है, इसी समस्या के समाधान के लिए लाया गया था। इस कानून ने वनवासियों को भारत के लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर जंगलों पर अधिकार मान्यता देने और ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधन क्षेत्रों के संरक्षण व प्रबंधन का अधिकार देने का वादा किया।
सैद्धांतिक रूप से FRA ने आदिवासी समुदायों को भारत के सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्रों का कानूनी संरक्षक बना दिया। लेकिन व्यवहार में इसका क्रियान्वयन विफल साबित हुआ।
राइट्स एंड रिसोर्सेज इनिशिएटिव की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के लगभग 1.70 लाख गांवों में फैले 4 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र सामुदायिक वन संसाधन मान्यता के योग्य हैं। लेकिन इस योग्य क्षेत्र का केवल लगभग 1.2 प्रतिशत ही आधिकारिक रूप से दर्ज और मान्यता प्राप्त कर सका है।
| कानून का वादा | वास्तविक स्थिति |
| 4 करोड़ हेक्टेयर पर CFR अधिकार | केवल लगभग 4.8 लाख हेक्टेयर मान्यता प्राप्त (करीब 1.2%) |
| 1.70 लाख गांव पात्र | अधिकांश गांवों को अब तक अधिकार पत्र नहीं मिले |
| ग्राम सभा को वन प्रबंधन का अधिकार | कई राज्यों में वन विभागों ने कमजोर किया |
| वन भूमि हस्तांतरण से पहले सामुदायिक सहमति | 2023 संशोधन में अनिवार्यता खत्म |
इसके पीछे के कारण भी स्पष्ट हैं। वन और राजस्व विभागों के बीच समन्वय की कमी है। राज्य की नौकरशाही लंबे समय से वनवासियों को संरक्षक की बजाय अतिक्रमणकारी मानती रही है। राजनीतिक दबाव भी लगातार समुदायों की बजाय औद्योगिक हितों को प्राथमिकता देता है।
वह कानून जिसने समुदायों के पैरों तले जमीन खिसका दी
2023 में स्थिति और बिगड़ गई। वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 ने वन भूमि हस्तांतरण से पहले ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति की शर्त हटा दी। यह वही एक संस्थागत व्यवस्था थी जिसके जरिए आदिवासी समुदाय अपने जंगलों पर बाध्यकारी अधिकार का इस्तेमाल कर सकते थे।
छत्तीसगढ़ में राज्य वन विभाग ने खुद को सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन का नोडल एजेंसी घोषित करने की कोशिश की, जिससे ग्राम सभा की भूमिका लगभग समाप्त हो जाती।
इसी बीच IPCC की छठी आकलन रिपोर्ट, जिसे दशकों में तैयार सबसे व्यापक वैश्विक जलवायु विज्ञान दस्तावेज माना जाता है, ने निष्कर्ष निकाला कि समुदाय आधारित वन प्रबंधन वाले क्षेत्रों में वनों की कटाई कम होती है, जैव विविधता अधिक रहती है और कार्बन अवशोषण भी ज्यादा होता है। लेकिन भारत की नीतियां वैज्ञानिक प्रमाणों के उलट दिशा में आगे बढ़ती दिख रही हैं।
अदालत ने देखा जिसे नीति नजरअंदाज कर रही है
मार्च 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एम.के. रंजीतसिंह एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का विस्तार करते हुए उसमें जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से सुरक्षा को भी शामिल किया।
वनवासी समुदाय केवल जलवायु अन्याय के पीड़ित नहीं हैं, बल्कि अदालत की टिप्पणी के अनुसार वे इस संकट से निपटने के लिए अनिवार्य भागीदार हैं। जंगलों पर आदिवासी शासन स्वयं एक जलवायु अवसंरचना है और उसे भी बांध या सोलर पार्क जैसी संस्थागत सुरक्षा और सार्वजनिक निवेश मिलना चाहिए।
क्या बदलना जरूरी है और क्या शुरू हो चुका है
2024 में केंद्र सरकार ने वनाधिकार मान्यता प्रक्रिया को तेज करने के लिए पीएम जनजातीय उन्नत ग्राम अभियान शुरू किया। योजना उम्मीद जगाती है, लेकिन जब तक इसे भारत की NDC प्रतिबद्धताओं से स्पष्ट रूप से नहीं जोड़ा जाता और पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिलती, तब तक इसका असर सीमित रहेगा।
विशेषज्ञों और अदालतों का कहना है कि तीन बदलाव अब और टाले नहीं जा सकते।
- सरकार को सामुदायिक वन संसाधन मान्यता का स्पष्ट और मापनीय लक्ष्य तय करना चाहिए तथा उसे UNFCCC को दी जाने वाली रिपोर्ट में शामिल करना चाहिए।
- पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में वन भूमि हस्तांतरण के लिए ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति बहाल करनी चाहिए।
- आदिवासी पारिस्थितिक ज्ञान को राज्य आपदा प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन योजनाओं का व्यावहारिक हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
नवंबर 2025 में ब्राजील के बेलेम में आयोजित COP30 में भारत ने खुद को जलवायु नेतृत्वकर्ता के रूप में पेश किया। सम्मेलन में 5,000 से अधिक स्वदेशी प्रतिनिधियों की भागीदारी रही, जो अब तक किसी भी COP में सबसे ज्यादा थी। हालांकि भारत का शीर्ष नेतृत्व नेताओं के शिखर सम्मेलन में अनुपस्थित रहा।
अब जब वैश्विक जलवायु वार्ताएं COP31 के लिए तुर्किये के अंताल्या की ओर बढ़ रही हैं, तब भारत की जलवायु नेतृत्व की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि छत्तीसगढ़ या ओडिशा की किसी ग्राम सभा के पास अपने जंगलों की रक्षा करने की वास्तविक शक्ति कितनी है।
डोंगरिया कोंध समुदाय ने 12 सामूहिक फैसलों से एक पर्वत को बचाया था। भारत की जलवायु रणनीति को अब सिर्फ एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि 1.70 लाख गांवों में ऐसी क्षमता की जरूरत है।
(लेखक जी.बी. पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज में ICSSR फेलो हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)














