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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » द इंडियन ट्राइबल / उप्लाब्धिकर्ता » छत्तीसगढ़ के बारनवापारा अभयारण्य में महिला आदिवासी वनरक्षक की अनोखी मुहिम

छत्तीसगढ़ के बारनवापारा अभयारण्य में महिला आदिवासी वनरक्षक की अनोखी मुहिम

वह और उनकी 10 सदस्यीय टीम अभयारण्य के कोठारी रेंज में फसल नुकसान कम करने और हाथियों व आदिवासी समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दिन-रात मेहनत करती है। The Indian tribal बता रहा है कि वे यह काम कैसे करती हैं

May 22, 2026
The Indian tribal

अपनी टीम के साथ कमलेश्वरी पैंकरा

रायपुर/नई दिल्ली

किसी भी सामान्य दिन में वनरक्षक कमलेश्वरी पैंकरा सुबह करीब सात बजे अपनी ड्यूटी शुरू करती हैं। वह 10 समर्पित सदस्यों की टीम का नेतृत्व करती हैं, जिनकी जिम्मेदारी मानव-हाथी संघर्ष रोकना और फसलों को नुकसान से बचाना है।

उनका कार्यक्षेत्र मध्य छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार-भाटापारा जिले स्थित बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य की कोठारी रेंज के भीतर है, जहां हाथियों की मौजूदगी हमेशा बनी रहती है। वर्ष 1976 में स्थापित यह अभयारण्य 245 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।

2017 में वन सेवा में शामिल होने के बाद पैंकरा की पहली पोस्टिंग 2019 में बारनवापारा में हुई। उन्होंने The Indian Tribal से कहा, “इस फील्ड जॉब से पहले मैंने पड़ोसी महासमुंद जिले में छह महीने का कठिन प्रशिक्षण लिया और धैर्यपूर्वक अपनी ड्यूटी का इंतजार किया।”

फिलहाल पैंकरा के नेतृत्व में 2023 में गठित 10 स्थानीय लोगों का एक समूह काम कर रहा है। उनकी जिम्मेदारी इस “हाथी मित्र दल” का मार्गदर्शन और संचालन करना है। यह टीम आमतौर पर उन रास्तों पर गश्त करती है, जहां एक दिन पहले हाथियों की मौजूदगी की पुष्टि हुई हो।

पैंकरा ने बताया कि बारनवापारा के भीतर करीब 30 हाथी हैं। अभयारण्य के अंदर अभी भी 18 गांव बसे हुए हैं, जिनमें अधिकतर आदिवासी बहुल हैं। इससे पहले तीन गांवों का पुनर्वास किया जा चुका है, जबकि कुछ अन्य गांव भी पुनर्वास की सूची में हैं।

The Indian Tribal
वनरक्षक कमलेश्वरी पैंकरा

उन्होंने कहा, “कभी-कभी हम हाथियों को सीधे देख लेते हैं, तो कई बार उनके गोबर से उनकी मौजूदगी का पता चलता है। कई बार वे बांस की पत्तियां और कोपलें खाकर अपनी उपस्थिति जाहिर कर देते हैं, क्योंकि यह उनका पसंदीदा भोजन है। ये हाथी 2019-2020 के आसपास बेहतर आवास की तलाश में यहां आए और फिर यहीं रुक गए।”

हाथियों की निगरानी

छत्तीसगढ़ में कई “हाथी मित्र दल” सक्रिय हैं, क्योंकि राज्य के मध्य और उत्तरी हिस्सों में मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं काफी अधिक होती हैं। गांवों से चुने गए इन लोगों का काम हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखना और समुदायों को संघर्ष से बचने के तरीके समझाना है।

धान की कटाई के मौसम यानी नवंबर-दिसंबर के दौरान हाथी अक्सर खेतों पर हमला करते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार, राज्य में लगभग 37 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है, जो मुख्यतः वर्षा आधारित है और ऊंचे व निचले दोनों इलाकों में फैली हुई है।

जिन गांवों में हाथियों की मौजूदगी अधिक होती है, वहां लोगों को जंगल में न जाने की सलाह दी जाती है। लेकिन कई आदिवासी और वनवासी लघु वनोपज संग्रह पर निर्भर हैं। धान कटाई के अलावा गर्मियों में महुआ संग्रह का मौसम (मार्च-अप्रैल) भी हाथियों को आकर्षित करता है, क्योंकि महुआ के फूलों की मिठास और तेज सुगंध उन्हें पसंद आती है।

पैंकरा के अनुसार, फिलहाल यह एकमात्र हाथी मित्र दल पूरे जिले में अच्छी तरह काम संभाल रहा है। बारनवापारा के अलावा वे उन अन्य इलाकों में भी जाते हैं जहां हाथियों की सूचना मिलती है। गश्त के दौरान वे आमतौर पर बड़े ट्रक जैसे वाहन का उपयोग करते हैं।

उन्होंने बताया, “कभी-कभी जब हाथी आबादी वाले क्षेत्रों से नहीं हटते तो उन्हें भगाने के लिए सायरन बजाए जाते हैं। ज्यादातर मिट्टी और खपरैल की छत वाले घर हाथियों के हमलों से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।”

देशभर में बढ़ता संघर्ष

भारत में लगभग 23,446 हाथी हैं। झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में मानव-हाथी संघर्ष गंभीर स्तर पर है। इससे निपटने के लिए हाथी मित्र दलों की तैनाती से लेकर ड्रोन के इस्तेमाल तक कई उपाय किए जा रहे हैं। भूमि उपयोग में बदलाव, बड़े पैमाने पर धान की खेती और खनन गतिविधियों से पैदा व्यवधान के कारण यह संघर्ष और बढ़ा है।

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पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष काफी ज्यादा है (फोटो – अविजन साहा)

इन राज्यों में ड्यूटी के दौरान वनकर्मियों का हाथियों से सामना होना आम बात है और पैंकरा भी इससे अछूती नहीं रहीं। उन्होंने बताया, “इस साल जनवरी में दोपहर करीब एक बजे मैं एक बीट गार्ड के साथ स्कूटी से जा रही थी, तभी अचानक एक अकेला नर हाथी सामने आ गया। वह हम पर हमला कर सकता था, लेकिन हम किस्मत से बच गए। मैं तुरंत पीछे हटी और वहां से निकल गई।”

ड्यूटी के दौरान पैंकरा और उनकी हाथी मित्र दल टीम “गज संकेत” और “ओडीके कलेक्ट” ऐप का इस्तेमाल करती है, जिनसे हाथियों की लोकेशन और अन्य जानकारी दर्ज की जाती है।

हालांकि, मानसून के दौरान गश्त करना बड़ी चुनौती बन जाता है। पैंकरा ने कहा कि बारिश में बड़े वाहन कई जगह नहीं जा पाते, जिससे कर्मचारियों को बाइक का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन स्कूटी वाली घटना दिखाती है कि ऐसे समय में उनके पास सुरक्षा के बहुत कम साधन होते हैं।

झारखंड और ओडिशा से हाथियों का छत्तीसगढ़ आना-जाना लगातार जारी रहता है। यह आवाजाही 1990 के दशक के आखिर में शुरू हुई थी। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में लगभग 275 से 320 हाथी हैं।

पैंकरा ने कहा, “बारनवापारा के हाथी हमेशा नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन उन्हें सही तरीके से संभालना जरूरी होता है। शुरुआत में मुझे लगता था कि एक महिला होने के कारण जंगल के भीतर रहकर काम करना मेरे लिए मुश्किल होगा। लेकिन बाद में मुझे इस जगह और यहां के वन्यजीवों से प्यार हो गया।”

छत्तीसगढ़ के कई गांवों में हाथी दिखाई देने पर लोग पटाखों का इस्तेमाल कर उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं। सरगुजा जिले के प्रभात दुबे का मानना है कि पूरे राज्य में वैज्ञानिक तरीके से हाथी प्रबंधन का प्रशिक्षण देने से हाथी मित्र दल बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हैं और हताहतों की संख्या भी कम होगी। उन्होंने ऐसे कई समूहों को प्रशिक्षण दिया है।

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बारनवापारा के कोठारी रेंज में एक गश्ती शिविर

बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के प्रभागीय वन अधिकारी धम्मशील गनवीर ने कहा कि बेहतर फील्ड प्रबंधन के लिए पैंकरा को हाथी मित्र दल की जिम्मेदारी सौंपी गई है। “अपनी ड्यूटी के तहत वह मानव-हाथी संघर्ष को लेकर कई जागरूकता कार्यक्रम भी चलाती हैं।”

अधिकारी ने बताया कि बारनवापारा में गर्मियों के दौरान जंगल की आग रोकने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके अलावा युवाओं को जंगलों से जोड़ने और भविष्य के हरित नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए एक युवा स्वयंसेवी कार्यक्रम भी शुरू किया गया है। संकट के समय ये युवा गांवों में प्रथम प्रतिक्रिया देने वाले स्वयंसेवकों की भूमिका निभाते हैं।

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आईएचएम रांची की ‘मडुआ लड्डू’ कृति को मिला कॉपीराइट पंजीकरण

इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग टेक्नोलॉजी एंड अप्लाइड न्यूट्रिशन, रांची (आईएचएम रांची) ने शोध, नवाचार और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में एक और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार के कॉपीराइट कार्यालय ने संस्थान द्वारा विकसित “मडुआ लड्डू” शीर्षक कृति को कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अंतर्गत औपचारिक रूप से पंजीकृत किया है। इसके लिए आवेदन 16 मई 2026 को दाखिल किया गया था तथा पंजीकरण प्रमाणपत्र 22 जुलाई 2026 को जारी किया गया। यह कृति आईएचएम रांची के प्राचार्य डॉ. भूपेश कुमार, वरिष्ठ व्याख्याता रवि कुमार तथा व्याख्याता रजनीश कुमार सिंह द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है। झारखंड के घर-घर में लोकप्रिय मडुआ आधारित पारंपरिक व्यंजन को सुव्यवस्थित, मानकीकृत और वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजीकृत विधि में प्रस्तुत करना इस कार्य की प्रमुख विशेषता है। मडुआ, जिसे रागी या फिंगर मिलेट के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड की खाद्य संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पोषण की दृष्टि से उपयोगी होने के साथ-साथ यह कम पानी में उगने वाली जलवायु-अनुकूल फसल भी है। ऐसे में मडुआ आधारित उत्पादों के वैज्ञानिक विकास और दस्तावेजीकरण से स्थानीय खाद्य परंपराओं के संरक्षण, पोषण संवर्धन, उद्यमिता और रोजगार सृजन की नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। आईएचएम रांची लंबे समय से झारखंड के स्थानीय अनाजों, जनजातीय खाद्य परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक आतिथ्य शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहा है।
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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