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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » विविध » आदिवासी विरोध के बीच बड़ा सवाल: क्या केन-बेतवा परियोजना के बिना बुंदेलखंड का जल संकट सुलझ सकता है?

आदिवासी विरोध के बीच बड़ा सवाल: क्या केन-बेतवा परियोजना के बिना बुंदेलखंड का जल संकट सुलझ सकता है?

44,605 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना सरकार और आदिवासियों के बीच नया टकराव बन चुकी है। ऐसे में विशाल तिवारी इस ज्वलंत मुद्दे की पड़ताल करते हैं कि क्या राज्य और जनता पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों पर भरोसा कर बेहतर रास्ता चुन सकते हैं?

May 19, 2026
The Indian Tribal

केन नदी

सागर/नई दिल्ली

हजारों गोंड और कोल आदिवासी महिलाओं ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के खिलाफ अपना विरोध तेज कर दिया है। उनका कहना है कि विस्थापन “मौत से भी बदतर” है। महिलाओं का आरोप है कि यह परियोजना उनकी पुश्तैनी जमीनों को खतरे में डाल रही है। इसी के विरोध में उन्होंने अपनी “विरासत और पारंपरिक जल ज्ञान की धरोहर बचाने” के लिए प्रतीकात्मक अंतिम चिता पर लेटकर ‘चिता आंदोलन’ शुरू किया।

हालांकि विरोध का सबसे तीखा चरण अब रणनीतिक गतिरोध में बदल चुका है और दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन संदेश साफ है—विस्थापन उनके लिए मौत से भी बदतर नियति है।

दशकों पुराना सपना

केन-बेतवा लिंक परियोजना (KBLP) 1980 की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना का पहला हिस्सा है, जिसमें देशभर की 30 नदियों को जोड़कर जल का पुनर्वितरण करने की कल्पना की गई थी। राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA) द्वारा तैयार इस परियोजना को, यमुना की सहायक नदियों केन और बेतवा को जोड़ने के उद्देश्य से, दशकों तक चली व्यवहार्यता जांच और नीतिगत बदलावों के बाद 2010 में आधिकारिक रूप से शुरू किया गया।

बुंदेलखंड का संघर्ष

मध्य भारत का सूखा प्रभावित क्षेत्र बुंदेलखंड लंबे समय से जल संकट से राहत के वादे सुनता आया है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 14 जिलों में फैले इस इलाके में कई इंजीनियरिंग परियोजनाएं आईं और चली गईं, लेकिन स्थानीय समुदायों को वास्तविक सुधार नहीं मिला। अब भारत की पहली अंतरराज्यीय नदी जोड़ो योजना KBLP इस समस्या को हल करने का दावा कर रही है। 44,605 करोड़ रुपये की लागत वाली यह अब तक की सबसे महंगी कोशिश है।

परियोजना का मुख्य हिस्सा दौधन बांध है, जो केन नदी के कथित “अधिशेष” पानी को संग्रहित कर 221 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए बेतवा बेसिन तक पहुंचाएगा। परियोजना से 62 लाख लोगों को पेयजल और 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई मिलने का दावा है। आंकड़े कागज पर प्रभावशाली लगते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए दौधन बांध की कीमत सिर्फ रुपये में नहीं आंकी जा सकती।

संरक्षण का डूबना: चौराहे पर पन्ना टाइगर रिजर्व

AFC इंडिया लिमिटेड की व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट के कार्यकारी सारांश के अनुसार, इस परियोजना से 10,500 हेक्टेयर वन्यजीव आवास डूब जाएंगे, 23 लाख पेड़ काटे जाएंगे, जिनमें अधिकांश पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर हैं, और रिजर्व के कोर क्षेत्र का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा समाप्त हो जाएगा। लगभग 55 बाघों का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।

प्रख्यात संरक्षणवादी M.K. Ranjitsinh ने विरोध स्वरूप मध्य प्रदेश वन्यजीव बोर्ड से इस्तीफा देते हुए साफ कहा था: “आप या तो इंटरलिंकिंग परियोजना रख सकते हैं या पन्ना टाइगर रिजर्व; दोनों साथ नहीं रह सकते।”

वैज्ञानिकों ने इससे भी बुनियादी सवाल उठाया है: क्या केन नदी में वास्तव में अतिरिक्त पानी है? कई अध्ययनों का कहना है कि ऐसा नहीं है। उनका तर्क है कि बांध के लिए होने वाली भारी कटाई बुंदेलखंड के वर्षा पैटर्न को बदल सकती है और सूखे के समाधान को ही सूखे की वजह बना सकती है।

नदी शोधकर्ता Himanshu Thakkar, जिन्होंने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में इस परियोजना को चुनौती दी है, का कहना है कि “अधिशेष पानी” के आंकड़ों की कभी स्वतंत्र समीक्षा नहीं हुई। वह चेतावनी देते हैं: “सच यह है कि केन नदी में अतिरिक्त पानी नहीं है, लेकिन हमसे बिना सवाल किए इस पर विश्वास करने को कहा जा रहा है।”

मुख्य तथ्य

  • केन-बेतवा लिंक परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र का 70 प्रतिशत हिस्सा जलमग्न हो सकता है और 23 लाख पेड़ों का नुकसान होगा।
  • दौधन बांध निर्माण के कारण गोंड और कोल आदिवासी समुदायों के 6,600 से अधिक परिवार विस्थापन का सामना कर रहे हैं।
  • हालिया विरोध ‘चिता आंदोलन’ से रणनीतिक ‘सत्याग्रह’ में बदल गया है, क्योंकि धारा 163 लागू की गई और मुआवजा सर्वे की समीक्षा के आश्वासन के बाद बातचीत के लिए अस्थायी विराम दिया गया।
  • लोगों को प्रति एकड़ 12.5 लाख रुपये नकद मुआवजा दिया जा रहा है, लेकिन इससे जमीन, आजीविका और जंगल तक पहुंच के नुकसान की भरपाई नहीं होती।
  • खेत तालाब, चेक डैम और चंदेलकालीन तालाबों जैसी पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों ने बुंदेलखंड में फसल उत्पादन दोगुना किया और भूजल स्तर बढ़ाने में मदद की, लेकिन इन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है।

“न्याय या मौत”: आग में लिखा विरोध

जहां जंगल सबसे पहले चोट झेलते हैं, वहीं उनमें रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के दौधन गांव के गोंड और कोल आदिवासी पीढ़ियों से इसी जमीन पर रह रहे हैं और पूरी तरह खेती तथा वन उत्पादों पर निर्भर हैं।

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चिता आंदोलन करते आदिवासी

जब निर्माण कार्य अपने चरम की ओर बढ़ा तो उन्होंने विरोध का बेहद भावनात्मक तरीका चुना—चिता आंदोलन। करीब 7,000 आदिवासी महिलाएं इस आंदोलन में शामिल हुईं और प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर यह संदेश दिया कि विस्थापन भी एक तरह की मौत है। इसके साथ जल आंदोलन और मिट्टी आंदोलन भी चलाए गए, जिनमें प्रदर्शनकारी गले में रस्सी डालकर नदियों में उतरे या खुद को मिट्टी में दबा लिया।

9 अप्रैल को यह गतिरोध तब और बढ़ गया जब कथित मुआवजा भ्रष्टाचार के खिलाफ नाराज आदिवासी समुदायों ने प्रशासनिक टीम को मौके से भागने पर मजबूर कर दिया। इसके जवाब में तनाव कम करने और आदिवासी निवासियों तथा अधिकारियों के बीच सीधे टकराव रोकने के लिए धारा 163 लागू की गई।

हालांकि मई 2026 तक आंदोलन रणनीतिक विराम के चरण में पहुंच गया। अप्रैल में लगातार 12 दिन चले तीव्र विरोध के बाद दौधन और आसपास के गांवों के लोगों ने अपना सक्रिय आंदोलन स्थगित कर दिया। यह फैसला छतरपुर जिला प्रशासन द्वारा मुआवजा सर्वे में भारी विसंगतियों को दूर करने के लिए 10 दिन का समय मांगे जाने के बाद लिया गया।

इसके बावजूद जमीनी विरोध जारी है। इमलहा जैसे गांवों में किसानों ने अधिकारियों को अपनी जमीन पर काम शुरू करने से शारीरिक रूप से रोक दिया। इस गतिरोध के कारण पांच दिनों तक जरूरी बिजली लाइनें बिछाने का काम रुका रहा। इसी दौरान प्रशासनिक शून्यता का फायदा उठाकर करीब 20 लाख रुपये मूल्य की 2,100 मीटर उच्च गुणवत्ता वाली बिजली लाइन चोरी हो गई, जिससे बांध निर्माण और विलंबित हो गया।

पुनर्वास की कमी: नकद मुआवजे से आगे का संकट

केन-बेतवा लिंक परियोजना प्राधिकरण के अनुसार, दौधन बांध से छतरपुर में 5,288 परिवार और पन्ना में 1,400 परिवार विस्थापित होंगे। सरकार इस पुनर्वास को न्यायसंगत बताती है और 2013 के भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम का हवाला देती है।

वास्तव में परिवारों को प्रति एकड़ 12.5 लाख रुपये और आवास के लिए 6 लाख रुपये मिलते हैं। लेकिन महुआ फूल, तेंदूपत्ता या उन सामुदायिक वनों तक पहुंच खत्म होने के बदले कुछ नहीं मिलता, जो खेती के अलावा उनके जीवन का आधार हैं। कानून में जमीन के बदले जमीन देने का प्रावधान है, लेकिन प्रशासन केवल नकद देता है।

इनमें से कई समुदायों के लिए यह दूसरा विस्थापन है—पहला तब हुआ था जब उन्हें पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए हटाया गया था। आदिवासी विस्थापन पर शोध लंबे समय से दिखाता रहा है कि विकास परियोजनाओं की कीमत सबसे गरीब समुदाय चुकाते हैं, जबकि लाभ कहीं और पहुंचता है।

देशभर में आदिवासी आबादी भारत की कुल जनसंख्या का 8 प्रतिशत से अधिक है, लेकिन विकास संबंधी विस्थापन में उनकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। विश्व बांध आयोग के अनुसार, दुनिया भर में बड़े बांधों ने 4 से 8 करोड़ लोगों को विस्थापित किया है। केन-बेतवा परियोजना भी इस आंकड़े को बढ़ाने की ओर बढ़ रही है।

अतीत से सबक: विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन की प्रभावशीलता

केन-बेतवा परियोजना को उचित ठहराना कठिन है क्योंकि बुंदेलखंड के पास जल प्रबंधन का समृद्ध अनुभव पहले से मौजूद है। समस्या यह है कि लोग पारंपरिक तरीकों का उपयोग बंद कर चुके हैं और सरकार भी इन पर ध्यान या निवेश नहीं कर रही।

2020 में अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान की रिपोर्ट बताती है कि 9वीं से 14वीं शताब्दी के बीच चंदेल और बुंदेला राजवंशों ने हजारों तालाब और जलाशय बनवाए थे। अकेले टीकमगढ़ जिले में आज भी ऐसे करीब 900 तालाब मौजूद हैं। जब BIWAL (बुंदेलखंड इनिशिएटिव फॉर वॉटर, लाइवलीहुड्स एंड एग्रीकल्चर) कार्यक्रम ने मदुमार गांव में 100 हेक्टेयर के चंदेलकालीन तालाब से 11,920 घन मीटर गाद हटाकर उसे पुनर्जीवित किया, तो 86 किसानों की रबी फसल उत्पादन में तुरंत बढ़ोतरी हुई।

अन्य इलाकों में इससे भी बड़े सुधार देखे गए। 1997 में कोल जनजाति के लोगों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कर जमीन दी गई थी, जिसकी उत्पादकता 5 प्रतिशत से भी कम थी। 2009 से 2011 के बीच अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान की मदद से उन्होंने 61 खेत तालाब और चेक डैम बनाए। कुछ ही वर्षों में गेहूं उत्पादन 19,910 किलोग्राम से बढ़कर 1,90,920 किलोग्राम हो गया। सरसों उत्पादन 14 गुना बढ़ गया। स्थानीय रोजगार बढ़ने से पलायन भी कम हुआ।

शोधकर्ता लिएनसांग पुई ने दिखाया है कि झांसी के परसई-सिंध जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी के बांधों पर आधारित पारंपरिक हवेली प्रणाली ने भूजल स्तर को दो से पांच मीटर तक बढ़ा दिया। इससे किसान साल में फसल बोने की संख्या दोगुनी कर सके। ICAR-NRCAF द्वारा गढ़कुंदर-डाबर क्षेत्र में किए गए जलग्रहण मॉडल अध्ययन भी दिखाते हैं कि विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन अनिश्चित मानसून पर निर्भरता काफी कम कर सकता है, जिसकी बुंदेलखंड को सबसे अधिक जरूरत है।

यहां तक कि जल आपूर्ति प्रणालियों में भी ऐसी समस्याएं हैं जिन्हें केवल पैसा हल नहीं कर सकता। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के बांदा जिले में किए गए अध्ययन में पाया गया कि जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं से वितरित होने वाला 70 प्रतिशत तक पानी खराब ड्रेनेज योजना के कारण दूषित हो जाता है। इससे वही पेयजल प्रदूषित हो जाता है जिसे सुरक्षित करना था। जल सुरक्षा केवल आपूर्ति पर नहीं, बल्कि वितरण के बाद उसके प्रबंधन पर भी निर्भर करती है।

टिकाऊ जल विज्ञान की ओर: मेगा इंजीनियरिंग पर लोगों को चुनने का सवाल

हालांकि बुंदेलखंड में व्यापक जल अवसंरचना मौजूद है, लेकिन इन प्रणालियों को बनाए रखने और सुधारने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। सदियों से बने चंदेल तालाब, चेक डैम, खेत तालाब और जलग्रहण प्रणालियां उपेक्षा के कारण खराब हो चुकी हैं। इन संरचनाओं को पुनर्जीवित करने की लागत 44,605 करोड़ रुपये से कहीं कम होगी और इससे न तो समुदाय विस्थापित होंगे और न ही जंगल कटेंगे।

इमलहा जैसे गांवों में जारी वर्तमान गतिरोध दिखाता है कि बुंदेलखंड में अब सवाल सिर्फ पानी तक पहुंच का नहीं रह गया है, बल्कि यह बड़े पैमाने के हस्तक्षेप और स्थानीय जीवन का सम्मान करने वाले समाधान के बीच चुनाव का मुद्दा बन गया है।

इसके विपरीत, केन-बेतवा लिंक परियोजना एक टाइगर रिजर्व को नष्ट कर सकती है और पहले से विस्थापित समुदायों की पुश्तैनी जमीनों को डुबो सकती है। यदि केन नदी अपेक्षित अतिरिक्त पानी नहीं दे पाती, तो परियोजना पर्याप्त जल उपलब्ध कराने में भी विफल हो सकती है। मदुमार, झांसी और कोल किसानों के क्षेत्रों के उदाहरण बताते हैं कि स्थानीय जरूरतों के अनुरूप समाधान कहीं अधिक प्रभावी हो सकते हैं।

(लेखक डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश में शोधार्थी और वरिष्ठ शोध फेलो (SRF) हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)

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