शिवपुरी/नई दिल्ली
साल 2030 तक हासिल किए जाने वाले 17 सतत विकास लक्ष्यों में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य भूख समाप्त करना और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसी उद्देश्य के साथ भोपाल स्थित गैर-लाभकारी संस्था विकास संवाद समिति ने मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह सहरियाओं के बीच बीज संरक्षण अभियान शुरू किया।
इस पहल के तहत, जो अब शिवपुरी के 15 गांवों तक फैल चुकी है, लगभग 250 सहरिया आदिवासी परिवार पारंपरिक रूप से परिचित विभिन्न फसलों के बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। इनमें मुख्य रूप से मोटे अनाज और दालें शामिल हैं। हालांकि पोषक तत्वों से भरपूर छोटे मोटे अनाज जैसे कोदो और कुटकी की खेती मध्य प्रदेश में व्यापक रूप से होती है, लेकिन हाशिए पर रहने वाले आदिवासी किसानों को अक्सर नए और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस समस्या को दूर करने के लिए कभी-कभी अन्य क्षेत्रों से बीज लाए जाते हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर बीज बचाने से भविष्य के लिए निरंतर और भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
बीज संरक्षण शिवपुरी के पोहरी ब्लॉक स्थित इन गांवों में पोषण सुरक्षा की कमी को दूर करने में मदद कर रहा है। आठ वर्ष पहले शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य सहरिया समुदाय में प्रचलित कुपोषण से निपटना भी था। शुरुआत में दो गांवों में बीज बैंक स्थापित किए गए थे, जिन्हें बाद में अन्य गांवों तक विस्तारित किया गया। इस पहल के तहत बीज एकत्रित किए जाते हैं, सावधानीपूर्वक संरक्षित किए जाते हैं और मानसून के दौरान जरूरतमंद किसानों में वितरित किए जाते हैं।
इस प्रयास की शुरुआत गांवों के उन लोगों से पांच से दस किलो बीज एकत्रित करने से हुई, जिनके पास अतिरिक्त बीज उपलब्ध थे। इन बीजों को मिट्टी के घड़ों या स्टील के बर्तनों जैसे पारंपरिक पात्रों में संग्रहित किया गया। मेहरा गांव के सहरिया आदिवासी निवासी अतर सिंह आदिवासी के अनुसार यह एक महत्वपूर्ण कदम था, क्योंकि इससे पहले वे बीजों के लिए सेठों पर निर्भर रहते थे।
पलायन की परेशानी
कुछ सहरिया किसान अब भी सिंचाई की कमी के कारण सर्दियों में गेहूं की बुवाई नहीं कर पाते, जबकि गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य अधिक है। वे केवल मानसून पर निर्भर रहकर बाजरा, तिल, मूंगफली और उड़द की खेती करते हैं। कई लोग बेहतर गुणवत्ता वाले गेहूं की कटाई के लिए मुरैना और श्योपुर, सरसों की कटाई के लिए राजस्थान के बारां तथा आलू की खुदाई के लिए आगरा जाते हैं। यह पलायन उनके लिए आय का वैकल्पिक स्रोत बनता है।

आमतौर पर मजदूरों को एक बीघा जमीन (लगभग 0.619 एकड़) की कटाई के बदले एक क्विंटल गेहूं मिलता है, जबकि नकद भुगतान बहुत कम होता है। कठिनाइयां अब भी बनी हुई हैं और कई बार दिहाड़ी मात्र 400 रुपये तक सीमित रह जाती है। रहने की स्थिति भी बेहद खराब होती है। अतर सिंह आदिवासी ने कहा, “कभी-कभी कटाई के दौरान हमें खेतों में ही रहना पड़ता है।”
जब परिवार पलायन करते हैं, तब बच्चे भी अपने माता-पिता के साथ चले जाते हैं और उनकी पढ़ाई छूट जाती है। वे प्रधानमंत्री पोषण योजना, जिसे पहले मिड-डे मील योजना कहा जाता था, के तहत मिलने वाले भोजन से भी वंचित हो जाते हैं। मेहरा गांव में एक प्राथमिक विद्यालय है, लेकिन मध्य प्रदेश में मिड-डे मील में अंडे नहीं दिए जाते, जिससे बच्चे पलायन न करने पर भी जरूरी पोषण से वंचित रह जाते हैं।
बीज संरक्षण के अलावा यह पहल पोषण वाटिका, मुर्गी पालन, जागरूकता और स्वच्छता पर भी केंद्रित है। हालांकि गांवों में शौचालय बनाए गए हैं, लेकिन खुले में शौच अब भी जारी है। अतर सिंह आदिवासी ने बताया, “पानी का कनेक्शन नहीं होने के कारण शौचालयों का उपयोग स्टोर रूम की तरह किया जाता है।”
जल संकट अब भी एक बड़ी चिंता बना हुआ है। भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है और गर्मियों में पीने के पानी की भारी कमी हो जाती है। हैंडपंप और कुएं सूख जाने के बाद सहरिया परिवार पानी की तलाश में दूसरे गांवों तक जाते हैं। पथरीली जमीन बारिश के पानी को जमीन में समाने नहीं देती, जिससे संकट और गहरा जाता है। अधिकांश बोरवेल भी विफल साबित हुए हैं।
विकास संवाद समिति के जिला समन्वयक अजय सिंह यादव ने The Indian Tribal को बताया, “जल जीवन मिशन, जो भारत की पाइपलाइन जलापूर्ति योजना है, यहां सफल नहीं हो पाई। टैंक बनाए गए हैं और पाइपलाइन भी बिछाई गई है, लेकिन पर्याप्त पानी नहीं होने के कारण बोरवेल फेल हो गए।” उन्होंने कहा कि तालाब जैसे स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण के प्रयास जारी हैं।
एक अन्य सहरिया निवासी रामकेस आदिवासी ने कहा कि उनकी जमीन बहुत छोटी है। उन्होंने बताया, “मुरैना में गेहूं की कटाई शिवपुरी की तुलना में ज्यादा लाभदायक है। कई बार मजदूरों को एक बीघा जमीन की कटाई के बदले डेढ़ क्विंटल तक गेहूं मिल जाता है। आगरा में आलू की खुदाई के लिए 450 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं और मजदूर लगभग 20 दिनों तक लगातार काम करते हैं। ठेकेदार एक बार में लगभग 30 मजदूरों को लेकर जाते हैं।” अजय सिंह यादव ने बताया कि गेहूं का इस्तेमाल अक्सर अनौपचारिक वस्तु विनिमय प्रणाली के तहत अन्य सामानों के बदले किया जाता है।
आत्मनिर्भरता की ओर
लगभग एक एकड़ जमीन के मालिक अतर आदिवासी अपने घर में एक बीज बैंक संचालित करते हैं। उन्होंने बताया कि जिन लोगों को बीज दिए जाते हैं, उन्हें फसल कटने के बाद दोगुनी मात्रा में बीज वापस करना होता है। कई गांवों में कोदो और कुटकी का भंडार खत्म हो गया था, जिसके कारण बाहर से बीज मंगाने पड़े।

हालांकि अब छोटे मोटे अनाजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया है, लेकिन एक समय ऐसा था जब उपभोक्ताओं द्वारा इन्हें नजरअंदाज किया जाता था, जिससे ये स्थानीय भोजन से लगभग गायब हो गए थे। बेहतर मुनाफे के लिए किसानों ने मूंगफली और सोयाबीन जैसी फसलों की ओर रुख कर लिया था।
इन 15 गांवों में कुपोषण से होने वाली मौतों के साथ-साथ शिशु और मातृ मृत्यु दर में भी उल्लेखनीय कमी आई है। पिछले वर्ष केवल एक शिशु मृत्यु दर्ज की गई। वर्ष 2015-16 के आसपास, जब गैर-लाभकारी संस्था ने यहां काम शुरू किया था, तब कई बच्चों और महिलाओं की मौत कुपोषण और भूख के कारण हुई थी। संस्थागत प्रसव की कमी भी शिशु मृत्यु का एक कारण थी।
मध्य प्रदेश अब भी बाल कुपोषण के उच्च स्तर की रिपोर्ट करता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्म पर 43.5 है, जबकि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्म पर 52.5 है।












