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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » विविध » प्रकृति, परंपरा और आदिवासी जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है सरहुल

प्रकृति, परंपरा और आदिवासी जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है सरहुल

जब साल के पेड़ों पर फूल खिलते हैं, तब सरहुल आता है—नई शुरुआत का संदेश लेकर। यह उत्सव जीवन, प्रेम और पर्यावरण के प्रति आभार का सामूहिक अभिव्यक्ति है। The Indian Tribal की रिपोर्ट

March 20, 2026
The Indian Tribal

सरहुल पर्व पर सड़कों पर नाचते गाते लोग

नई दिल्ली/रांची

सरहुल भारत के आदिवासी समुदायों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गहन अर्थों से भरा हुआ पर्व है, जो मुख्यतः झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। यह त्योहार वसंत ऋतु के आगमन पर, विशेष रूप से साल (सल) वृक्ष के फूलने के समय मनाया जाता है। साल के फूल इस पर्व की आत्मा हैं—वे केवल फूल नहीं, बल्कि जीवन के पुनर्जन्म, समृद्धि और आशा के प्रतीक माने जाते हैं। सरहुल पर्व का उत्सव और रीति-रिवाज शुरू हो चुके हैं। इस साल सरहुल की शोभा यात्रा मार्च 21 को निकलेगी ।

‘सरहुल’ शब्द की उत्पत्ति भी इसके अर्थ को स्पष्ट करती है—‘सर’ यानी वर्ष और ‘हुल’ यानी आरंभ। इस तरह यह त्योहार नए वर्ष, नए चक्र और नई ऊर्जा की शुरुआत का प्रतीक है। आदिवासी समाज में यह केवल कैलेंडर का बदलाव नहीं, बल्कि जीवन के हर स्तर पर नवीनीकरण का अवसर होता है—प्रकृति, समाज और आत्मा तीनों के लिए।

इस पर्व का केंद्र “सरना” स्थल होता है, जो आमतौर पर गांव के पास स्थित पवित्र उपवन होता है, जहां साल के पेड़ होते हैं। यही वह स्थान है जहां गांव का पुजारी, जिसे ‘पाहन’ कहा जाता है, पूरे समुदाय की ओर से पूजा-अर्चना करता है। पूजा के दौरान धरती माता, सूर्य देव और ग्राम देवताओं का आह्वान किया जाता है। साल के फूलों को विशेष रूप से चढ़ाया जाता है, क्योंकि इन्हें प्रकृति की नई शुरुआत का संकेत माना जाता है। पूजा के बाद ये फूल गांव के हर घर में बांटे जाते हैं, जो एकता, साझेदारी और सामूहिकता का प्रतीक है।

Sarhul Celebrations
सरना स्थल

सरहुल का एक गहरा दार्शनिक पक्ष भी है—इसे धरती और सूर्य के प्रतीकात्मक विवाह के रूप में देखा जाता है। यह विचार इस बात को दर्शाता है कि जीवन की उत्पत्ति और पोषण प्रकृति के विभिन्न तत्वों के संतुलन से ही संभव है। इस प्रकार, सरहुल केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक पर्यावरणीय दर्शन है, जो मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा मानता है, उसका स्वामी नहीं।

प्रसिद्ध नृविज्ञानी वेरियर एल्विन के शब्दों में, “आदिवासी पर्वों में प्रकृति केवल पूजनीय नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न साथी होती है, और सरहुल इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।”

इसी संदर्भ में समाजशास्त्री एन. के. बोस लिखते हैं, “सरहुल जैसे पर्व आदिवासी समाज की सामूहिक चेतना और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को व्यक्त करते हैं।”

इन विचारों से स्पष्ट होता है कि सरहुल केवल आस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी उत्सव है।

इस पर्व के दौरान गांवों और शहरों में उत्साह का अद्भुत माहौल देखने को मिलता है। लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं—पुरुष धोती-कुर्ता और महिलाएं सुंदर पारंपरिक साड़ियां, जिनमें खास प्रकार की लाल, सफेद और काले रंग की छटा होती है। मांदर, नगाड़ा और ढोल की थाप पर सामूहिक नृत्य किए जाते हैं। ये नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृति और पहचान का जीवंत प्रदर्शन हैं।

सरहुल का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका भोजन और पेय भी है। ‘हड़िया’ (चावल से बना पारंपरिक पेय) और स्थानीय व्यंजन इस पर्व का अभिन्न हिस्सा होते हैं। भोजन यहां केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि सामूहिक साझेदारी और उत्सव का माध्यम है—जहां हर कोई साथ बैठकर आनंद लेता है।

अब यदि बात करें कि क्या अलग-अलग राज्यों में सरहुल के उत्सव में अंतर होता है, तो इसका उत्तर है—हाँ, लेकिन सीमित रूप में। सरहुल का मूल भाव हर जगह समान रहता है—प्रकृति की पूजा और सामूहिक जीवन का उत्सव। लेकिन स्थानीय परंपराओं, भाषाओं और सांस्कृतिक प्रभावों के कारण इसके स्वरूप में कुछ भिन्नताएं देखने को मिलती हैं।

झारखंड में सरहुल सबसे व्यापक और भव्य रूप में मनाया जाता है। यहां बड़े-बड़े जुलूस निकलते हैं, जिनमें हजारों लोग पारंपरिक पोशाक में नृत्य करते हुए शामिल होते हैं। शहरों में भी यह पर्व एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में उभर चुका है।

सरहुल शोभायात्रा की झांकी का एक दृश्य
सरहुल शोभायात्रा की झांकी का एक दृश्य

ओडिशा में, विशेषकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में, सरहुल के अनुष्ठान थोड़े अलग ढंग से किए जाते हैं। वहां पूजा की विधि और प्रसाद में स्थानीय विविधता देखने को मिलती है, लेकिन साल के फूल और प्रकृति पूजा का महत्व वही रहता है।

छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में यह पर्व अलग नामों से जाना जाता है, जैसे “बा परब” या “खड्डी”, लेकिन इसकी आत्मा समान है। वहां भी फूल, पेड़ और धरती के प्रति सम्मान इस उत्सव का केंद्र होता है।

इन सभी विविधताओं के बावजूद, सरहुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन की बात करता है। आज के समय में, जब पर्यावरणीय संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, सरहुल का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि विकास तभी सार्थक है, जब वह प्रकृति के साथ संतुलन में हो।

अंततः, सरहुल एक ऐसा पर्व है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। यह सिखाता है कि खुशहाली केवल भौतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि सामूहिकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और सांस्कृतिक पहचान से आती है। यह आदिवासी समाज की वह अमूल्य धरोहर है, जो आज भी हमें एक संतुलित और संवेदनशील जीवन जीने की प्रेरणा देती है।

Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri

In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

झारखंड में PVTG परिवारों को अब मनरेगा में मिलेंगे 150 दिन का रोजगार

मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई झारखंड मंत्रिपरिषद की बैठक में विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (PVTG) के लिए बड़ा फैसला लिया गया। कैबिनेट ने राज्य में मनरेगा के तहत इन्हें वित्तीय वर्ष में निर्धारित 100 दिनों के रोजगार के अतिरिक्त 50 दिनों का और रोजगार उपलब्ध कराने को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही PVTG परिवारों को अब वर्ष में कुल 150 दिनों का रोजगार मिल सकेगा। बैठक में वीबी-जी रामजी (VB-G RAM G) पर भी विस्तृत चर्चा की गई। सम्यक विचार-विमर्श के बाद मंत्रिपरिषद ने इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान कर दी। मनरेगा के तहत अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार का यह निर्णय इन अत्यंत कमजोर जनजातीय समुदायों की आजीविका सुरक्षा, आय में वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों से मजबूरी में होने वाले पलायन को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। झारखंड देश के उन राज्यों में शामिल है जहां PVTG की सबसे अधिक आबादी निवास करती है। राज्य में नौ PVTG समुदाय—असुर, बिरहोर, बिरजिया, कोरवा, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, परहैया, पहाड़िया (कुमारभाग) और सावर—अधिसूचित हैं।
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सिदो-कान्हू ने परिणाम की चिंता किये बगैर शोषण के विरुद्ध मोर्चा खोला था: मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन

by The Indian Tribal
June 30, 2026

हूल दिवस पर मुख्यमंत्री सोरेन ने झारखण्ड की राजधानी रांची में सिदो-कान्हू उद्यान परिसर में आयोजित रक्तदान शिविर में शामिल होकर रक्तदाताओं के बीच प्रशस्ति-पत्र भी वितरित किया। The Indian Tribal की रिपोर्ट

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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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