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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » विविध » कपड़ों में रंगों को लेकर इतने संवेदनशील क्यों त्रिपुरा के लोग

कपड़ों में रंगों को लेकर इतने संवेदनशील क्यों त्रिपुरा के लोग

त्रिपुरा की सभी जनजातियों की पोशाक अनूठी होती है, जहां कपड़े ही नहीं, रंग का भी बहुत महत्व होता है। त्रिपुरी महिलाओं को क्या-क्या पहनना पसंद है, उनसे बातचीत के आधार पर यहां बता रही हैं प्रोयशी बरुआ

January 7, 2024
Indigenous Tribes of India | The Indian Tribal | त्रिपुरा की एक आदिवासी महिला पारंपरिक आदिवासी पोशाक रिसा बुनती हुई

त्रिपुरा की एक आदिवासी महिला पारंपरिक आदिवासी पोशाक रिसा बुनती हुई

प्रत्येक आदिवासी समुदाय की अपनी विशिष्ट पारम्परिक पोशाक होती है। इस श्रृंखला में हम आपके लिए सेवन सिस्टर्स के नाम से प्रसिद्ध पूर्वोत्तर के पारम्परिक परिधानों के बारे में कुछ ऐसी ही रोचक जानकारियां लेकर आए हैं, जिनसे बहुत कम लोग वाकिफ हैं।

पहनावे को लेकर त्रिपुरा की आदिवासी महिलाएं बहुत संवेदनशील होती हैं। उनके लिए कपड़ा ही अच्छा नहीं हो, उनके लिए बुनावट की बारीकी एवं रंगों का भी बड़ा महत्व होता है। आमतौर पर यहां की सभी आदिवासी महिलाएं रिग्नाई नामक परिधान पहनती हैं, जो टखने तक लंबा होता है। शरीर के ऊपरी हिस्से को महिलाएं दो वस्त्रों से ढकती हैं, जिसे रीसा एवं  रिकुतु कहते हैं। रीसा को रिहा भी कहा जाता है, जो विशेष रूप से छाती वाले हिस्से को ढकता है और रिकुतु पूरे धड़ को कवर करता है।

त्रिपुरा में पुरुष सामान्य रूप से ढीली-ढाली पोशाक पहनते हैं जो तौलिया जैसा दिखता है। इसे रिकुतु गमछा कहा जाता है। इसे शर्ट के साथ पहना जाता है। इस शर्ट को भी त्रिपुरी लोग कुबाई कहते हैं। गर्मियों के सीजन में पुरुष खुद को अत्यधिक गर्मी और उमस से बचाने के लिए पगड़ी भी पहनते हैं।

The Indian Tribal |  Traditional Risa (unique tribal attire) of Tripura

रीसा आमतौर पर नीले-काले रंग की होती है, लेकिन कभी-कभी यह लाल भी चल जाती है। त्रिपुरी हथकरघा की मुख्य विशेषता यह होती है कि कपड़े की कढ़ाई में विभिन्न रंगों का समावेश किया जाता है। यह भी ख्याल रखा जाता है कि यह एक जैसा न हो यानी बिखरे हुए पैटर्न में हो। इस कपड़े पर लंबवत और क्षैतिज पट्टियां बहुत पसंद की जाती हैं।

पुराने जमाने में ये कपड़े घर में काते गए सूती धागों से बनाए जाते थे। हालांकि, बदलते समय के साथ आजकल बाजार में हर प्रकार के कपड़े उपलब्ध हैं। इसके अलावा, अब रीसा का चलन भी कम हो गया। इसकी जगह धीरे-धीरे ब्लाउज ले रहा है। त्रिपुरा की युवा लड़कियां इन दिनों रिग्नाई के साथ टॉप पहनने लगी हैं। इसमें वे खूब जचती हैं।

कढ़ाई में सितारे, बिंदु, फूल आदि के साथ-साथ किसी विशेष जनजाति के लिए अलग से डिजाइन भी डाले जाते हैं। त्रिपुरा में चकमा, कुकी, लुसाई और रियांग जैसी प्रमुख जनजातियां रहती हैं। ये सभी जनजातियां शॉल या अन्य कपड़ों की कढ़ाई-बुनाई में अपने अलग-अलग निर्धारित डिजाइन ही पसंद करती हैं। 

यहां रंगों का बड़ा महत्व होता है, जिन्हें यहां के लोग प्रतीकों में उपयोग करते हैं। लोग रंगों को लेकर कितने संवेदनशील होते हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक बुनकर को सबसे खराब सजा के रूप में किसी रंग के इस्तेमाल करने से मना करना होती है।

रोचक बात यह है कि लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि त्रिपुरा में प्रसिद्ध हस्तियों के गीत गाए जाते हैं और उन्हें इन जनजातियों के कपड़ों में चित्रित किया जाता है। इसके अलावा यहां रंगों का बड़ा महत्व होता है, जिन्हें यहां के लोग प्रतीकों में उपयोग करते हैं। लोग रंगों को लेकर कितने संवेदनशील होते हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक बुनकर को सबसे खराब सजा के रूप में किसी रंग के इस्तेमाल करने से मना करना होती है।

आज भी गांवों में त्रिपुरी महिलाएं अपनी रीसा और रिग्नाई आमतौर पर पीठ से लपेटे जाने वाले साधारण करघा जिसे बैकस्ट्रैप भी कहते हैं, पर खुद ही बुनना पसंद करती हैं। लुंगी, साड़ी, चादर और स्कार्फ भी हथकरघा पर तैयार किए जाते हैं।

रंगों को लेकर त्रिपुरा की जनजातियां कोई समझौता नहीं करतीं। यहां की रियांग जनजाति काले, नीले और भूरे रंग के धागे के लिए पौधों से प्राप्त प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करती है। यह धागा भी हाथ से काते हुए कपास से बनता है।

त्रिपुरा की जनजातियों को खूबसूरत लसिंगफी बनाने के लिए भी जाना जाता है। यह लसिंगफी सूती धागों से बुना हुआ मोटा एवं गर्म कपड़ा होता है, जिसका उपयोग रजाई, कवर, स्कार्फ और बेडशीट आदि बनाने के लिए किया जाता है।

त्रिपुरी महिलाएं आभूषणों को बहुत पसंद करती हैं। वे चांदी, कांस्य, तांबे, सुलेमानी पत्थर, कांच के मोतियों एवं सिक्कों से बने आभूषण अधिक पहनती हैं। इसके अलावा उनके पास बांस और बेंत के आभूषण भी होते हैं। ये कुशल कारीगरी से तैयार किए गए हैं। ये आभूषण त्रिपुरा के लिए अद्वितीय हैं, जो पूरे विश्व में कहीं और देखने को नहीं मिलेंगे। 

The Indian Tribal | Traditional attire and ornaments of Tripura, त्रिपुरा का सिक्का हार | जनजातीय पोशाक और कलाकृतियाँ
त्रिपुरा का सिक्का हार | जनजातीय पोशाक और कलाकृतियाँ

त्रिपुरा की आदिवासी महिलाएं सिक्कों या चांदी से बने हार पहनती हैं। चूडिय़ाँ, लोंग और झुमके चांदी अथवा कांस्य से तैयार किए जाते हैं। यहां आज भी दूरदराज के इलाकों में आदिवासी समुदायों में फूलों का उपयोग आभूषण के रूप में खूब किया जाता है।

Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri

In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

सरना कोड व परिसीमन पर आंदोलन का ऐलान

आदिवासी छात्र संघ, झारखंड, राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा भारत और सरना धर्म सोतो: समिति, खूंटी, झारखण्ड, ने संयुक्त रूप से परिसीमन, जनगणना में सरना धर्म कोड तथा पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर राज्यव्यापी चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा की है। संगठनों ने कहा कि झारखंड की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और संवैधानिक पहचान से जुड़े मुद्दों की लगातार उपेक्षा की जा रही है, जिससे आदिवासी समाज में चिंता और असंतोष बढ़ रहा है। संगठनों ने मांग की कि प्रस्तावित परिसीमन में अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, जनगणना में सरना धर्म के लिए पृथक धर्म कोड लागू किया जाए तथा पाँचवीं अनुसूची और पेसा कानून के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए। उन्होंने अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों और राजनीतिक अधिकारों में किसी भी प्रकार की कटौती का विरोध किया। संगठनों के अनुसार आंदोलन के पहले चरण में ज्ञापन सौंपा जाएगा, दूसरे चरण में जनजागरण अभियान और प्रेस वार्ताएं आयोजित होंगी, जबकि तीसरे चरण में जिला एवं प्रखंड स्तर पर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेने की मांग की है।
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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