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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » खेलकूद » मेघालय के इस खेल में पुरस्कार में मिलते हैं चावल, आलू और मुर्गियां

मेघालय के इस खेल में पुरस्कार में मिलते हैं चावल, आलू और मुर्गियां

लगभग 400 साल पहले इस स्वदेशी खेल की उत्पत्ति मानी जाती है और आज भी यह जैन्तिया, खासी और गारो पहाड़ी जनजातियों के बीच बेहद लोकप्रिय है। क्या है यह खेल, बता रही हैं प्रोयशी बरुआ

July 15, 2023
लगभग 400 साल पहले इस स्वदेशी खेल की उत्पत्ति मानी जाती है (इलस्ट्रेशन - राजेश महंती)

लगभग 400 साल पहले इस स्वदेशी खेल की उत्पत्ति मानी जाती है (इलस्ट्रेशन - राजेश महंती)

शिलांग/गुवाहाटी

इस मनोरंजक जनजातीय, स्वदेशी खेल में मांस का टुकड़ा एक ऐसी रस्सी में लटका दिया जाता है, जिसके दोनों सिरे अमूमन दो पेड़ों या बांस सी सीधी लकडिय़ों से जमीन से 3 से 5 फीट ऊपर बंधे होते हैं। कभी-कभी रस्सी के दोनों सिरों को दो लोग भी पकड़ कर ऊपर उठाए हुए होते हैं।

खेल में अधिकतम पांच प्रतिभागी होते हैं। प्रत्येक खिलाड़ी को एक साथ कूदकर पहले ही प्रयास में रस्सी में बीचोंबीच बंधे मांस को छूना या उसमें लात मारनी होती है। इस खेल की उत्पत्ति लगभग 400 साल पहले हुई थी और यह अभी भी मेघालय की जैंतिया, खासी और गारो जैसी आदिवासी जनजातियों के बीच खूब प्रचलित है।

इस खेल की रोचकता यही है कि खिलाड़ी जब कूदता है और सिर्फ एक पैर से मांस के टुकड़े को छू पाता है तो वह आउट हो जाता है। यदि वह दोनों पैरों से मांस को छू देता है तो रस्सी को अगले प्रतियोगी के लिए थोड़ा और ऊपर बांध दिया जाता है या दोनों सिरों पर खड़े दोनों लोग रस्सी को और ऊपर कर लेते हैं।

कौन प्रतियोगी मांस को छूने के लिए आएगा, इसका चयन ड्रा के माध्यम से होता है। यानी पांचों प्रतियोगियों के नाम चिट में लिखकर रखे जाते हैं और जिस खिलाड़ी के नाम की चिट निकलती है, वही मांस को छूने के लिए आता है। अब जो खिलाड़ी सबसे ज्यादा ऊंचाई पर मांस को लात मारता है, वही विजेता घोषित किया जाता है।

प्रतियोगियों को पुरस्कार भी देसी अंदाज में दिया जाता है। विजेता खिलाड़ी को पुरस्कार स्वरूप नकदी तो देते ही हैं। कुछ मुर्गियां, चावल या बोरीभर आलू और कभी-कभी अनानास और मक्का जैसी खाद्य वस्तुएं भी इनाम में रखी जाती हैं।

शिलांग की रहने वाली डोरोथी फांबू कहती हैं कि यदि आप सोचते हैं कि यह खेल केवल पुरुषों के लिए ही है, तो आप पूरी तरह गलत हैं। इसमें महिलाएं विशेष कर ग्रामीण अंचल की उत्साही जैंतिया युवतियां भी बड़े जोश के साथ भाग लेती हैं।

400 साल पुराना खेल

फांबू ने The Indian Tribal को बताया कि उन्होंने अपनी दादी से इस खेल के बारे में एक दिलचस्प लोककथा सुनी है। वह बताती थीं कि इस खेल की उत्पत्ति 400 साल पहले हुई थी। उस समय मेघालय की अधिकांश जनजातियां पहाडिय़ों पर स्थित छोटे गांवों या बस्तियों में रहती थीं। उस दौर में एक भी गांव ऐसा नहीं था, जिसमें खुद के खाने के लिए सभी फसलें उगाई जा सकें।

उदाहरण के लिए कुछ गांवों में ऐसी जमीन थी, जिसमें केवल मक्का या अनानास की खेती ही की जा सकती थी, लेकिन अन्य सब्जियां और मौसमी फल उसमें नहीं उग सकते थे। अन्य गांवों में इसका उलटा हाल था। ऐसी स्थिति में वस्तु विनिमय प्रणाली के दिलचस्प विकल्प के रूप में इस खेल की शुरुआत हुई थी। इसमें पड़ोसी गांवों के खिलाडिय़ों के समूह आते और खेल के माध्यम से पुरस्कार स्वरूप अन्य खाद्य वस्तुएं जीत कर ले जाते।

विजेता खिलाडिय़ों को अनाज, सब्जियों और फलों के रूप में हमेशा पुरस्कार दिया जाता था। खेल के दौरान ऐसे ही अनाज या फल-सब्जियों को इनाम के तौर पर रखा जाता, जो दूसरे क्षेत्रों में पैदा नहीं होते थे।

फांबू के अनुसार उनकी दादी ने यहां तक बताया था कि जिन खिलाडिय़ों ने कई बार अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया, उन्हें गांवों के भीतर बहुत अधिक महत्व और अधिकार के पद दिए गए।

इस खेल का एक दार्शनिक संदेश भी है। एक बार जब हम कुछ हासिल कर लेते हैं, तो हमें कभी भी संतुष्ट नहीं होना चाहिए। हमें केवल यह जानना चाहिए कि हमने किसी चीज के लिए स्तर बढ़ा दिया है या एक अभूतपूर्व मानक स्थापित किया है। भविष्य में किसी और की नई उपलब्धि के साथ वह मानक हमेशा ऊंचा होता जाएगा। कुछ स्तर पर यह खेल हमें विनम्र और ज़मीन से जुड़े रहना भी सिखाता है।

Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri

In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

झारखंड में PVTG परिवारों को अब मनरेगा में मिलेंगे 150 दिन का रोजगार

मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई झारखंड मंत्रिपरिषद की बैठक में विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (PVTG) के लिए बड़ा फैसला लिया गया। कैबिनेट ने राज्य में मनरेगा के तहत इन्हें वित्तीय वर्ष में निर्धारित 100 दिनों के रोजगार के अतिरिक्त 50 दिनों का और रोजगार उपलब्ध कराने को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही PVTG परिवारों को अब वर्ष में कुल 150 दिनों का रोजगार मिल सकेगा। बैठक में वीबी-जी रामजी (VB-G RAM G) पर भी विस्तृत चर्चा की गई। सम्यक विचार-विमर्श के बाद मंत्रिपरिषद ने इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान कर दी। मनरेगा के तहत अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार का यह निर्णय इन अत्यंत कमजोर जनजातीय समुदायों की आजीविका सुरक्षा, आय में वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों से मजबूरी में होने वाले पलायन को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। झारखंड देश के उन राज्यों में शामिल है जहां PVTG की सबसे अधिक आबादी निवास करती है। राज्य में नौ PVTG समुदाय—असुर, बिरहोर, बिरजिया, कोरवा, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, परहैया, पहाड़िया (कुमारभाग) और सावर—अधिसूचित हैं।
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In Palamau Tiger Reserve In Jharkhand, Tribal Traditions Strengthen Big Cat Conservation

by The Indian Tribal
June 28, 2026

At a place where Satyajit Ray created cinematic magic in 1970, tiger folklore is making a comeback, signaling stronger wildlife protection and the conservation of indigenous cultural traditions, discovers Deepanwita Gita Niyogi

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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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