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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » द इंडियन ट्राइबल / उप्लाब्धिकर्ता » मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा: जिसने भारत को आदिवासी चेतना दी

मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा: जिसने भारत को आदिवासी चेतना दी

ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता, संविधान निर्माता और एक प्रखर आदिवासी आवाज़—मरांग गोमके (महान नेता) ने एक ही जीवन में कई भूमिकाएँ निभाईं। The Indian tribal यहाँ उनके अत्यंत समृद्ध जीवन-यात्रा पर प्रकाश डाल रहा है

January 31, 2026
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जयपाल सिंह मुंडा

रांची

तीन जनवरी 1903 को तत्कालीन बिहार प्रांत (वर्तमान झारखंड) के रांची जिले के खूंटी अनुमंडल में एक मुंडा आदिवासी परिवार में अमरू पाहन के घर जन्मे प्रमोद पाहन, परिवार के ईसाई धर्म अपनाने के बाद जयपाल सिंह मुंडा के नाम से जाने गए। उनका बचपन जमीन की लूट, बेगार और टूटे हुए समझौतों की कहानियों के बीच बीता—ऐसी स्मृतियाँ जो गांव की बातचीत में लंबे समय से मौजूद थीं, उससे पहले कि वे कानून या राजनीति की भाषा सीखते।

शिक्षा

आर्थिक सीमाओं के बावजूद उनकी तीक्ष्ण बुद्धि बचपन से ही स्पष्ट थी। मिशनरी स्कूलों ने उन्हें अंग्रेज़ी शिक्षा से परिचित कराया, लेकिन वे उन्हें अपनी जड़ों से अलग नहीं कर सके। छात्र जीवन में भी उनके भीतर पहचान को लेकर गहरी चेतना थी—वे कौन हैं, कहां से आए हैं और उनकी जनता उन व्यवस्थाओं में अदृश्य क्यों बनी रही, जो उन पर शासन करती थीं।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के मिशनरी स्कूल और एंग्लिकन एसपीजी (सोसाइटी फॉर द प्रोपेगेशन ऑफ द गॉस्पेल) द्वारा संचालित सेंट पॉल्स स्कूल, रांची में हुई, जिसका ऑक्सफोर्ड से गहरा संबंध था। एसपीजी ने ही उन्हें ऑक्सफोर्ड भेजा।

सेंट जॉन्स कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में जयपाल सिंह मुंडा ने इतिहास की पढ़ाई की। वे केवल अकादमिक उत्कृष्टता के लिए ही नहीं, बल्कि चुपचाप आत्मसात न होने के अपने रवैये के लिए भी अलग पहचान रखते थे। औपनिवेशिक दौर में ऐसे संस्थान तक पहुंचने वाले वे गिने-चुने आदिवासी भारतीयों में थे।

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सेंट जॉन्स (ऑक्सफोर्ड) की हॉकी टीम के साथ जयपाल सिंह (स्रोत – इंडियन हिस्ट्री कलेक्टिव)

वे एक उत्कृष्ट हॉकी खिलाड़ी, खेल लेखक और डिबेटिंग सोसाइटी के अध्यक्ष व सचिव भी रहे। उन्होंने विश्वविद्यालय की हॉकी टीम में खुद को एक अपरिहार्य सदस्य के रूप में स्थापित किया और अंततः हॉकी में ऑक्सफोर्ड ब्लू पाने वाले पहले भारतीय छात्र बने।

उनके एक पूर्व सहपाठी ने एक बार कहा कि वे “गरिमा के साथ अंग्रेज़ी समाज में दाखिल हुए, लेकिन कभी आत्मसमर्पण के साथ नहीं।” वे इतिहास, मानवशास्त्र और राजनीतिक दर्शन का गहन अध्ययन करते थे—हमेशा इस प्रश्न के साथ कि ज्ञान को न्याय में कैसे बदला जाए।

ब्रिटिश इतिहासकार वेरियर एल्विन, जिन्होंने बाद में भारत में आदिवासी समुदायों के साथ काम किया और जयपाल सिंह को व्यक्तिगत रूप से जानते थे, ने कहा कि जयपाल सिंह “जिस भी कक्ष में प्रवेश करते थे, अपने लोगों को साथ लेकर जाते थे, चाहे वह कितना ही अभिजात क्यों न हो।”

एल्विन ने बताया कि जयपाल सिंह इस बात से गहराई से व्यथित रहते थे कि आदिवासी समाजों को जीवंत समुदायों के बजाय केवल मानवशास्त्रीय विषयों के रूप में देखा जाता था। उन्हें ‘असाधारण देशज’ के रूप में प्रदर्शित किया जाना बेहद असहज लगता था।

ऑक्सफोर्ड में उन्होंने रात देर तक राजनीतिक दर्शन पढ़ने की आजीवन आदत विकसित की, जिसे उन्होंने अपने बाद के राजनीतिक जीवन में भी जारी रखा।

हॉकी और मैदान से परे नेतृत्व

खेल ने जयपाल सिंह मुंडा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। स्वाभाविक खिलाड़ी जयपाल सिंह ने हॉकी में उत्कृष्टता हासिल की और 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारतीय टीम की कप्तानी की, जहां भारत ने हॉकी में अपना पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता।

हॉकी इतिहासकार के. अरुमुगम ने बाद में लिखा कि जयपाल सिंह का नेतृत्व “शांत, अनुशासित और प्रभावशाली था, जो निर्देशों से नहीं बल्कि उदाहरण से संचालित होता था।”

जयपाल सिंह ने स्वयं बाद में अपने साथियों से कहा था कि यह जीत केवल पदक के कारण नहीं, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसने भारतीयों और आदिवासियों को लेकर औपनिवेशिक हीनता की धारणाओं को गलत साबित किया।

कम ही चर्चा होती है कि जयपाल सिंह खेल को एक राजनीतिक औज़ार मानते थे। उनका विश्वास था कि शारीरिक उत्कृष्टता आदिवासी समुदायों को ‘आदिम’ या ‘कमज़ोर’ बताने वाले औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों को चुनौती देती है। प्रतिस्पर्धी खेल से संन्यास लेने के बाद भी वे अंतरराष्ट्रीय हॉकी पर नज़र रखते थे और अनौपचारिक रूप से युवा आदिवासी खिलाड़ियों का मार्गदर्शन करते थे।

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जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम

1928 की जीत के बाद उन्होंने भारत के लिए फिर हॉकी नहीं खेली, लेकिन 1929 में उन्होंने मोहन बागान हॉकी क्लब की स्थापना की और टीम को कई उपलब्धियाँ दिलाईं। वे बंगाल हॉकी संघ के सचिव भी रहे।

आईसीएस छोड़ना: एक नैतिक मोड़

जयपाल सिंह मुंडा ने अत्यंत प्रतिस्पर्धी भारतीय सिविल सेवा परीक्षा विशिष्टता के साथ उत्तीर्ण की और साक्षात्कार दौर में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। 1928 में, इंग्लैंड में प्रशिक्षण के दौरान, उन्हें एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम का नेतृत्व करने का अप्रत्याशित बुलावा मिला। औपनिवेशिक प्रशासन ने उन्हें विशेष अवकाश देने से इनकार कर दिया।

उन्होंने बिना हिचकिचाहट सिविल सेवा छोड़ने और भारत का प्रतिनिधित्व करने का निर्णय लिया। बाद में इंग्लैंड लौटने पर उन्हें आईसीएस प्रशिक्षण में फिर शामिल होने की अनुमति मिली, लेकिन उन्होंने सेवा छोड़ दी और 1928–32 के बीच बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी बर्मा-शेल में वरिष्ठ कार्यकारी के रूप में काम किया। वे रॉयल डच शेल समूह में ‘कवेनेंटेड मर्केंटाइल असिस्टेंट’ पद पाने वाले पहले भारतीय बने।

राजनीतिक वैज्ञानिक एस.के. चौबे ने लिखा कि जयपाल सिंह आईसीएस को “ऐसा उपकरण मानते थे जो आदिवासियों को न्याय दिलाने में असमर्थ था, चाहे उसे कोई भी संचालित करे।”

यह निर्णय व्यक्तिगत सफलता से सामूहिक संघर्ष की ओर उनके पूर्ण संक्रमण का प्रतीक था।

राजनीतिक यात्रा

जयपाल सिंह मुंडा की औपचारिक राजनीतिक यात्रा 1930 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई, जब वे पढ़ाई पूरी कर और आईसीएस से इस्तीफा देकर भारत लौटे। 1930–31 तक वे छोटानागपुर में आदिवासी मुद्दों, विशेषकर औपनिवेशिक कानूनों, साहूकारों और वन नियमों से उत्पन्न भूमि हड़पने के प्रश्नों में सक्रिय हो गए।

इस दौरान वे ब्रिटिश प्रशासकों और उन भारतीय राजनीतिक अभिजात वर्ग के तीखे आलोचक बने, जो आदिवासी क्षेत्रों को हाशिए पर मानते थे। अपने कई समकालीनों के विपरीत, उन्होंने प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से पूर्णतः जुड़ने से परहेज़ किया, क्योंकि उनका मानना था कि मुख्यधारा की राष्ट्रवादी राजनीति में आदिवासी सरोकार दब जाते हैं।

आदिवासी महासभा का गठन

1938 में एक निर्णायक मोड़ आया, जब जयपाल सिंह मुंडा ने छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासी महासभा की स्थापना कर उसका नेतृत्व संभाला। यह संगठन वर्तमान झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के हिस्सों में फैले आदिवासी समुदायों को राजनीतिक रूप से संगठित करने के लिए बनाया गया था।

उनके नेतृत्व में महासभा ने स्पष्ट मांगें रखीं—आदिवासी भूमि की सुरक्षा, प्रथागत कानूनों की मान्यता, आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और राजनीतिक आत्म-प्रतिनिधित्व। यह पूर्वी भारत में एक स्वतंत्र, मुद्दा-आधारित आदिवासी राजनीतिक मंच बनाने का पहला सतत प्रयास था।

राष्ट्रवाद और स्वायत्तता के बीच संतुलन

1939 से 1945 के बीच जयपाल सिंह ने स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन और आदिवासी स्वायत्तता के आग्रह के बीच संतुलन बनाए रखा। वे स्वतंत्रता के लक्ष्य पर राष्ट्रीय नेताओं के साथ सहयोग करते थे, लेकिन कांग्रेस की केंद्रीकृत भारत की अवधारणा की खुलकर आलोचना भी करते थे।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध प्रयासों के लिए आदिवासी श्रम और संसाधनों के शोषण पर मुखर आवाज़ उठाई। उनके भाषणों में यह चिंता झलकती है कि यदि सुरक्षा उपायों के बिना स्वतंत्रता मिली, तो ब्रिटिश शासन की जगह आंतरिक उपनिवेशवाद ले लेगा।

संविधान सभा में प्रभावशाली आवाज़

1946 में जयपाल सिंह मुंडा आदिवासी हितों का प्रतिनिधित्व करते हुए भारत की संविधान सभा के सदस्य बने। वे उन गिने-चुने निर्दलीय उम्मीदवारों में थे, जो संविधान सभा में चुने गए।

1946 से 1949 के बीच वे सभा में सबसे मुखर आदिवासी आवाज़ बनकर उभरे। उन्होंने अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक संरक्षण, भूमि और वन अधिकारों की सुरक्षा और आदिवासी पहचान के सम्मान की जोरदार पैरवी की। उनके भाषण भावनात्मक ईमानदारी के लिए जाने जाते थे, जिनमें वे बार-बार आदिवासियों पर हुए ऐतिहासिक अन्याय की याद दिलाते थे।

हालांकि उनकी कई मांगें कमजोर कर दी गईं, फिर भी उनके हस्तक्षेपों के कारण संविधान में अनुसूचित जनजातियों के लिए संरक्षणात्मक प्रावधान शामिल हुए, जिनमें जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से जुड़े सुरक्षा उपाय भी थे।

संविधान सभा के सहकर्मियों के अनुसार, बी.आर. आंबेडकर जयपाल सिंह के वक्तव्यों को ध्यान से सुनते थे और उन्हें उन गिने-चुने सदस्यों में मानते थे, जो किसी हित समूह के लिए नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यतागत समुदाय के लिए बोलते थे।

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संविधान सभा (स्रोत – विभिन्न)

अपने सबसे चर्चित वक्तव्यों में से एक में जयपाल सिंह ने सभा को याद दिलाया कि आदिवासी अल्पसंख्यक नहीं, बल्कि इस भूमि के मूल निवासी हैं, और चेतावनी दी कि न्याय के बिना स्वतंत्रता केवल शासकों को बदलेगी, वास्तविकताओं को नहीं।

राजनीतिक सिद्धांतकार क्रिस्टोफ़ जाफ्रेलो ने बाद में लिखा कि जयपाल सिंह ने “भारत की संवैधानिक बहस में स्वदेशी अधिकारों की नैतिक भाषा उस समय पेश की, जब यह शब्दावली अस्तित्व में भी नहीं थी।”

मरांग गोमके

जयपाल सिंह मुंडा ‘मरांग गोमके’—अर्थात महान नेता—के नाम से जाने गए। यह कोई स्वघोषित उपाधि नहीं थी, बल्कि सामूहिक सम्मान का प्रतीक थी। यह नाम 1930 और 1940 के दशक में स्वाभाविक रूप से प्रचलित हुआ, जब आदिवासी समुदायों ने आदिवासी महासभा के नेतृत्व और भूमि, पहचान व स्वशासन पर उनके अडिग रुख के कारण उन्हें मरांग गोमके कहकर संबोधित किया।

प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर—विशेषकर संविधान सभा की बहसों के दौरान—आदिवासी मुद्दों को प्रभावी ढंग से रखने की उनकी क्षमता ने उन्हें औपचारिक पदों से ऊपर का कद दिया। यह उपाधि किसी संस्था द्वारा नहीं, बल्कि लोगों द्वारा दी गई नैतिक वैधता का प्रतीक थी।

चुनावी राजनीति

संविधान अपनाए जाने के बाद जयपाल सिंह चुनावी राजनीति में आए। 1951–52 में उन्होंने पहला आम चुनाव लड़ा और खूंटी से लोकसभा सांसद बने।

इस दौर में उन्हें संसदीय लोकतंत्र की वास्तविकताओं का सामना करना पड़ा। वे भूमि विस्थापन और औद्योगिक परियोजनाओं जैसे आदिवासी मुद्दे लगातार उठाते रहे, लेकिन अक्सर अलग-थलग पड़ गए। दलों की संख्या और गठबंधनों से संचालित राजनीति उनके सिद्धांतवादी दृष्टिकोण से मेल नहीं खाती थी।

झारखंड की अवधारणा का जन्म

उनके नेतृत्व में 1949 में आदिवासी महासभा ने झारखंड पार्टी का रूप लिया, जो एक अलग राज्य की लंबे समय से चली आ रही आदिवासी आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति थी। आदिवासी महासभा के संगठनात्मक आधार से उभरी इस पार्टी ने वर्तमान झारखंड और उससे सटे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में फैले आदिवासी समुदायों के लिए ‘झारखंड’ को एक मातृभूमि के रूप में स्थापित करने की स्पष्ट मांग रखी। जयपाल सिंह के लिए यह पार्टी केवल एक चुनावी माध्यम नहीं थी, बल्कि भारतीय संघ के भीतर भूमि, संस्कृति और स्वशासन की रक्षा का एक संवैधानिक साधन थी।

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रांची में आदिवासी जननायक के नाम पर रखा गया है मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा हॉकी स्टेडियम

सुदृढ़ीकरण

1950 के दशक की शुरुआत में झारखंड पार्टी बिहार के आदिवासी क्षेत्रों में एक सशक्त राजनीतिक ताकत बन गई। 1952 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी 30 सीटें जीतकर प्रमुख विपक्ष बनी और 4 लोकसभा सीटें भी हासिल कीं।

1957 के चुनाव में पार्टी ने 34 विधायक और 5 सांसद जीते। 1957 से 1962 तक जयपाल सिंह खूंटी से सांसद रहे। 1962 में पार्टी ने 22 विधायक और 5 सांसद जीते, जिनमें वे स्वयं शामिल थे।

कांग्रेस में विलय और मोहभंग

1963 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर जयपाल सिंह ने आदिवासी महासभा को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय करने का विवादास्पद निर्णय लिया। उनका मानना था कि इससे आदिवासी मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक महत्व मिलेगा।

लेकिन 1960 के दशक के अंत तक उन्हें एहसास हो गया कि आदिवासी सरोकार अक्सर चुनावी गणनाओं के अधीन कर दिए जाते हैं।

वे शब्द जो आज भी गूंजते हैं

जयपाल सिंह मुंडा के सबसे स्थायी वक्तव्यों में यह चेतावनी शामिल थी कि स्वतंत्रता भारतीय शासन के तहत औपनिवेशिक शोषण की निरंतरता नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी भूमि, संस्कृति और स्वायत्तता छीनना स्वतंत्रता से विश्वासघात होगा।

उनका एक मूल विश्वास, जो भाषणों और लेखन में बार-बार सामने आया, यह था कि विकास से पहले आत्मसम्मान आवश्यक है, और गरिमा के बिना आर्थिक योजनाएँ आदिवासियों के लिए असफल होंगी।

घर में जयपाल सिंह

उनके बच्चों ने उन्हें सौम्य, संयमी और अत्यंत सिद्धांतवादी व्यक्ति के रूप में याद किया। उन्होंने बताया कि वे घर पर राजनीति पर कम बोलते थे, लेकिन अनुशासन, पढ़ने और आत्मसम्मान पर ज़ोर देते थे। परिवार के अनुसार, उन्हें बागवानी और मौन में टहलना पसंद था। देशज पौधों से उनका विशेष लगाव था—जो कठोरता के बिना जड़ों से जुड़े रहने का प्रतीक था।

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विभिन्न अवसरों पर जयपाल सिंह मुंडा (स्रोत – बेटर इंडिया)

मृत्यु और विरासत

20 मार्च 1970 को जयपाल सिंह मुंडा का निधन हो गया। उनके निधन को सीमित राष्ट्रीय ध्यान मिला, जिसे कई विद्वान उनकी राजनीति से पैदा हुई असहजता का प्रतिबिंब मानते हैं।

जयपाल सिंह मुंडा केवल एक आदिवासी नेता नहीं थे; वे भारत के शुरुआती स्वदेशी राजनेता थे। उन्होंने राष्ट्र को उन प्रश्नों से रूबरू कराया, जिनका उत्तर वह आज भी खोज रहा है—भूमि, सहमति, गरिमा और अपनापन।

आज उन्हें पढ़ने वाले एक ऐसी आवाज़ को पहचानते हैं, जो अब भी अधूरी है। भारत आगे बढ़ गया है, लेकिन जयपाल सिंह मुंडा अब भी पूरी तरह सुने जाने की प्रतीक्षा में हैं। मानवशास्त्री वेरियर एल्विन ने उनके निधन के तुरंत बाद लिखा कि वे “इतने ईमानदार व्यक्ति थे कि उन्हें आसानी से याद नहीं किया जा सकता।”

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