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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » द इंडियन ट्राइबल / उप्लाब्धिकर्ता » धान के दाने पर जादूगरी दिखाता है ये शिल्पकार

धान के दाने पर जादूगरी दिखाता है ये शिल्पकार

अपने समकालीन कलाकारों के विपरीत नबरंगपुर के इस भोत्रा आदिवासी ने अपने डिजाइनों में अलग छाप छोडऩे एवं कुछ नया करने के लिए अपना कौशल लगातार निखारा। लीक से हटकर कुछ खास करने वाले धान शिल्पकार पर निरोज रंजन मिश्रा की रिपोर्ट

December 18, 2023
उड़ीसा का धान शिल्प | Paddy Craft | The Indian Tribal

पदमन मुंडा अपनी रचनाओं के साथ

भुवनेश्वर

वह अपने बाएं हाथ में बांस के दो टुकड़े थामे रहता है।दाहिने हाथ से वह अपने पास ढेर से धान का एक दाना उठाता है और धीरे से बांस के दोनों टुकड़ों के बीच फंसा देता है। इसके बाद वह सामने कुंडल से अपने चुने हुए रंग का धागा खींचता है और उसे धान के दाने के चारों ओर बुनता है। इस प्रक्रिया को दोहराता हुआ वह एक और दाना उठाकर बांस की खप्पचों के बीच रखता है और पहले वाले दाने से बांध कर उसे भी बुन देता है। इस तरह वह लगातार धान के दानों को एक-दूसरे से बांधता और बुनता जाता है। दिनभर में वह बस नाश्ते, दोपहर के भोजन और शाम की चाय के लिए ही रुकता है। पूरे एक सप्ताह की मेहनत से अंतत: धान के दानों से एक फीट ऊंची भगवान गणेश की मूर्ति तैयार होती है। बेहद आकर्षक यह मूर्ति बाजार में बिक्री के लिए चली जाती है। 

रात-दिन अपने कला-कौशल से भोत्रा जनजाति के पदमन मुंडा (29) इसी तरह भगवान गणेश समेत असंख्य देवी-देवताओं, जानवरों और पक्षियों की आकृतियां गढ़ते हैं। 

ओडिशा के नबरंगपुर के लिंबट्टा गांव के रहने वाले पदमन, उनकी पत्नी, दो भाई और माता-पिता सब मिलकर इसी कला के जरिए हर महीने लगभग 40,000 रुपये कमा लेते हैं। 

दो बेटियों के पिता पदमन ने The Indian Tribal  को बताया कि धान पर उभरने वाली यह आदिवासी धान शिल्प कला वस्तुत: हमारे बड़े परिवार का भरण-पोषण करने में काफी मददगार है, क्योंकि हमारे पास एक एकड़ भूमि है। इसमें हम देशी धान सापुरी उगाते हैं। हर साल लगभग 14 कुंतल धान पैदा होता है, जिसमें से तीन कुंतल हम अपने शिल्प के लिए अलग रख लेते हैं, जबकि शेष पूरे साल खाने के लिए अलग रखी जाती है।

Padaman Munda With His Creations I The Indian Tribal
पदमन की धान शिल्प कला

इस शिल्प कला में धान की कई देशी किस्मों का उपयोग किया जाता है, लेकिन सापुरी पदमन की पसंदीदा है, क्योंकि यह आकार में बड़ी है और अपने ही खेत में उगाने के कारण उनका काम काफी आसान हो जाता है। उन्होंने बताया कि पहले वह धान को हल्दी के पानी में भिगोते हैं और उसके बाद धूप में सुखाते हैं। हल्दी के पानी में भिगोने से धान खराब होने से बच जाता है और उसकी चमक भी बढ़ जाती है।

पदमन अपने कुशल और फुर्तीले हाथों से हर महीने औसतन 15 शिल्प बुन लेते हैं। उसी अवधि के दौरान उनके परिवार के अन्य सदस्य भी 40 से अधिक शिल्प तैयार कर लेते हैं। पदमन की पत्नी तुलसी मुंडा कहती हैं कि पदमन पूरे परिवार में शिल्प तैयार करने में सबसे तेज और होशियार है। यही कारण है कि भुवनेश्वर स्थित राज्य जनजातीय संग्रहालय ऐसे धान शिल्प बनवाने के लिए उन्हीं को काम सौंपता है।

जनजातीय संग्रहालय के क्यूरेटर, पुरुषोत्तम पटनायक, तुलसी द्वारा अपने पति के बारे में कही गई बातों पर हामी भरते हैं। पटनायक ने कहा कि पहले हमारे लिए काम करने वाले शिल्पकार ढीले और सुस्त थे, लेकिन पदमन बेहद ईमानदारी से रचनात्मक काम करते हैं।

पदमन का शिल्प उनके अपने गांव और आसपास के लोगों में हॉट केक की तरह बिकता है, खासकर अक्षय तृतीया, बाली यात्रा और दिवाली जैसे उत्सव के अवसरों के दौरान तो उनके तैयार किए गए देवी-देवताओं की बिक्री दस प्रतिशत तक बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि मैं राज्य की राजधानी में वार्षिक आदिवासी मेले सहित विभिन्न मेलों में भी अपनी बनाई वस्तुएं बेचता हूं। प्रत्येक शिल्प की कीमत 300 रुपये से लेकर 600 रुपये तक होती है। शिल्प की कीमत उसकी ऊंचाई, लंबाई-चौड़ाई आदि से तय होती है। 

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें या उनके परिवार को शिल्प के लिए कोई सरकारी सहायता मिली है, तो उन्होंने कहा कि अपना घर बनाने के लिए साल 2022 में हमें राज्य उद्योग विभाग की ओर से 1.30 लाख रुपये मिले थे। 

Padaman's Array of Creations I The Indian Tribal
पदमन की रचनाओं की श्रृंखला

धान की शिल्पकला पदमन को अपने पिता और दादा से विरासत में मिली थी, लेकिन वह इसमें लीक से हटकर कुछ नया करना चाहते थे। पहली बार 2012 में जिला उद्योग केंद्र, नबरंगपुर ने उन्हें और चार अन्य लोगों को छह महीने के प्रशिक्षण के लिए चुना। इस कार्यक्रम के तहत उन्हें विशेष कला का प्रशिक्षण दिया जाना था। इस दौरान अपने कौशल को निखारने के साथ-साथ उन्होंने बांस के टुकड़ों और पीले, हरे, काले और लाल रंग के धागों की मदद से देशी धान सापुरी से विविध डिजाइन बनाने की दिशा में काम शुरू किया। 

उनके कुशल हाथों ने छोटी-छोटी बालियां, लॉकेट, हार और अंगूठियों के साथ-साथ विभिन्न देवी-देवताओं की छोटी और बड़ी मूर्तियां बनाईं। लेकिन, उनके लिए असली परीक्षा की घड़ी 2013 और 2015 के बीच आई, जब उन्हें पांच अन्य शिल्पकारों के साथ मानव संग्रहालय, भोपाल और क्षेत्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय, मैसूर में आमंत्रित किया गया। पदमन और उनकी टीम ने मैसूर में अपने 10 दिवसीय प्रवास के दौरान 12 मूर्तियां बनाईं। इसी प्रकार उन्होंने भोपाल में 21 दिन में तीन आदिवासी देवताओं- झंगडा भीमा, रेला खंडूरी और टेंगुआ भीमा की विशाल मूर्तियां बनाईं।पदमन ने The Indian Tribal  से बातचीत में बताया कि भोपाल की यात्रा सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण रही, क्योंकि हमें 10 किलोग्राम धान से सात फीट ऊंची मूर्तियां बनानी थीं। इनमें प्रत्येक का वजन 30 किलोग्राम से अधिक था।

Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri

In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

झारखंड में PVTG परिवारों को अब मनरेगा में मिलेंगे 150 दिन का रोजगार

मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई झारखंड मंत्रिपरिषद की बैठक में विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (PVTG) के लिए बड़ा फैसला लिया गया। कैबिनेट ने राज्य में मनरेगा के तहत इन्हें वित्तीय वर्ष में निर्धारित 100 दिनों के रोजगार के अतिरिक्त 50 दिनों का और रोजगार उपलब्ध कराने को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही PVTG परिवारों को अब वर्ष में कुल 150 दिनों का रोजगार मिल सकेगा। बैठक में वीबी-जी रामजी (VB-G RAM G) पर भी विस्तृत चर्चा की गई। सम्यक विचार-विमर्श के बाद मंत्रिपरिषद ने इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान कर दी। मनरेगा के तहत अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार का यह निर्णय इन अत्यंत कमजोर जनजातीय समुदायों की आजीविका सुरक्षा, आय में वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों से मजबूरी में होने वाले पलायन को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। झारखंड देश के उन राज्यों में शामिल है जहां PVTG की सबसे अधिक आबादी निवास करती है। राज्य में नौ PVTG समुदाय—असुर, बिरहोर, बिरजिया, कोरवा, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, परहैया, पहाड़िया (कुमारभाग) और सावर—अधिसूचित हैं।
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In Palamau Tiger Reserve In Jharkhand, Tribal Traditions Strengthen Big Cat Conservation

by The Indian Tribal
June 28, 2026

At a place where Satyajit Ray created cinematic magic in 1970, tiger folklore is making a comeback, signaling stronger wildlife protection and the conservation of indigenous cultural traditions, discovers Deepanwita Gita Niyogi

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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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