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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » सुप्रीम कोर्ट ने एशिया के सबसे बड़े साल जंगल सारंडा में ‘सीमा’ क्यों तय की?

सुप्रीम कोर्ट ने एशिया के सबसे बड़े साल जंगल सारंडा में ‘सीमा’ क्यों तय की?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले ने भारत के सबसे समृद्ध वन परिदृश्यों में से एक सारंडा में संरक्षण, खनन और आदिवासी आजीविका के बीच संतुलन की रेखा दोबारा खींच दी है। अनीमेश बिसोई बताते हैं कि इस आदेश का पर्यावरण, उद्योग और स्थानीय समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ेगा

December 20, 2025
The Indian Tribal

सारंडा वन अब भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र है

जमशेदपुर/रांची

एक ऐतिहासिक आदेश में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने  झारखण्ड  सरकार को 31,468 हेक्टेयर (314.68 वर्ग किमी) के पारिस्थितिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण सारंडा वन को आधिकारिक रूप से वन्यजीव अभयारण्‍य घोषित करने का निर्देश दिया है। 13 नवंबर को जारी इस आदेश में राज्य को तीन महीनों की समयसीमा दी गई है और निर्धारित क्षेत्र में खनन पर स्पष्ट रोक लगाई गई है।

सर्वोच्च न्यायालय ने जोर दिया कि यह कदम एशिया के सबसे बड़े साल जंगल के संरक्षण और सदियों से वहाँ रहने वाली आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। सारंडा  को दुनिया के सबसे स्वच्छ और संरक्षित साल वनों में से एक बताते हुए अदालत ने इसकी वैश्विक पारिस्थितिकी महत्ता को रेखांकित किया।

फैसले में यह भी दर्ज किया गया कि सारंडा  में साल फॉरेस्ट टॉर्टॉयज़, फोर-हॉर्न्ड एंटीलोप, एशियन पाम सिवेट और जंगली हाथियों जैसी संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं। साथ ही यह भी माना कि यहाँ के हो, मुंडा और उराँव जैसे आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से अपनी आजीविका, संस्कृति और पहचान के लिए इसी जंगल पर निर्भर रहे हैं।

झारखण्ड  के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित सारंडा कभी अत्याधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र हुआ करता था। हालांकि लगातार किए गए अभियानों के बाद माओवादी प्रभाव काफी कम हुआ है, लेकिन पश्चिमी सिंहभूम अभी भी देश के सबसे अधिक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में से एक है।

जहाँ खनन और संरक्षण टकराते हैं

यह फैसला ऐसे समय आया है जब सारंडा  लंबे समय से देश का प्रमुख लौह अयस्क क्षेत्र माना जाता है। अदालत में पेश रिपोर्टों में बताया गया कि सारंडा  वन प्रभाग में देश के 26% लौह अयस्क भंडार हैं, जो चिरिया, गुआ, किरीबुरू, मेघाहाटुबुरू और विजय-2 स्थित सेल और टाटा स्टील के संयंत्रों की प्रमुख आपूर्ति करते हैं।

लेकिन  झारखण्ड  सरकार पूरे क्षेत्र को अभयारण्‍य घोषित करने में शुरू से झिझक रही थी। राज्य ने अपने प्रारंभिक हलफनामे में केवल 24,941.64 हेक्टेयर (249.41 वर्ग किमी) को अभयारण्य बनाने का प्रस्ताव रखा था, यह कहते हुए कि इससे “महत्वपूर्ण सार्वजनिक अवसंरचना को हटाना पड़ेगा” और आदिवासी बस्तियों पर असर पड़ेगा।

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सारंडा वन प्रभाग में देश के 26% लौह अयस्क भंडार

हालाँकि बाद में स्पष्ट किया गया कि प्रस्तावित 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र में न तो खनन होता है और न ही किसी गैर-वन गतिविधि का उपयोग है।

सुप्रीम कोर्ट ने 1968 में बिहार सरकार द्वारा जारी मूल अधिसूचना पर भरोसा किया, जिसमें इसी पूरे क्षेत्र (314 वर्ग किमी) को सारंडा  गेम सैंक्चुअरी घोषित किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने निर्देश दिया: “राज्य सरकार 1968 की अधिसूचना में दर्शाए गए 126 कंपार्टमेंटों को—छह कंपार्टमेंट (KP-2, KP-10, KP-11, KP-12, KP-13, KP-14) को छोड़कर—इस निर्णय की तिथि से तीन माह के भीतर वन्यजीव अभयारण्य घोषित करेगी।”

सारंडा  का पारिस्थितिक महत्व और गिरावट

82,000 हेक्टेयर में फैला सारंडा  कभी एशिया की महान साल वन प्रणाली और हाथियों का प्रमुख गलियारा था। वन्यजीव संस्थान (WII) की रिपोर्ट में बताया गया कि वर्षों के लौह अयस्क खनन ने हाथियों के रास्ते नष्ट कर दिए, आवासों को खंडित किया और जंगल की पारिस्थितिकी को गंभीर रूप से बदल दिया।

खनन 1906 से हो रहा है, लेकिन 2000 में  झारखण्ड  बनने के बाद इसमें तेज विस्तार हुआ। राज्य ने स्वीकार किया कि 1968 की अधिसूचना “रिकॉर्ड से गायब” हो गई, जिसके चलते 21वीं सदी में खनन अनियंत्रित रूप से बढ़ा।

2001 में  झारखण्ड  ने सिंहभूम हाथी आरक्षित क्षेत्र बनाया, जिसका कोर सारंडा  था। पर्यावरणविद् आर.के. सिंह ने इसका विरोध किया, यह कहते हुए कि मूल अभयारण्‍य क्षेत्र को ही संरक्षित कोर होना चाहिए था, जिसके बाहर ईको-सेंसिटिव ज़ोन बनाया जाता।

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सारंडा जंगल से होकर गुजरती हुई सड़क जिसके दोनों तरफ साल के हज़ारों हज़ार वृक्ष हैं

2022 में NGT ने राज्य को सारंडा  को अभयारण्‍य घोषित करने पर विचार करने का निर्देश दिया, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। अंततः संरक्षणवादियों ने टी.एन. गोदावर्मन मामले के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

आदिवासी चिंताएँ, पवित्र स्थल और अदालत की आश्वस्ति

संरक्षणवादी जहाँ सारंडा  को बचाने पर जोर दे रहे थे, वहीं आदिवासी समुदायों को डर था कि अभयारण्य बनने से आवाजाही, आजीविका और सांस्कृतिक पवित्र स्थलों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

आदिवासी मुंडा समाज विकास समिति के केंद्रीय अध्यक्ष बुधराम लागुरी ने The Indian Tribal से कहा कि सारंडा  में 50 राजस्व गाँव और 10 वन गाँव हैं। उन्होंने कहा: “हम अभयारण्‍य अधिसूचना का विरोध कर रहे थे, क्योंकि इससे हमारी आजीविका खत्म होने का भय था। हमारा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध सारंडा  से अविभाज्य है। हमारे सरना, देसौली, सासांदिरी, मसना जैसे कई पवित्र स्थल इसी जंगल में हैं।”

लागुरी ने बताया कि वन उपज, जड़ी-बूटियाँ और लौह अयस्क खदानों में रोजगार स्थानीय जीवन का आधार हैं।
उन्होंने कहा: “हमें डर था कि सारंडा  को अभयारण्‍य घोषित करने से हमारी बस्तियाँ, पहचान और आजीविका नष्ट हो जाएगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अभयारण्य से कोई भी व्यक्तिगत या सामुदायिक अधिकार प्रभावित नहीं होंगे, जिसके बाद आंदोलन समाप्त हो गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अधिकारों की गारंटी मिलने के बाद हमने आंदोलन रोक दिया।”

परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण का वैज्ञानिक आधार

WII ने सारंडा  को खनन, गैर-खनन और संरक्षण जोनों में वर्गीकृत करते हुए हाथियों के रास्तों और पारिस्थितिक मानकों के आधार पर तत्काल संरक्षण की सिफारिश की थी।

अदालत में पर्यावरणवादी आर.के. सिंह ने कहा: “हाथियों के प्रभावी संरक्षण के लिए परिदृश्य-स्तरीय दृष्टि आवश्यक है, जो केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित न होकर बहुउद्देश्यीय वनों, बागानों और महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारों को भी समाहित करे। सारंडा  को ‘खाली जंगल’ कहना गलत है। यहाँ विविध जीव प्रजातियाँ हैं और एशियाई हाथी अब भी कई गलियारों का उपयोग करते हुए  झारखण्ड  और पड़ोसी राज्यों के बीच आवागमन करते हैं।”

सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि आदिवासियों की चिंताएँ भ्रम पर आधारित हैं: “अभयारण्य बनने से पारंपरिक अधिकार खत्म हो जाएंगे — यह गलतफहमी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि 314 वर्ग किमी क्षेत्र की अधिसूचना से आदिवासी अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।”

अदालत का रुख: आदिवासी अधिकार और राज्य की ज़िम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा: “वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA) की धारा 24(2)(c) और वन अधिकार अधिनियम (FRA) की धारा 3 तथा 4(1) की प्रावधानों के तहत अभयारण्य घोषित होने के बाद भी आदिवासियों और वनवासियों के अधिकार पूर्णतः सुरक्षित हैं।”

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सुप्रीम कोर्ट

राज्य को फटकारते हुए अदालत ने कहा: “यह कहना कि अभयारण्‍य बनने से आदिवासी बस्तियाँ और अधिकार समाप्त हो जाएंगे या सार्वजनिक अवसंरचना (स्कूल, सड़कें आदि) हटानी पड़ेगी — राज्य की महज़ कल्पना है। राज्य को चाहिए था कि वह FRA और WPA में उपलब्ध अधिकारों के बारे में आदिवासियों को शिक्षित करता।”

अदालत ने  झारखण्ड  सरकार को निर्देश दिया कि वह व्यापक रूप से प्रचारित करे कि सारंडा  के किसी भी आदिवासी या वनवासी का व्यक्तिगत या सामुदायिक अधिकार प्रभावित नहीं होगा। साथ ही अदालत ने यह भी कहा: “राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्‍य तथा उनके एक किलोमीटर के दायरे में किसी भी प्रकार का खनन अनुमति-योग्य नहीं होगा।”

सितंबर 2025 में  झारखण्ड  कैबिनेट पहले ही 314.65 वर्ग किमी क्षेत्र को राज्य के 12वें अभयारण्य और 1-किमी ईको-सेंसिटिव ज़ोन के रूप में अनुमोदित कर चुका है, लेकिन अंतिम अधिसूचना अभी जारी नहीं हुई है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया धीमी, लेकिन दांव बड़ा

इतने महत्वपूर्ण निर्णय के बावजूद राज्य की सत्ताधारी JMM और विपक्षी BJP दोनों ने अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पहले कह चुके थे कि सरकार अभयारण्य की अधिसूचना जारी करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि वन-निर्भर समुदाय किसी जोखिम में न पड़ें। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दोनों दल चुप हैं।

सिंहभूम क्षेत्र की राजनीतिक अहमियत बहुत बड़ी है। यह संसदीय सीट दशकों तक कांग्रेस और JMM के नेताओं — बागुन सुम्बरुई, विजय सिंह सोय, गीता कोड़ा — के प्रभाव में रही है। वर्तमान में यह सीट JMM की जोबा मांझी के पास है। BJP ने इसे केवल दो बार (1999 और 2014 में) जीता।

आज क्षेत्र की छह में से पाँच विधानसभा सीटें JMM-कांग्रेस के पास हैं। एकमात्र अपवाद सरायकेला है, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व JMM नेता चंपाई सोरेन (जो 2024 विधानसभा चुनाव से पहले BJP में शामिल हुए) ने जीता है।

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In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

Saura children to be imparted education in own language

In a novel move, the Gajapati district administration in Odisha has launched an initiative titled 'Aame Padhibaa Aama Bhasare' (we will learn in our own language) to impart pre-school education to children belonging to the Saura tribal community, one of the oldest Scheduled Tribes, in their own language. The programme will cover 30 anganwadi centres in Gumma and Rayagada blocks of Gajapati district which has around 90 per cent of the Saura population. In the first phase of the initiative, the State government has decided to implement the programme in six tribal-majority districts namely Gajapati, Malkangiri, Nabarangpur, Rayagada, Kandhamal and Keonjhar. The children will be taught in indigenous languages such as Koya (Malkangiri), Gondi (Nabarangpur), Kuvi (Rayagada) and Saura (Gajapati).
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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