नादिया (पश्चिम बंगाल)
‘रुगड़ा’ (Astraeus hygrometricus) एक दुर्लभ, जंगली और स्वदेशी खाद्य मशरूम है, जो पश्चिम बंगाल के छोटानागपुर पठार के लाल लेटराइट क्षेत्र के घने और आर्द्र साल (Shorea robusta) जंगलों में पाया जाता है। यह मुख्य रूप से पुरुलिया, बांकुरा, बिर्भूम और पश्चिम मेदिनीपुर में मिलते हैं। झारखंड में यह रांची, गुमला, लोहारदगा, खूंटी और सिमडेगा जिलों में अधिक पाया जाता है।
अनुकूल जलवायु और प्राकृतिक वृद्धि के कारक
पश्चिम बंगाल में इसे फुतका, खुड़की और पट्टू नामों से जाना जाता है। यह जुलाई से सितंबर के बीच मानसून में साल पेड़ों की जड़ों के पास मिट्टी के अंदर उगता है। साल पेड़ों के साथ इसका सहजीवी संबंध इसे जनजातीय समुदायों के लिए महत्वपूर्ण मौसमी भोजन और आय का साधन बनाता है।
उच्च वर्षा, मध्यम धूप और 28°C–30°C तापमान इसकी वृद्धि के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। सड़ी हुई साल पत्तियाँ इसे पोषक ह्यूमस प्रदान करती हैं। मानसून शुरू होते ही जमीन की हल्की उभरी सतहें इसके होने का संकेत देती हैं। उपलब्ध प्रजातियों में सफेद रंग वाला रुगड़ा सबसे अधिक पौष्टिक माना जाता है।
जनजातीय समुदायों का पोषण-स्रोत
रुगड़ा सदियों से ग्रामीण जनजातीय समुदायों का पारंपरिक भोजन रहा है और पोषण व आजीविका दोनों का आधार है। माना जाता है कि 100 ग्राम ताज़े रुगड़ा में 83.9 ग्राम नमी, 3.68 ग्राम प्रोटीन, 1.98 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 0.42 ग्राम वसा और 3.11 ग्राम रेशा पाया जाता है। इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन B2, B12, B3 और पोटैशियम, कॉपर, कैल्शियम, आयरन और फॉस्फोरस जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण इसे पश्चिम बंगाल और झारखंड में “शाकाहारी मटन” कहा जाता है।
पारंपरिक औषधीय महत्व और स्वास्थ्य लाभ
यह मशरूम अपने विविध जैव सक्रिय यौगिकों और सिद्ध औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है—एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-कैंसर, एंटी-माइक्रोबियल, एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटी-डायबिटिक प्रभाव इनमें शामिल हैं। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कैंसर और अस्थमा के प्रबंधन में सहायक होता है। इसमें मौजूद उच्च प्रोटीन वजन बढ़ाने में मदद करता है, जबकि मैनिटॉल की अधिकता इसे मधुमेह रोगियों के लिए लाभकारी बनाती है। यह हृदय स्वास्थ्य को भी सहारा देता है और रक्तचाप नियंत्रित करने में सहायक है।
जनजातीय महिलाएँ: परंपरागत ज्ञान की संरक्षक
रुगड़ा की पहचान और संग्रह में जनजातीय महिलाएँ विशेष दक्ष होती हैं। बरसात के मौसम में वे साल के जंगलों में गहराई तक जाती हैं, मशरूम इकट्ठा करती हैं, उन पर जमी मिट्टी साफ करती हैं और फिर स्थानीय हाटों में बेचती हैं। ताज़ा रुगड़ा बाजार में 800 रुपये से 1,500 रुपये प्रति किलो तक बिकता है, जो कई परिवारों के लिए महत्त्वपूर्ण मौसमी आय का साधन है। यह केवल ताज़े रूप में उपलब्ध होता है, क्योंकि इसे न तो संरक्षित किया जा सकता है और न ही प्रसंस्कृत।

खानपान और सांस्कृतिक महत्ता
रुगड़ा छोटा, गोलाकार, सफेद और बिन-डंठल वाला मशरूम होता है। इसकी कठोर बाहरी परत के भीतर काले रंग का गूदानुमा हिस्सा होता है, जो इसके स्वाद और सुगंध का मूल स्रोत है। इसे प्रायः मांस के विकल्प के रूप में उपयोग किया जाता है, क्योंकि इसकी बनावट और पाचन क्षमता मांस जैसी मानी जाती है। रुगड़ा करी और रुगड़ा पकोड़ा इसके लोकप्रिय व्यंजन हैं।
आस्था, परंपरा और सामाजिक महत्व
भोजन के अलावा रुगड़ा जनजातीय जीवन की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धारा से जुड़ा हुआ है। कई लोग मानते हैं कि पकाने से इसका औषधीय प्रभाव कम हो जाता है, इसलिए छोटे और कच्चे रुगड़ा को कच्चे रूप में भी खाया जाता है। यह खाद्य सुरक्षा, परंपरागत उपचार पद्धतियों और घरेलू अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अत्यधिक नाशवान और सीमित बाजार पहुँच की चुनौती
रुगड़ा अत्यधिक नाशवान होता है और इसे तोड़ने के आठ घंटे के भीतर ही उपभोग करना आवश्यक होता है। यह केवल मानसून में उगता है और लंबे समय तक संग्रहित नहीं किया जा सकता। इसकी कम शेल्फ लाइफ, विशेष जलवायु आवश्यकताएँ और प्रसंस्करण तकनीक की अनुपस्थिति के कारण इसकी व्यावसायिक उपलब्धता सीमित रहती है। लंबी दूरी तक इसका परिवहन भी कठिन है।
जलवायु परिवर्तन, आवास ह्रास और घटती पैदावार
अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और लम्बे समय तक रहने वाला बादली मौसम रुगड़ा की पैदावार घटा रहे हैं। साल जंगलों की कटाई—खनन, निर्माण और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण—इसके प्राकृतिक आवास को तेजी से नष्ट कर रही है। अधिक मांग के चलते अत्यधिक दोहन भी इसके अस्तित्व पर खतरा बन गया है। वैज्ञानिक खेती या टिकाऊ संग्रहण पद्धतियों के अभाव में रुगड़ा विलुप्ति की ओर बढ़ सकता है।
संरक्षण और टिकाऊ संग्रहण की तात्कालिक आवश्यकता
इस प्राचीन और स्वदेशी व्यंजन को बचाने के लिए साल जंगल पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण, टिकाऊ संग्रहण को बढ़ावा और इसके वैज्ञानिक उत्पादन पर शोध में निवेश आवश्यक है। रुगड़ा केवल मौसमी भोजन नहीं है—यह सांस्कृतिक धरोहर, स्वास्थ्य संसाधन और आजीविका का आधार है। इसका संरक्षण जनजातीय समुदायों के जीवन, आजीविका और पर्यावरण संतुलन के लिए अनिवार्य है।
(लेखक सुश्रिजो इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंस, टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट, नादिया, पश्चिम बंगाल में उद्यानिकी के व्याख्याता हैं)














