बांसवाड़ा
ये कहानियाँ उन आदिवासी महिलाओं की हैं जिन्होंने औपचारिक शिक्षा के बिना, संसाधनों की कमी के बावजूद, अपने गांवों में बदलाव की अलख जगाई।
आदिवासी समाज में महिला नेतृत्व के उभरते नए मॉडल का प्रमाण हैं ये चारों आदिवासी महिलाएं। एक ने पानी और कृषि उत्पादकता को बदला, तो दुसरे ने सरकारी योजनाओं को गरीब बच्चों तक पहुँचाया, तीसरे ने देशी बीज और पोषण सुरक्षा को पुनर्जीवित किया, तो चौथे ने सामाजिक कुरीतियों को चुनौती देकर लड़कियों का भविष्य सुरक्षित किया।
राजस्थान के दक्षिणी सिरे पर स्थित बांसवाड़ा जिले का घाटोल ब्लॉक पहाड़ी भूभाग, वर्षा आधारित खेती, सीमांत जोत और प्रवास-निर्भर परिवारों के लिए जाना जाता है। यहां भील जनजाति बहुसंख्यक है।
यह अनुसूचित जनजाति समुदाय पीढ़ियों से कृषि और श्रम पर आधारित जीवन जीता आया है। पानी की कमी, कम पैदावार और पुरुष-प्रधान सामाजिक ढांचा इन गांवों की पहचान रहे हैं।
इसी पृष्ठभूमि में गोज राठौर गांव की 45 वर्षीय इंद्रा देवी उभरती हैं—एक साधारण किसान, जिन्होंने असाधारण नेतृत्व दिखाया है।
पहाड़ी जमीन, बूंद-बूंद पानी और मेहनत के बावजूद कम उपज, यही उनकी जिंदगी थी। लेकिन वागधारा (NGO) के ग्राम स्वराज समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने पहली बार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के बारे में सुना। यह योजना सीमांत किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली उपलब्ध कराती है, जिससे पानी की बचत और उत्पादकता बढ़ती है।
पहले उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि सरकार सीधे उनसे बात कर सकती है। लेकिन NGO के फील्ड कार्यकर्ता ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। ग्राम सेवक की मदद से उन्होंने पहला आवेदन किया। दस परिवारों से शुरुआत हुई। फिर 20, 50, 100, और आज 250 से अधिक परिवार योजना से लाभान्वित हो चुके हैं।
इंद्रा स्वयं रूपजी का खेड़ा स्थित सरकारी कार्यालय से फॉर्म लाती हैं। आधार कार्ड मोबाइल से लिंक करवाती हैं। ओटीपी सत्यापन कराती हैं। बैंक से समन्वय करती हैं। कई बार अपनी जेब से पेट्रोल खर्च कर किसानों को कार्यालय ले जाती हैं। हर किसान को 700 फीट ड्रिप पाइप और 40 स्प्रिंकलर हेड्स का सेट दिलाया गया। अपने घर के बाहर वे प्रशिक्षण सत्र आयोजित कर सिस्टम की स्थापना और रखरखाव सिखाती हैं।

“पहले लोग कहते थे कि औरतें घर से बाहर क्यों घूम रही हैं। लेकिन जब खेतों में पानी पहुँचा और फसल अच्छी हुई, तब वही लोग मुझे ‘दीदी’ कहने लगे। मैं वागधारा गठित सक्षम महिला समूह में शामिल होकर सरकारी योजनाओं की जानकारी मिली और मेरा क्षमता वर्धन प्रशिक्षण किया गया। अब मुझे लगता है कि मैंने सिर्फ पानी नहीं, अपने लिए सम्मान भी पाया है,” इंद्रा देवी ने बताया।
उन्होंने वर्मी-कम्पोस्ट और बेहतर बीजों से किसानों को जोड़ा। महिलाओं को संगठित कर जल संरचना की मांग उठाई। 2019 में हैंडपंप लगे। अब महिलाओं को रोज एक किलोमीटर दूर पानी लाने नहीं जाना पड़ता।
गीता देवी निनामा कहती हैं: “इंद्रा दीदी के बिना हमें कभी ड्रिप सिंचाई नहीं मिलती। उन्होंने हमें फॉर्म भरना, बैंक जाना सब सिखाया। आज हमारी फसल और आमदनी दोनों बढ़ी हैं।”
शुरुआत में उनके पति ने घूंघट हटाने और बाहर जाने पर आपत्ति की। लेकिन परिणामों ने विरोध को समर्थन में बदल दिया। 2025 के दिल्ली स्वराज संवाद में उन्होंने मंच से बोलकर और गीत गाकर आत्मसम्मान की नई ऊंचाई छुई।
(विकास मेश्राम एक सामाजिक विकास कार्यकर्ता और लेखक हैं, जो आदिवासी संस्कृति, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, जल संरक्षण और समुदाय-आधारित शासन के क्षेत्र में कार्य करते हैं)












