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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » द इंडियन ट्राइबल / उप्लाब्धिकर्ता » बीज, मिट्टी और गीतों के ज़रिये जैविक खेती मिशन पर है यह आदिवासी किसान

बीज, मिट्टी और गीतों के ज़रिये जैविक खेती मिशन पर है यह आदिवासी किसान

ओडिशा के संबलपुर जिले के एक धुरुआ आदिवासी किसान जैविक खेती और लोककला के जरिए देसी धान की किस्मों को संरक्षित कर रहे हैं। निरोज रंजन मिसरा को उन्होंने बताया कि बीज, मिट्टी और संस्कृति मिलकर ही टिकाऊ कृषि का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं

January 17, 2026
The Indian Tribal

महिला किसानों के एक समूह को प्रशिक्षण देते हुए संतोष

भुवनेश्वर

लगभग 60 वर्ष की उम्र में भी संतोष  धुरुआ स्वस्थ, सक्रिय और अडिग हैं—देसी धान की जैविक खेती का जीवंत उदाहरण। जिसे कई लोग जीवन की संध्या कहते हैं, उस दौर में भी वे गांव-गांव घूमकर किसानों को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक उच्च-उपज किस्मों से दूर रहने के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित कर रहे हैं।

एक प्रतिबद्ध संरक्षणवादी के रूप में संतोष  पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देते हैं। वे ओड़िया लोकनाट्य पाला के मंचन के जरिए जैविक खेती और देसी फसल किस्मों के महत्व को दोहों और गीतों में पिरोकर प्रस्तुत करते हैं।

ओडिशा के संबलपुर जिले के जुजोमुरा ब्लॉक अंतर्गत झरझरी गांव के आदिवासी किसान संतोष  धुरुआ ने 1960 के दशक के मध्य हरित क्रांति के बाद आई “अधिक उत्पादन” की चमक-दमक से कभी समझौता नहीं किया। अपने दिवंगत पिता नृपानी धुरुआ से विरासत में मिली लगभग तीन एकड़ भूमि पर वे चिन्ना, सुना हरिणी, कुसुम कली, पिंपुड़ी बासा, कर्पूर कांति और काला चंपा जैसी देसी धान किस्में उगाते हैं।

समय के साथ संतोष  ने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक जैविक पद्धतियों से जोड़कर खेती को एक नया आयाम दिया। जहां उनके पिता केवल गोबर का उपयोग करते थे, वहीं संतोष  ने बीजामृत और जीवामृत जैसे जैविक घोलों के साथ-साथ नीमास्त्र, अग्निास्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे जैव-कीटनाशकों को अपनाया।

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खेत में एक किसान के साथ संतोष (दाएं)

“देसी धान की किस्में प्रायः कीट-रोधी और सूखा-सहिष्णु होती हैं। फिर भी यदि जेंथा, कांडा बिंधा, चकड़ा पोका या पत्र काटा जैसे कीट लगें, तो अलग-अलग अवस्थाओं में नीमास्त्र, अग्निास्त्र और ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जाता है,” धुरुआ आदिवासी समुदाय से आने वाले संतोष  ने The Indian Tribal से कहा।

धुरुआ समुदाय—जिसे दुरुआ, धरुआ और धुर गोंड भी कहा जाता है—मुख्यतः ओडिशा के दक्षिणी जिलों मलकानगिरी, नबरंगपुर और कोरापुट में पाया जाता है, जबकि पश्चिमी ओडिशा के संबलपुर और बलांगीर में इसकी छोटी आबादी है। समुदाय के लोग परजी नामक द्रविड़ भाषा बोलते हैं। परंपरागत रूप से ये कृषक हैं और लघु वन उपज का संग्रह भी करते हैं, जबकि एक वर्ग टोकरी-निर्माण में संलग्न है।

संतोष ने पारिवारिक आर्थिक तंगी के कारण 1976 में पढ़ाई छोड़ दी और पिता के मार्गदर्शन में खेती शुरू की। जैविक खेती की उनकी समझ उस समय और गहरी हुई जब वे 2004-05 से 2010-11 तक अपने ब्लॉक की कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) के अध्यक्ष रहे।

इसी दौरान उनका संपर्क संबलपुर स्थित गैर-सरकारी संगठन ओडिशा देसी बिहाना मंच (ODBM) के संयोजक सरोज कुमार मोहंती से हुआ, जो देसी किस्मों की जैविक खेती को बढ़ावा देता है। ODBM के माध्यम से 2013-14 में उनकी मुलाकात पद्मश्री सम्मानित डॉ. सबरमती टिकी से हुई, जो नयागढ़ जिले के रोहिबांका स्थित गैर-सरकारी संगठन संभाव की सचिव हैं।

इसके बाद 2017-18 में सुंदरगढ़ और बरगढ़ जिलों में ODBM द्वारा आयोजित प्रशिक्षण शिविरों के दौरान संतोष  का संपर्क महाराष्ट्र के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सुभाष पालेकर से हुआ। इन अनुभवों ने उन्हें जैव-इनपुट आधारित खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया, जिसे वे आज भी पूरी निष्ठा से अपना रहे हैं।

“पेजास्त्र बनाने की तकनीक मुझे डॉ. सबरमती से मिली, जबकि अन्य जैविक खाद और जैव-कीटनाशक मैंने डॉ. सुभाष पालेकर से सीखे,” संतोष  ने बताया। ODBM संयोजक सरोज मोहंती के अनुसार, “उन्होंने इन जैव-इनपुट्स के व्यावहारिक उपयोग हमारे गाइसिलेट गांव स्थित केंद्र में सीखे।”

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अपने खेत में संतोष धुरुआ

पेजास्त्र चावल उबालने के बाद बचने वाले गाढ़े पानी (ओड़िया में पेेजा) को 10 से 15 दिन तक रखकर और फिर उसमें गोमूत्र मिलाकर तैयार किया जाता है। इसे कोरी जैसे कीटों से बचाव के लिए धान की फसल पर छिड़का जाता है।

संतोष खेती की शुरुआत बीजों को बीजामृत में उपचारित करके करते हैं, जो गोमूत्र, गोबर, मिट्टी, पानी और चूने से तैयार होता है। 15 से 30 मिनट तक बीज भिगोने के बाद उन्हें छाया में सुखाया जाता है और जीवामृत से समृद्ध खेतों में बोया जाता है। जीवामृत गोबर, गोमूत्र, बेसन, मिट्टी और पानी के मिश्रण को पांच से सात दिन तक किण्वित कर तैयार किया जाता है।

“देसी किस्मों पर कीट कम ही लगते हैं, लेकिन नुकसान शुरू होते ही हम नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र का उपयोग करते हैं। नीमास्त्र नीम और अरखा पत्तियों को गोमूत्र व पानी में मिलाकर बनता है, जबकि ब्रह्मास्त्र नीम, धतूरा, करंज, सीताफल और अरंडी की पत्तियों को गोमूत्र में उबालकर तैयार किया जाता है। अग्निास्त्र का प्रयोग मैं बहुत कम करता हूं,” संतोष  ने कहा।

उनकी पैदावार देसी जैविक खेती की आर्थिक व्यवहार्यता को रेखांकित करती है। जून-जुलाई में बोई गई आधा एकड़ चिन्ना किस्म से नवंबर-दिसंबर में लगभग 11 बस्ता धान मिलता है, जहां एक बस्ता का वजन करीब 75 किलोग्राम होता है। एक एकड़ सुना हरिणी से लगभग 25 बस्ता, जबकि आधा एकड़ कुसुम कली से करीब 12 बस्ता उपज होती है। पिंपुड़ी बासा और कर्पूर कांति की 21 डिसमिल जमीन से क्रमशः चार और दो बस्ता मिलते हैं, वहीं आधा एकड़ काला चंपा से लगभग 13 बस्ता धान प्राप्त होता है।

कर्पूर कांति और पिंपुड़ी बासा से बना चावल 150 रुपये प्रति किलोग्राम बिकता है, जबकि इनके बीज 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकते हैं। अन्य किस्मों के चावल और बीज 50 रुपये प्रति किलोग्राम में बिकते हैं।

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संतोष अन्य किसानों को प्रशिक्षण देते हुए

“घर के उपयोग और अगले मौसम की खेती के लिए पर्याप्त मात्रा रखने के बाद ही मैं चावल और बीज बेचता हूं। इससे मुझे सालाना 50,000 से 70,000 रुपये की आय होती है, हालांकि हर साल दाम बदलते रहते हैं,” पांच सदस्यीय परिवार के मुखिया संतोष  ने कहा।

प्रति एकड़ उनकी लागत 7,000 से 8,000 रुपये के बीच रहती है, जिसमें मजदूरी और परिवहन शामिल हैं। इसके विपरीत, उच्च-उपज किस्मों की खेती करने वाले किसान प्रति एकड़ 22,000 से 35,000 रुपये तक खर्च करते हैं।

ATMA में कार्यकाल के दौरान रासायनिक खेती पर निर्भर किसानों से संवाद ने संतोष  को इसके दीर्घकालिक दुष्प्रभावों के प्रति सचेत किया। उन्हें आशंका हुई कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो ओडिशा के गांवों से देसी किस्में पूरी तरह गायब हो जाएंगी। यहीं से संरक्षण का उनका मिशन शुरू हुआ।

2009 में उन्होंने हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान (MANAGE) में जैविक खेती और देसी फसलों पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण लिया। इसके बाद भुवनेश्वर में कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान के तहत कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया।

ज्ञान से लैस होकर संतोष  ने प्रशिक्षण, प्रेरणा और जागरूकता का निरंतर अभियान शुरू किया। सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर वे संबलपुर, बरगढ़, बलांगीर, झारसुगुड़ा, केओंझर और मयूरभंज जिलों में 7,000 से अधिक किसानों को प्रशिक्षित कर चुके हैं। उनका प्रति-दिन प्रशिक्षण शुल्क 1,000 रुपये है, जिसमें भोजन और आवास शामिल नहीं है।

भुवनेश्वर स्थित हाइलैंड्स एग्रीवेंचर लिमिटेड (HAL) के निदेशक चंदन कुमार साहू ने कहा, “2022 से 2024 के बीच हमारे साथ वरिष्ठ लीड रिसोर्स पर्सन के रूप में काम करते हुए उन्होंने 1,000 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण दिया।”

कई किसानों के लिए संतोष  सिर्फ प्रशिक्षक नहीं, गुरु हैं। “संतोष बाबू मेरे गुरु हैं,” चिनी महुला गांव के आदिवासी किसान रंजीत बाघ ने कहा। “उनके मार्गदर्शन में मैं अपनी पांच एकड़ जमीन पर सुना हरिणी जैसी देसी किस्में उगा रहा हूं।”

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समलेश्वरी पाला परिषद की टीम के साथ संतोष (बैठे हुए बाएं से दूसरे)

खेती के अलावा संतोष  एक कलाकार भी हैं। ओड़िया लोकनाट्य पाला के माध्यम से वे वन संरक्षण और जंगल की आग पर नियंत्रण का संदेश देते हैं। उनकी स्वयं रचित कविता-संग्रह ‘बन्य काव्य’ इन प्रस्तुतियों की आत्मा है।

अपनी पांच सदस्यीय मंडली समलेश्वरी पाला परिषद का नेतृत्व करते हुए संतोष  मृदंग, झांझ और गिनी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तुति देते हैं। गायका (मुख्य गायक) के रूप में वे जैविक खेती और देसी धान पर केंद्रित दोहे अक्सर शामिल करते हैं।

“मैं पाला की प्रस्तुति में कई बार जैविक खेती और देसी धान पर दोहे जोड़ता हूं। हर महीने हमारी टीम 10 से 12 कार्यक्रम करती है और विभाग हमें प्रति कार्यक्रम 7,000 रुपये का भुगतान करता है,” संतोष  ने बताया। संतोष धुरुआ के लिए खेती का भविष्य सिर्फ खेत और बीजों में नहीं, बल्कि संस्कृति और समुदाय में भी निहित है—जहां मिट्टी की देखभाल होती है, बीज सहेजे जाते हैं और गीत संदेश को आगे ले जाते हैं।

Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri Root Woot | Online Puja Samagri

In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

Saura children to be imparted education in own language

In a novel move, the Gajapati district administration in Odisha has launched an initiative titled 'Aame Padhibaa Aama Bhasare' (we will learn in our own language) to impart pre-school education to children belonging to the Saura tribal community, one of the oldest Scheduled Tribes, in their own language. The programme will cover 30 anganwadi centres in Gumma and Rayagada blocks of Gajapati district which has around 90 per cent of the Saura population. In the first phase of the initiative, the State government has decided to implement the programme in six tribal-majority districts namely Gajapati, Malkangiri, Nabarangpur, Rayagada, Kandhamal and Keonjhar. The children will be taught in indigenous languages such as Koya (Malkangiri), Gondi (Nabarangpur), Kuvi (Rayagada) and Saura (Gajapati).
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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