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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » द इंडियन ट्राइबल / उप्लाब्धिकर्ता » इंजीनियरिंग ग्रेजुएट ने पर्यटन गाइड बन आदिवासी जीवन को दुनिया के समक्ष लाने का बीड़ा उठाया है

इंजीनियरिंग ग्रेजुएट ने पर्यटन गाइड बन आदिवासी जीवन को दुनिया के समक्ष लाने का बीड़ा उठाया है

उनके पिता आधिकारिक दौरों पर बस्तर के सुदूर गांवों में जाया करते थे। पिता के जरिए ही आदिवासियों में उनकी रुचि जगी। आज वह पर्यटकों को आदिवासी संस्कृति से रूबरू करा रही हैं और पर्यटन को लेकर महिलाओं का नजरिया बदलना चाहती हैं । इस बारे में उन्होंने The Indian Tribal से विस्तृत बातचीत की

December 30, 2024
Bastar Touris,

पर्यटकों के एक दल के साथ बिंदु

बस्तर

वर्षों पहले बी. बिंदु के पिता जगदलपुर में आकर बस गए थे। इसके बाद फिर कभी उन्होंने बस्तर की जीवनरेखा कही जाने वाली इद्रावती नदी को पार करने के बारे में नहीं सोचा। बस्तर दुनिया भर में जीवंत आदिवासी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र का अपना अलग आकर्षण है।

बीते दिनों को याद करते हुए बिंदु कहती हैं कि जब वह छत्तीसगढ़ के इंडस्ट्रीयल हब भिलाई में रहती थीं तो बहुत से लोग जगदलपुर को जंगलपुर कहकर पुकारते थे। बाहरी लोग खासकर जो यहां की जीवनशैली से नावाकिफ थे, उन्हें ऐसा था कि बस्तर का जिला मुख्यालय जगदलपुर एक जंगली और अव्यवस्थित, अविकसित इलाका है।

बिंदु बताती हैं, ‘मेरे पिता ने यहां 1980 के दशक में काम करना शुरू किया था। उस दौर में इस इलाके में बहुत कम सडक़ें थीं। हर तरफ जंगल ही जंगल नजर आते थे।’ लेकिन बिंदु ने इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकॉम स्ट्रीम में अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने गृहनगर लौटने का फैसला किया। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्हें अपनी जड़ों यानी गृह क्षेत्र से बहुत अधिक लगाव था। हालांकि धीरे-धीरे आदिवासियों में उनकी रुचि जगने लगी, क्योंकि उनके पिता आधिकारिक दौरों पर बस्तर के दूरदराज के गांवों में आया-जाया करते थे और वहां के लोगों के बारे में रोचक बातें बताया करते थे।

बिंदु ने The Indian Tribal से बातचीत में बताया, ‘दूसरी बात, जब मैंने 2013 के आसपास अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, तो उस समय इलेक्ट्रॉनिक्स की मांग बाजार में कम थी। इसलिए, मैंने कुछ अलग करने की ठानी। मेरे माता-पिता ने भी मुझे प्रोत्साहित किया।’

Bastar Culture
धुरवा आदिवासियों द्वारा मछली पकड़ने में उपयोग किये जाने वाले बांस से बने आइटम देखते हुए बिंदु

वह कहती हैं, ‘मैंने जीवन में स्वयं को स्थापित करने के लिए कई विकल्प तलाशे। उस समय तक मैं बस्तर के बारे में बहुत अधिक नहीं जानती थी यानी उसकी वास्तविक पहचान से अनजान थी। मेरे पिता राज्य बिजली बोर्ड में कार्यरत थे और इस क्षेत्र के बारे में जो कुछ भी जाना, वह सब अपने पिता के जरिये ही सुना और समझा।’ बस्तर में बिंदु की जीवन यात्रा 2016 में जगदलपुर स्थित ‘अनएक्सप्लोर्ड बस्तर’ नामक एक ट्रैवल स्टार्ट-अप से शुरू हुई।

आज उत्साही उद्यमी बिंदु अपने जीवन में बहुत आगे जा चुकी हैं। ‘कल्चर देवी’ के नाम से अपना खुद का स्टार्ट-अप खड़ा करने वाली बिंदु को अब पर्यटकों के साथ यहां के रहन-सहन और सांस्कृतिक विरासत की गुत्थियां सुलझाते देखा जा सकता है। वह बताती हैं, ‘बस्तर के अलावा मैंने नागालैंड की आदिवासी संस्कृति को भी विस्तार से जाना और समझा है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लोक कथाओं एवं मिथकों में बड़ी दिलचस्पी है।’

बिंदु ने अपने स्टार्ट-अप का नाम देवी क्यों रखा, इस बारे में वह समझाती हैं, ‘देवी भारतीय समाज में महिला रूप का प्रतिनिधित्व करती है। भले ही भारतीय समाज में महिलाओं पर अनेक प्रतिबंध थोपे जाते हैं, लेकिन सच यही है कि महिलाएं ही अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम करती हैं।’

इसके अलावा, बस्तर की इष्टदेवी भी देवी दंतेश्वरी ही हैं। बस्तर की आदिवासी संस्कृति में पूजे जाने वाले अन्य देवताओं में जलनी माता का नाम सबसे खास है। उन्हें समर्पित कई पवित्र उपवन भी हैं। ओडिशा से बेहद प्रेरित बिंदु कहती हैं कि बस्तर की रथ यात्रा में निश्चित रूप से आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है, लेकिन यहां जुलाई में आयोजित होने वाले गोंचा उत्सव का कुछ अलग ही आकर्षण है, जिसे धुरवा जनजाति के लोग बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। धुरवा आदिवासी बांस और सूखे ताड़ के पत्तों से नकली पिस्तौल तुपकी बनाते हैं, जो बहुत लोकप्रिय है। बिंदु पर्यटकों को 6,500 रुपये में चार दिन तक गोंचा उत्सव घुमाती हैं और यहां की सांस्कृतिक विरासत को दिखाती हैं।

Bastar Culture
धुरवा आदिवासी महिलाएं तुपकी बेचते हुए

बस्तर जिले में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने का श्रेय पूर्व कलेक्टर अमित कटारिया और रजत बंसल को जाता है। वरना इससे पहले लोगों को इस जगह के बारे में बहुत कम ही जानकारी थी। बिंदु ने बताया कि पर्यटन की दृष्टि से अविकसित बस्तर क्षेत्र में उनका अब तक का सफर बहुत ही शानदार रहा, क्योंकि उन्होंने सबसे ज्यादा आजीविका सृजन के लिए संघर्षरत स्थानीय समुदायों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने बताया, ‘वह जब भी बस्तर आती तो काफी हद तक उनका दौरा बस्तर-केंद्रित ही रहता, जिसमें वह ज्यादा से ज्यादा क्षेत्र के आदिवासियों से मिलती-जुलती और उन्हें समझने की कोशिश करती, ताकि उनका भविष्य बेहतर हो सके।’

एक महिला पर्यटन गाइड के रूप में बिंदु चाहती हैं कि अधिक से अधिक महिलाएं उनकी इस यात्रा में शामिल हों। वह कहती हैं, ‘अभी भी अकेली महिला यात्रियों का घर से बाहर निकलना बहुत कम होता है। ज़्यादातर महिलाएं अपने घर के पुरुषों के साथ ही यात्रा या पर्यटन के लिए निकलती हैं। मैं इस ट्रेंड, इस हवा का रुख बदलना चाहती हूं।’

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In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

Saura children to be imparted education in own language

In a novel move, the Gajapati district administration in Odisha has launched an initiative titled 'Aame Padhibaa Aama Bhasare' (we will learn in our own language) to impart pre-school education to children belonging to the Saura tribal community, one of the oldest Scheduled Tribes, in their own language. The programme will cover 30 anganwadi centres in Gumma and Rayagada blocks of Gajapati district which has around 90 per cent of the Saura population. In the first phase of the initiative, the State government has decided to implement the programme in six tribal-majority districts namely Gajapati, Malkangiri, Nabarangpur, Rayagada, Kandhamal and Keonjhar. The children will be taught in indigenous languages such as Koya (Malkangiri), Gondi (Nabarangpur), Kuvi (Rayagada) and Saura (Gajapati).
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Tags: AchieversBastarHindiScheduled TribeThe Indian TribalTribes of India
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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