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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » खेलकूद » ओडिशा के इस आदिवासी युवक की बात ही कुछ और है

ओडिशा के इस आदिवासी युवक की बात ही कुछ और है

वुशु, किकबॉक्सिंग और थाई बॉक्सिंग में खूब नाम कमाने के बाद 17 वर्षीय भुइयां लडक़ा अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाने के लिए इंडोनेशियाई पेनकैक सिलाट की ओर मुड़ गया है। क्या हैं उसके इरादे, बता रहे हैं निरोज रंजन मिश्र

March 12, 2024
Tribal Teenager Odisha, Martial Arts | The Indian Tribal

चंद्र अपने रजत पदक के साथ

भुवनेश्वर

उसने वुशु में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता। किकबॉक्सिंग में हाथ आजमाया और राज्य स्तरीय टूर्नामेंट में गोल्ड झटका। एक बार फिर ट्रैक बदला और थाई बॉक्सिंग की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल प्राप्त किया।एक जगह ठहरना तो जैसे उसने सीखा ही नहीं,  अब वह पेनकैक सिलाट में हुनर दिखा रहा है और यहां भी सिल्वर मेडल हासिल कर चांदी सी चमक बिखेरी। 

ओडिशा के सुंदरगढ़ स्थित इस्पात नगरी राउरकेला के रहने वाले चंद्र शेखर माझी से मिलिए। दीपिका स्कूल के 12वीं कक्षा के छात्र इस भुइयां आदिवासी लडक़े की चाल, पहनावे और खेल में कई मार्शल आर्ट का शानदार मिश्रण देखने को मिलेगा। 

एक पुलिस उप-निरीक्षक का सबसे छोटा बेटा चंद्र शेखर मार्शल आर्ट की कई विद्याओं में अपने हुनर का लोहा मनवा चुका है, लेकिन 17 साल का यह लडक़ा अब पूरे जोश-खरोश के साथ पेनकैक सिलाट पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है।

इंडोनेशिया का पेनकैक सिलाट एक फाइटिंग यानी लड़ाई का खेल है, जिसमें मार्शल आर्ट की विभिन्न शैलियों का सम्मिश्रण है। इसमें प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को मारना, पकड़ना और फेंकना जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके हराना होता है। यही नहीं, इस खेल में खिलाड़ी को कुछ विशेष प्रकार के हथियारों का उपयोग करने की अनुमति भी होती है। खास यह कि इस खेल में पूरे शरीर का इस्तेमाल होता है यानी शरीर के किसी भी हिस्से से सामने वाले खिलाड़ी पर वार किया जा सकता है और कहीं भी हमला किया जा सकता है। कभी पेनकैक सिलाट की उत्पत्ति आत्मरक्षा के साधन के रूप में हुई और समय के साथ यह एक प्रतिस्पर्धी खेल बन गया। यह अब भारत सहित कई दक्षिण एशियाई देशों में खेला जाने वाला लोकप्रिय खेल है।

Martial Arts | Odisha Sports
चंद्र (काली जैकेट में) अपने कोच जितेंद्र कुमार यादव (लाल जैकेट में) के साथ अभ्यास करते हुए

चंद्र शेखर माझी से जब कोई उसकी महत्वाकांक्षा के बारे में सवाल करता है तो वह झट से जवाब देता है, ‘मेरा पेनकैक सिलाट एक दिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूम मचाएगा।’

चंद्र शेखर ने The Indian Tribal से बातचीत में कहा, ‘जब मैं राउरकेला के सेंट गॉर्जियस स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ता था, तब मैंने वुशु खेलना शुरू किया। उसके बाद मैंने किकबॉक्सिंग में अपनी पकड़ बनाई और राउरकेला स्थित जेके मार्शल आर्ट्स अकादमी के संस्थापक कोच जितेंद्र कुमार यादव की देखरेख में दोनों प्रकार की मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण लिया।’

चंद्र शेखर के पिता गोलबदन माझी के अनुसार, ‘रिंग के अंदर अनगिनत मुकाबलों में अपनी काबिलियत साबित करने वाला उनका बेटा निहायत आलसी और देर से सोने वाला लडक़ा रहा है।’

स्टील सिटी से सटे रायबागा थाने में तैनात उप-निरीक्षक गोलबदन माझी ने कहते हैं, ‘चंद्र शेखर पढ़ाई में बिल्कुल फिसड्डी था। खिलाड़ियों वाले गुण तो उसमें थे ही नहीं- उठने-बैठने में पूरी तरह आलसी। इसलिए मैंने उसे जल्दी उठने और कोच जितेंद्र कुमार यादव की देखरेख में मार्शल आर्ट का अभ्यास करने के लिए मजबूर किया।’

चंद्र शेखर का परिवार सुंदरगढ़ जिले के पद्मपुर गांव का रहने वाला है, लेकिन अब यह राउरकेला में रहता है, क्योंकि बड़े भाई रिपु सूदन माझी स्टील सिटी के पास पानपोष में सहायक कृषि अधिकारी हैं। चंद्र शेखर ने The Indian Tribal से कहा, ‘राउरकेला ने उन्हें कोच जितेंद्र कुमार यादव और शरत कुमार दास के नेतृत्व में विभिन्न मार्शल आर्ट के कौशल सीखने और उन्हें निखारने का मौका दिया। यह सब उन्हें अपने पैतृक गांव में नहीं मिल सकता था।’

Martial Arts | Odisha Sports
चंद्र (बाएं ओर) टूर्नामेंट में भाग लेते हुए

चंद्र ने बताया, ‘जहां जितेंद्र सर मुझे सप्ताह में तीन दिन प्रशिक्षण देते हैं, वहीं शरत सर राज्य और राष्ट्रीय स्तर की हर बड़ी प्रतियोगिता से पहले मेरे कौशल को और निखारने और मेरी तकनीकों को सुधारने के लिए अपना बहुमूल्य समय देते हैं।’

चंद्र ने सब-जूनियर खिलाड़ी के तौर पर 2015 में राउरकेला में स्टेट ताइक्वांडो/किकबॉक्सिंग/कराटे चैंपियनशिप में पदार्पण किया था। यहां किकबॉक्सिंग प्रतियोगिता में उसने स्वर्ण पदक जीता था। वर्ष 2016 में झारसुगुड़ा में ओडिशा राज्य किकबॉक्सिंग चैंपियनशिप में उसी श्रेणी में खेलते हुए उसने फिर यही उपलब्धि दोहराई जब शीर्ष स्थान हासिल कर स्वर्ण पदक पर कब्जा किया।

हालांकि, 2016 में भुवनेश्वर में सब-जूनियर वर्ग में स्टेट वुशु चैंपियनशिप में उसे कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। केवल दो साल के प्रशिक्षण के साथ इस नौसिखिया खिलाड़ी ने 2017 में राज्य की राजधानी में राज्य वुशु चैम्पियनशिप में फिर कांस्य पदक जीता। चंद्र ने बताया, ‘मैं वुशु और किकबॉक्सिंग एक साथ सीख रहा था, लेकिन मैंने किकबॉक्सिंग का अधिक अभ्यास किया, जिससे मुझे स्वर्ण पदक मिला।’

कोच जितेंद्र भी कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त करते हैं। सुंदरगढ़ योगासन स्पोर्ट्स एसोसिएशन के महासचिव जितेंद्र कहते हैं, ‘चंद्रा का झुकाव किकबॉक्सिंग की तरफ ज्यादा था। इसलिए उसने वुशू पर कम ध्यान दिया और उसका अभ्यास कम किया। इसलिए उसे इस प्रतियोगिता में कांस्य पदक ही मिला। बाद में उसने मार्शल आर्ट की अन्य शैलियां सीखने के लिए वुशु को पूरी तरह त्याग दिया।’

जब चंद्र थाई बॉक्सिंग में खेल रहा था और उसमें उसने अपनी पकड़ बनाई, तो अंगुल में ऑल ओडिशा बीजू पटनायक मेमोरियल थाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप-2021 और वर्ष 2022 में ओडिशा स्टेट थाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप में अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। दोनों ही प्रतियोगिताओं में उसने स्वर्ण पदक जीता।

सुंदरगढ़ पेनकैक सिलाट एसोसिएशन के महासचिव और राउरकेला स्थित मार्शल आर्ट अकादमी के निदेशक, कोच शरत कुमार दास ने कहा, ‘चंद्र अंगुल में राज्य स्तरीय थाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप शुरू होने से पहले प्रतिदिन लगभग पांच घंटे अभ्यास करता था। इस वजह से उसकी गर्दन में भी मोच आ गई। इसके बावजूद इस प्रतिस्पर्धा में वह सोना लेकर आया। यह उसकी कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।’

यह अलग बात है कि वह गोवा में नेशनल थाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप (जूनियर-बॉयज), 2021 में स्वर्ण पदक जीतने से चूक गया और केवल चांदी से संतोष करना पड़ा। चंद्र ने कहा, ‘मैं स्वर्ण पदक के लिए हुए मुकाबले में महाराष्ट्र के खिलाड़ी से हार गया, क्योंकि मैंने ऐन मौके पर अपनी गति और लय खो दी थी। हां, अपने तेलंगाना प्रतिद्वंद्वी को हराकर मैंने रजत पदक जीता।’ उसने कहा, ‘मैंने 2022 में अमृतसर में आयोजित नेशनल थाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि कोच शरत सर ने मुझे केवल पेनकैक सिलाट पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी थी।’ चंद्र शेखर अब केवल पेनकैक सिलाट खेल रहा है। नतीजा यह हुआ कि 2022 में बारगढ़ में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में उसे पोडियम पर चढऩे का मौका मिला यानी उसने स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके बाद 2023 में उसने खोरधा में राज्य-स्तरीय चैंपियनशिप में अपने कौशल और रणनीति का शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड जीतकर झंडे गाड़ दिए। हालांकि, 2023 में पटना में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में वह उत्तराखंड के खिलाड़ी से हार गया और सोना उसके हाथ से फिसल गया। 

पटना में राष्ट्रीय चैंपियनशिप-2023 में सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान अपने महाराष्ट्र के खिलाड़ी के तेज स्वीप के कारण चंद्र शेखर के घुटने में गंभीर चोट लगी। इसके बावजूद वह रिटायर हर्ट नहीं हुआ और पूरी हिम्मत के साथ मुकाबला जारी रखा। अंतत: महाराष्ट्र के खिलाड़ी को परास्त कर चांदी पर कब्जा जमाया। 

कोच शरत कहते हैं, ‘पटना में फाइनल मुकाबले के दौरान एक स्वीप में उत्तराखंड के खिलाड़ी ने उसके घुटने में चोट मार दी। इससे चंद्र को बाहर होना पड़ा। हालांकि, चंद्र में ताकत, फुर्ती और कौशल आदि वह सब कुछ है, जो उसे एक दिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने में मदद करेगा। उसे निरंतर अभ्यास करना है और अधिक से अधिक अनुभव जुटाना है। उसकी ऊंचाई (170 सेमी) उसे किसी भी खिलाड़ी के खिलाफ उसका प्लस पाइंट है।’ 

उन्होंने कहा, ‘हमारे अन्य खिलाड़ियों की तरह ही चंद्र शेखर को इंटरलॉकिंग मैट पर अभ्यास करना होगा, जिस पर मार्शल आर्ट के खिलाड़ी खेलते हैं। एक चटाई की कीमत लगभग 1100 रुपये होती है और राष्ट्रीय चैंपियनशिप में ऐसी लगभग 30 मैट का उपयोग किया जाता है। जब हमारे खिलाड़ी मैट पर खेलने जाते हैं, तो वे असहज महसूस करते हैं। लेकिन हम महंगी मैट खरीदने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि इस खेल में लगभग 30 मैट की आवश्यकता होती है, जो हमारे बजट से बाहर की बात है। इसलिए, सरकार को हमारे राज्य के चंद्र शेखर जैसे पदक विजेता खिलाड़ियों के लिए मैट और बॉडी गार्ड जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करनी चाहिएं, ताकि अन्य खिलाड़ी भी उभर सामने आएं और राज्य का नाम रोशन करें।’

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For the past four-and-a-half years, we have travelled across India to bring to our readers the ‘Unknown, Lesser-Known Tribal Life’, which rarely finds space in the mainstream media.

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आईएचएम रांची की ‘मडुआ लड्डू’ कृति को मिला कॉपीराइट पंजीकरण

इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग टेक्नोलॉजी एंड अप्लाइड न्यूट्रिशन, रांची (आईएचएम रांची) ने शोध, नवाचार और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में एक और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार के कॉपीराइट कार्यालय ने संस्थान द्वारा विकसित “मडुआ लड्डू” शीर्षक कृति को कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अंतर्गत औपचारिक रूप से पंजीकृत किया है। इसके लिए आवेदन 16 मई 2026 को दाखिल किया गया था तथा पंजीकरण प्रमाणपत्र 22 जुलाई 2026 को जारी किया गया। यह कृति आईएचएम रांची के प्राचार्य डॉ. भूपेश कुमार, वरिष्ठ व्याख्याता रवि कुमार तथा व्याख्याता रजनीश कुमार सिंह द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है। झारखंड के घर-घर में लोकप्रिय मडुआ आधारित पारंपरिक व्यंजन को सुव्यवस्थित, मानकीकृत और वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजीकृत विधि में प्रस्तुत करना इस कार्य की प्रमुख विशेषता है। मडुआ, जिसे रागी या फिंगर मिलेट के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड की खाद्य संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पोषण की दृष्टि से उपयोगी होने के साथ-साथ यह कम पानी में उगने वाली जलवायु-अनुकूल फसल भी है। ऐसे में मडुआ आधारित उत्पादों के वैज्ञानिक विकास और दस्तावेजीकरण से स्थानीय खाद्य परंपराओं के संरक्षण, पोषण संवर्धन, उद्यमिता और रोजगार सृजन की नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। आईएचएम रांची लंबे समय से झारखंड के स्थानीय अनाजों, जनजातीय खाद्य परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक आतिथ्य शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहा है।
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