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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » विविध » आईटीडीए ने बदल दी किसानों की किस्मत

आईटीडीए ने बदल दी किसानों की किस्मत

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के दूरदराज गांवों के किसान सरकारी योजनाओं के जरिए न केवल बेहतर फसलें ले रहे हैं, बल्कि उनसे मोटा मुनाफा कमाकर आर्थिक रूप से भी मजबूत हो रहे हैं। बता रहे हैं निरोज रंजन मिश्रा

January 21, 2024
द इंडियन ट्राइबल | आईटीडीए परियोजना का बड़ा लाभ: कृषि उपज में वृद्धि

आईटीडीए परियोजना का बड़ा लाभ: कृषि उपज में वृद्धि

भुवनेश्वर

एकीकृत जनजातीय विकास एजेंसी (आईटीडीए) ने सुंदरगढ़ जिले में मुंडा, ओरांव और मुंडारी जैसी जनजातियों से ताल्लुक रखने वाले किसानों की जिंदगी बदल दी है। वे इससे खासे उत्साहित हैं कि इस सरकारी एजेंसी की मदद से उनकी कम उपज देने वाली भूमि में अब टमाटर की फसल लहलहा रही है। टमाटर के रूप में अपनी इस सफलता से प्रेरित होकर अब वे हर साल तीन महीनों- सितंबर, अक्टूबर और नवंबर में अलग-अलग तरह की सब्जियां उगा कर मोटा मुनाफा हासिल कर रहे हैं। 

कभी कम वर्षा के कारण खाली पड़े रहने वाले खेत अब इतने उपजाऊ हो चुके हैं कि हर साल तीन महीनों में ही बहुआयामी फसलों से वे औसतन 40,000 से 45,000 रुपये तक लाभ कमा रहे हैं। 

द इंडियन ट्राइबल | एक किसान अपनी खेती दिखते हुए
एक किसान अपनी खेती दिखते हुए

पहले आदिवासी अपनी पहाड़ी जमीन पर बेतरतीब ढंग से किसी तरह टमाटर उगाते थे। ढलान वाली भूमि होने के कारण टमाटर और उनके पौधों की शाखाएं थोड़ी सी बारिश या हवा में नीचे धरती पर गिर जातीं अथवा टूट जाती थीं। टूटे हुए टमाटर वहीं पौधों की जड़ों में सड़ जाते थे, जिसका सीधा असर फसल पर पड़ता था और उत्पादन 30 फीसदी तक घट जाता था। हालांकि, तीन साल पहले आईटीडीए के हस्तक्षेप से न केवल उत्पादन में बढ़ोतरी हुई, बल्कि बारिश या तेज हवा से होने वाला नुकसान भी लगभग शून्य हो गया है।

आईटीडीए आजीविका विशेषज्ञ प्रसन्ना दास ने The Indian Tribal  से बातचीत में बताया कि हमने यहां के किसानों को तार के जाल उपलब्ध कराए । टमाटर के खेतों में ये जाल लकड़ी की डंडियों के सहारे इस तरह बांधे गए कि केवल पौधों की जड़ें ही जमीन में गहराई तक चली गईं, जबकि उनकी शाखाएं और फल जाल के साथ ऊपर फैल गए। इससे वे धरातल के संपर्क में नहीं आए और बारिश या तेज हवा की स्थिति में टूटने और फिर पौधों की जड़ों में सडऩे से बच गए। इस प्रक्रिया को अपनाने से किसानों की फसलों में हर बार होने वाला नुकसान लगभग 90 फीसदी तक कम हो गया।

आईटीडीए ने कुंडेडीहा में 100 किसानों के साथ प्रयोग के तौर पर यह परियोजना शुरू की थी। प्रत्येक किसान ने अपनी खेती की जमीन में से 50 डेसीमल पर इस परियोजना के तहत काम शुरू किया, जिसके अप्रत्याशित परिणाम सामने आए। 

गांव के चुक्कू लाकड़ा खुशी से चिल्लाते हुए कहते हैं कि वह उत्पादन की मात्रा तो नहीं बता सकते, लेकिन इस परियोजना से हुए लाभ से काफी संतुष्ट हैं। उनकी पत्नी भी करेंसी नोट लहराकर खुशी का इजहार करते हुए अपने पति की बढ़ी कमाई से काफी उत्साहित दिखीं। 

The Indian Tribal | The Integrated Tribal Development Agency (ITDA) taught the Munda, Oraon, Mundari farmers ways to increase their farm yield
चुक्कू लकड़ा का खेत
The Indian Tribal | The Integrated Tribal Development Agency (ITDA) taught the Munda, Oraon, Mundari farmers ways to increase their farm yield
चुक्कू लकड़ा की पत्नी अपने पति की कमाई दिखाती हैं

जब यह प्रयोग टमाटर पर सफल हुआ तो किसानों ने इसे दूसरी फसलो पर भी आजमाना शुरू कर दिया और इस तरह जल्द ही फूलगोभी, पत्तागोभी, परवल जैसी तमाम सब्जियों की खेती की जाने लगी। सुरक्षित फसल उत्पादन से किसानों को खासा लाभ हो रहा है। 

आदिवासी किसानों की इस सफलता ने आसपास के बलिया, किंद्रो और लछादा जैसे गांवों के अन्य आदिवासी और गैर-आदिवासी किसानों को भी इसी विधि से फसल उत्पादन के लिए प्रेरित किया। 

कुंडेदिहा में आईटीडीए परियोजना को अपनाने वाले दस प्रगतिशील किसानों में शामिल दौत एक्का दावा करते हैं कि वह अपनी 2.5 एकड़ जमीन पर कतारों में टमाटर, भिंडी, परवल और कद्दू उगाते हैं। इससे उन्हें हर साल तीन महीनों के दौरान 2 लाख से रु. 2.5 लाख की कमाई हो जाती है। 

प्रसन्ना कहते हैं कि उनके प्रयासों से प्रभावित होकर ही ओडिशा कृषि विभाग ने आदिवासी किसानों को बाजरा, जटांगी (एक प्रकार का तेल बीज) और तिल के बीज उपहार में दिए हैं, ताकि वे इनका भी उत्पादन शुरू करें। इसी तरह, बागवानी विभाग ने कुंडेदिहा में मनरेगा के तहत भी एक अन्य परियोजना शुरू की है।

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मुख्यमंत्री सोरेन से मुंडा समाज का अनुरोध

झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन से आज मुंडा समाज के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात कर उन्हें अवगत कराया कि तमाड़ विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत बुंडू अंचल की छह पंचायतों के 18 गांवों के ऑनलाइन खतियान में जाति का नाम ‘मुंडा’ के स्थान पर ‘स्वासी’ अंकित है, जिसके कारण संबंधित ग्रामीणों को विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से ऑनलाइन खतियान में जाति के नाम के गलत अंकन में सुधार कराते हुए ‘स्वासी’ के स्थान पर ‘मुंडा’ दर्ज कराने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल की समस्याओं को गंभीरतापूर्वक सुना तथा इस संबंध में नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की दिशा में पहल करने का आश्वासन दिया।
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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