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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » द इंडियन ट्राइबल / स्वास्थ्य » कोंध आदिवासी वैद्यों की पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली को बचाने की कवायद

कोंध आदिवासी वैद्यों की पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली को बचाने की कवायद

पारम्परिक विधि से इलाज करने वाले चिकित्सक, जिन्हें ओडिशा में जानकार भी कहा जाता है, आदिवासी वैद्य परम्परा को संरक्षित, विस्तारित करने के लिए सामूहिक प्रयास कर रहे हैं। नीरोज रंजन मिश्रा ने इसकी उपयोगिता बनाए रखने के लिए उनकी योजना के बारे में विस्तार से बात की।

July 8, 2022
The Indian Tribal Health, Odisha News - herbal medicines of tribal vaidyas

कोंध आदिवासी वैद्यों की पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली को बचाने की कवायद

आदिवासी समुदायों में कभी बहुत प्रचलित और प्रभावी रही वैद्य अथवा प्राकृतिक चिकित्सा प्रद्धति अब दम सी तोड़ रही है। आधुनिक चिकित्सा का सुलभ हो जाना और स्वास्थ्य-स्वच्छता के पैमानों में बदलाव इसका प्रमुख कारण रहा है, लेकिन आज भी वैद्य परम्परा के महत्व को कम करके नहीं आका जा सकता। इसी के मद्देनजर ओडिशा के कोंध आदिवासी समुदाय के वैद्य अथवा जानकार अपनी पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली को बचाने, प्रचार करने के लिए ठोस उपायों की जरूरत को महसूस कर रहे हैं। अब वे पारम्परिक वैद्य चिकित्सा को संरक्षित करने के लिए वार्षिक स्तर पर सम्मेलनों का आयोजन कर रहे हैं।

पखवाड़े भर चलने वाले इस प्रकार के सम्मेलन के दौरान ये अनुभवी वैद्य एक विशाल संयुक्त नॉलेज सेंटर स्थापित करने के उद्देश्य से अपने तमाम संसाधनों का प्रयोग करते हैं।

इस प्रकार का पहला सम्मेलन 2015-16 में कंधमाल के जी उदयगिरि ब्लॉक के सारंगडा में एसोसिएशन फॉर रूरल एरिया सोशल मॉडिफिकेशन, इम्प्रूवमेंट एंड नेस्लिंग (एआरएएसएमआईएन) के तत्वावधान में आयोजित किया गया था। इस पहले सम्मेलन में 30 जानकार जुटे थे।

अब इस प्रकार के सम्मेलन कंधमाल के 240 गांवों और बोलांगीर एवं कालाहांडी के 60-60 गांवों में आयोजित किए जा रहे हैं।

सभ्यता के आरंभ से ही वैद्य अथवा प्राकृतिक चिकित्सा प्रद्धति समाज का अभिन्न हिस्सा रही है। इन जानकार व्यक्तियों यानी ज्ञानवान वैद्यों ने अपने इलाज करने के प्रभावी देसी तौर-तरीकों से जनजातियों के बीच हमेशा ही बड़ा सम्मान कमाया है।

हालांकि, समय के साथ बदलाव नहीं किए जाने के कारण अब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इस पारम्परिक चिकित्सा पद्धति पर भारी पड़ता जा रहा है। बहुत से तंत्र-मंत्र तो विलुप्त ही हो चुके हैं।

The Indian Tribal - Tribal Herbal medicines, Medical science

बोलांगीर के गंभीरीगुड़ा गांव के रहने वाले एक वैद्य रघुनाथ डेहरिया अपने पूर्वजों द्वारा शिकार करने के लिए मंत्र के जरिए सक्रिय किए गए हथियार का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वह तो अब गायब ही हो गया है। यह हथियार कमोबेश ऑस्ट्रेलिया में आदिवासियों द्वारा इस्तेमाल किए गए बुमेरांग से मिलता-जुलता था। लेकिन, अब सम्मेलनों के जरिए फिर इस परम्परा को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। वैद्य रघुनाथ दावा करते हैं कि इन आदिवासी सम्मेलनों में जाकर उन्होंने स्वयं 15 से अधिक हर्बल दवाओं का ज्ञान हासिल किया है।

बोलंगीर के गबरभासा निवासी एक और जानकार किता डेहरिया सम्मेलनों में भाग लेने वाले लोगों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं। वह कहते हैं कि अपने गांव में ग्रामीणों की ओर से पृथ्वी, पहाड़ों और पेड़ों की पूजा करने के लिए अनुष्ठान करने वाले वैद्य अथवा जानकार ही इन सम्मेलनों में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सम्मेलन अब जिला स्तर पर आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में वैद्य जुटते है।

डेहरिया ने एक गैर-जानकार को अपने इलाज के तरीके के बारे में बताने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि वह कहते हैं कि यदि किसी मरीज की हालत बेहद गंभीर है तो हम उसके इलाज को कभी भी लंबा नहीं चलाते हैं। हम उसे फौरन नजदीकी अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि सम्मेलनों से न केवल वैद्य परम्परा का विस्तार हो रहा है, बल्कि इलाज के मामले में जानकारों को उनकी सीमाओं का एहसास कराने में भी मददगार साबित हो रहे हैं।

एआरएएसएमआईएन के सचिव बीआर राउतरे कहते हैं कि उनके सम्मेलन सिर्फ एक गंभीर विचार-विमर्श का ही मंच नहीं हैं, यहां दावतों और मौज-मस्ती का भी पूरा इंतजाम किया जाता है। कुल मिलाकर आदिवासी डॉक्टरों के लिए यह 15 दिन का मिलन समारोह जैसा है।

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We have done this without external funding, driven only by our conviction that India’s tribal heritage deserves to be documented with dignity, depth and authenticity.

If you like our work, and if it has informed, inspired or helped you understand India’s tribal/indigenous communities better, we invite you to become a part of this mission.

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Update

आईएचएम रांची की ‘मडुआ लड्डू’ कृति को मिला कॉपीराइट पंजीकरण

इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग टेक्नोलॉजी एंड अप्लाइड न्यूट्रिशन, रांची (आईएचएम रांची) ने शोध, नवाचार और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में एक और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार के कॉपीराइट कार्यालय ने संस्थान द्वारा विकसित “मडुआ लड्डू” शीर्षक कृति को कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अंतर्गत औपचारिक रूप से पंजीकृत किया है। इसके लिए आवेदन 16 मई 2026 को दाखिल किया गया था तथा पंजीकरण प्रमाणपत्र 22 जुलाई 2026 को जारी किया गया। यह कृति आईएचएम रांची के प्राचार्य डॉ. भूपेश कुमार, वरिष्ठ व्याख्याता रवि कुमार तथा व्याख्याता रजनीश कुमार सिंह द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है। झारखंड के घर-घर में लोकप्रिय मडुआ आधारित पारंपरिक व्यंजन को सुव्यवस्थित, मानकीकृत और वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजीकृत विधि में प्रस्तुत करना इस कार्य की प्रमुख विशेषता है। मडुआ, जिसे रागी या फिंगर मिलेट के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड की खाद्य संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पोषण की दृष्टि से उपयोगी होने के साथ-साथ यह कम पानी में उगने वाली जलवायु-अनुकूल फसल भी है। ऐसे में मडुआ आधारित उत्पादों के वैज्ञानिक विकास और दस्तावेजीकरण से स्थानीय खाद्य परंपराओं के संरक्षण, पोषण संवर्धन, उद्यमिता और रोजगार सृजन की नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। आईएचएम रांची लंबे समय से झारखंड के स्थानीय अनाजों, जनजातीय खाद्य परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक आतिथ्य शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहा है।
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ओडिशा के PVTGs की अनूठी विवाह व्यवस्था: वधू मूल्य नहीं, सामाजिक साझेदारी का प्रतीक

by The Indian Tribal
August 3, 2026

उत्कल विश्वविद्यालय के अध्ययन में सामने आया है कि वधू मूल्य की परंपरा यहाँ दहेज से बिल्कुल अलग है और इसका उद्देश्य रिश्तों को मजबूत बनाना तथा सामाजिक उत्तरदायित्व साझा करना है। The Indian Tribal की रिपोर्ट।भाग-1

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Tags: The Indian TribalThe Indian Tribal HealthThe Indian Tribal NewsThe Indian Tribal Scheduled Tribes of IndiaTribal news
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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