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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » द इंडियन ट्राइबल / खान-पान » क्या आप चखना चाहेंगे लाल चींटियों से बनी बस्तर की मशहूर चापड़ा चटनी?

क्या आप चखना चाहेंगे लाल चींटियों से बनी बस्तर की मशहूर चापड़ा चटनी?

छत्तीसगढ़ की लाल चींटी का स्वाद भले अब प्रसिद्ध हो रहा है, लेकिन कई राज्यों में यह लंबे समय से लोकप्रिय है। अभिजीत शुक्ला बता रहे हैं कि आदिवासी लोग सामान्य सर्दी, बुखार, पीलिया, आंतों की समस्याओं, खांसी को ठीक करने एवं भूख बढ़ाने के लिए चापड़ा चटनी खाते हैं। मलेरिया समेत कई रोगों के इलाज में तो यह रामबाण है

May 15, 2022
How Chapda Chutney Put Bastar On The Celeb Chef’s Menu

सेलिब्रिटी शेफ गॉर्डन रैमसे को खुश करना आसान नहीं है, लेकिन एक आदिवासी चटनी ने न केवल उनका दिल जीत लिया, बल्कि अब वह उनके मेनू में भी शामिल हो गई है।

बस्तर की चटपटी चापड़ा चटनी एक ऐसी ही डिश है, जो ओडिशा और झारखंड में भी खूब लोकप्रिय है, लेकिन रैमसे की यात्रा के बाद से छत्तीसगढ़ की यह डिश विश्वभर में प्रसिद्ध हो गई।

Tribal Food | Red Ant Chapda Chutney Preparation
बस्तर की चटपटी चापड़ा चटनी की तैयारी

ग्रामीण लोग लाल चीटियों को टमाटर, धनिया, लहसुन, अदरक, मिर्च, नमक और थोड़ी सी चीनी के साथ पीसते हैं। इस तरह तैयार होती है चिकनी, नारंगी रंग की स्वादिष्ट चापड़ा चटनी। इसे अमूमन ऐसे ही खाते हैं, लेकिन और अधिक स्वाद के लिए इसे तेल और प्याज में भूनकर परोसा जा सकता है।

चटनी की विशेष यूएसपी लाल चींटियां (ओकोफिला स्मार्गडीना) है। बस्तर के कोंडागांव के बहिगांव गांव के एक युवा श्यामलाल नेताम कहते हैं कि मृत चीटियों और उनके अंडों को सुखाकर उन्हें ओखली में या चपटे पत्थर (सिल) पर पीसा जाता है।

अधिक स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाने के लिए इसमें टमाटर, धनिया, लहसुन, अदरक, मिर्च, स्वादनुसार नमक और थोड़ी चीनी मिलाई जाती है और सबको साथ-साथ पीसकर चिकना, नारंगी पेस्ट बना लिया जाता है। यही है बस्तर की लोकप्रिय चापड़ा चटनी। श्यामलाल बताते हैं कि वैसे तो इसे इसी प्रकार खाया जाता है, लेकिन लोग तेल और प्याज के साथ भूनकर भी परोसते हैं।

चीटियों में फार्मिक एसिड का उच्च स्तर होने एवं तमाम मसाले पडऩे से यह चटनी बेहद गर्म हो जाती है। यह बस्तर के आदिवासी व्यंजनों का एक लोकप्रिय और महत्वपूर्ण हिस्सा है। आदिवासी विक्रेता भी इस चटनी को मडई या साप्ताहिक बाजारों में साल के पत्तों से बने छोटे शंकु में रखकर बेचते हैं और लोग बड़े चाव से खरीदकर खाते हैं।

नेताम का कहना है कि गोंडी जनजाति की बोली गोंडी में चापड़ा का अर्थ पत्ती की टोकरी होता है। इससे मुराद वे घोंसले होते हैं जो चींटियां साल के पत्तों को एक साथ बुनकर बनाती हैं।

Bastar’s red-hot Chapda Chutney is a delicacy that’s popular in Odisha and Jharkhand too, but Celebrity chef Gordon Ramsay’s visit has made it Chhattisgarh’s very own claim to fame
मलेरिया समेत कई रोगों के इलाज में यह रामबाण है।

शोध से पता चलता है कि आदिवासी लोग सामान्य सर्दी, बुखार, पीलिया, आंतों की समस्याओं, खांसी को ठीक करने एवं भूख बढ़ाने के लिए चापड़ा चटनी खाते हैं। मलेरिया समेत कई रोगों के इलाज में यह रामबाण है।

इस चींटी प्रजाति का नर भयंकर तरीके से काटता है जिससे बहुत दर्द होता है। इसलिए इन चीटियों और उनके अंडों को एकत्र करना भी अपने आप में एक दुरुह कार्य है। नेताम बताते हैं कि ग्रामीण दोपहर की चिलचिलाती गर्मी में घोंसलों के पास जाते हैं। उस समय ये चींटियां आराम कर रही होती हैं।

घोंसला तोडक़र इन्हें एकत्र करने से पहले नर चींटों को कुचल दिया जाता है, क्योंकि वे घोंसलों के चारों ओर सख्त सुरक्षात्मक घेरा बनाए हुए होते हैं। जिस टहनी पर घोंसला होता है, उस पूरी टहनी को तोडक़र गर्म पानी में डाल दिया जाता है ताकि चींटियां मर जाएं। उसके बाद खाना पकाने की प्रक्रिया शुरू होती है।

स्वाद के अलावा यह चटनी कई बीमारियों में रामबाण है। शोध से पता चलता है कि आदिवासी लोग सामान्य सर्दी, बुखार, पीलिया, आंतों की समस्याओं, खांसी को ठीक करने एवं भूख बढ़ाने के लिए चापड़ा चटनी खाते हैं। नेताम के अनुसार, आदिवासी इलाकों में आम बीमारी मलेरिया को रोकने में लाल चींटी का सेवन काफी मदद करता है।

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आईएचएम रांची की ‘मडुआ लड्डू’ कृति को मिला कॉपीराइट पंजीकरण

इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग टेक्नोलॉजी एंड अप्लाइड न्यूट्रिशन, रांची (आईएचएम रांची) ने शोध, नवाचार और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में एक और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार के कॉपीराइट कार्यालय ने संस्थान द्वारा विकसित “मडुआ लड्डू” शीर्षक कृति को कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अंतर्गत औपचारिक रूप से पंजीकृत किया है। इसके लिए आवेदन 16 मई 2026 को दाखिल किया गया था तथा पंजीकरण प्रमाणपत्र 22 जुलाई 2026 को जारी किया गया। यह कृति आईएचएम रांची के प्राचार्य डॉ. भूपेश कुमार, वरिष्ठ व्याख्याता रवि कुमार तथा व्याख्याता रजनीश कुमार सिंह द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है। झारखंड के घर-घर में लोकप्रिय मडुआ आधारित पारंपरिक व्यंजन को सुव्यवस्थित, मानकीकृत और वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजीकृत विधि में प्रस्तुत करना इस कार्य की प्रमुख विशेषता है। मडुआ, जिसे रागी या फिंगर मिलेट के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड की खाद्य संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पोषण की दृष्टि से उपयोगी होने के साथ-साथ यह कम पानी में उगने वाली जलवायु-अनुकूल फसल भी है। ऐसे में मडुआ आधारित उत्पादों के वैज्ञानिक विकास और दस्तावेजीकरण से स्थानीय खाद्य परंपराओं के संरक्षण, पोषण संवर्धन, उद्यमिता और रोजगार सृजन की नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। आईएचएम रांची लंबे समय से झारखंड के स्थानीय अनाजों, जनजातीय खाद्य परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक आतिथ्य शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहा है।
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