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Home » द इंडियन ट्राइबल / हिंदी » विविध » अनूठा स्कूल लगा रहा आदिवासी बच्चों के सपनों को पंख

अनूठा स्कूल लगा रहा आदिवासी बच्चों के सपनों को पंख

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के सुरम्य चंदेनार गांव में स्थित स्कूल गोंड और हल्बी जातियों के बच्चों को वैकल्पिक शिक्षा का सबसे सुलभ और बेहतरीन माध्यम है। विस्तृत जानकारी लाई हैं दीपान्विता गीता नियोगी

November 20, 2023
The Indian Tribal | Children learning counting through stones

बच्चे पत्थरों के माध्यम से गिनती सिखते हुए (सभी तस्वीरें - प्रणित सिम्हा)

चांदनेर

माओवादी प्रभावित आदिवासी जिले दंतेवाड़ा में शिक्षाविद् प्रणीत सिम्हा अपना ड्रीम प्रोजेक्ट सपनों की शाला चला रहे हैं। स्कूल यहां के बच्चों के सपनों को पंख लगा रहा है। बस्तर उपमंडल के इस क्षेत्र में अपनी तरह का अनूठे स्कूल शुरू करना कोई आसान बात नहीं थी, लेकिन बच्चों की शिक्षा से जुड़े सामाजिक संगठन बचपन बनाओ के जरिए सरकारी स्कूलों में काम करने के अनुभव ने उन्हें इसमें खासी मदद की। आज वह सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं।

सिम्हा बताते हैं कि शुरुआत में वह पोर्टा केबिन स्कूलों से जुड़े थे, लेकिन जल्दी ही उनसे बाहर आ गए। जब उन्होंने इन आवासीय विद्यालयों में काम किया, तो एहसास हुआ कि ये स्कूल हिंसा के जवाब में बच्चों के लिए अस्थायी व्यवस्था का हिस्सा हैं। सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा जैसे स्थानों पर पोर्टा केबिन स्कूलों में लगभग 35,000 ऐसे छात्र-छात्राएं पढ़ रहे हैं, जो अपने घरों से विस्थापित हो गए हैं। 

सिम्हा ने महसूस किया कि सबसे महत्वपूर्ण बात ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्कूलों को मजबूत करना है। सपनों की शाला में आदिवासी छात्रों को विभिन्न प्रकार की गतिविधियों के साथ अलग तरह से शिक्षा प्रदान की जाती है। शिक्षाविद् सिम्हा का मानना है कि आदिवासी बच्चों के लिए नियमित स्कूल संरचना प्रासंगिक नहीं है।

The Indian Tribal | Children engrossed in their classes
बच्चे अपनी कक्षाओं में तल्लीन हैं

The Indian Tribal से बात करते हुए सिम्हा कहते हैं कि आदिवासी बच्चे खुले माहौल यानी बिना किसी प्रतिबंध के बड़े होते हैं। इसलिए, सख्त अनुशासन वाले सामान्य स्कूल उनके लिए कारगर नहीं हो सकते। बस्तर जैसे क्षेत्रों के संदर्भ में बच्चों के बड़ी संख्या में स्कूल छोडऩे के पीछे गरीबी मुख्य कारण नहीं है, बल्कि भाषा जैसे अन्य अवरोध भी होते हैं। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षण का माध्यम हिंदी है, लेकिन आदिवासी बच्चे तो घर पर हल्बी या गोंडी बोलते हैं। 

उन्होंने दावा किया कि चूंकि भाषा के कारण शिक्षकों और छात्रों के बीच स्वस्थ संवाद नहीं हो पाता,  इसलिए छात्र पाठ याद करने में पिछड़ जाते हैं। ऐसे माहौल में शिक्षा हासिल करना उनके लिए कड़ा संघर्ष है।

एक और बात,  सरकारी शिक्षण का पाठ्यक्रम आदिवासी सांस्कृतिक पहचान से अलग है। उदाहरण के लिए जब अंग्रेजी में अक्षर पढ़ाए जाते हैं, तो ए का मतलब एप्पल और बी का मतलब बॉल बताया जाता है। वास्तव में, शहरों में जरूर बच्चे इन चीजों के बारे में जानते हैं, लेकिन बस्तर के अंदरूनी क्षेत्रों में कई आदिवासी छात्र सेब से परिचित ही नहीं होते। इस प्रकार उनके लिए सेब की पहेली सुलझाना अक्षर सीखने से बड़ी चुनौती बन जाता है।

The Indian Tribal | Students bond with nature
विद्यार्थी का प्रकृति से जुड़ाव
The Indian Tribal | Sapno ki Shala (left); Children learning counting through stones (Right)
सपनों की शाला

वह याद करते हुए बताते हैं कि एक बार कक्षा पांच के छात्रों को कंप्यूटर के बारे में समझाते हुए उन्होंने कहा था कि कोई भी इसका उपयोग करके ट्रेन टिकट बुक कर सकता है, लेकिन कई छात्रों को यह बात समझने में कठिनाई हुई, क्योंकि उन्हें कंप्यूटर या ट्रेन के बारे में अधिक जानकारी ही नहीं थी।

सपनों की शाला का माहौल बिल्कुल अलग है। यह स्कूल पूरे भारत की शिक्षा व्यवस्था द्वारा अपनाई जाने वाली वार्षिक समयसारिणी का पालन नहीं करता। बल्कि, यह अमुस जैसे आदिवासी त्योहारों और आजीविका की जरूरतों जैसे बुआई, कटाई और महुआ संग्रह के सीजन को ध्यान में रखते हुए संचालित होता है, क्योंकि इन कामों में बच्चे भी पूरे दिन अपने परिवार के साथ हाथ बंटाते हैं। इस कारण वे कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाते।

सिम्हा यह भी बताते हैं कि सपनों की शाला में हर बुधवार को बच्चों की उपस्थिति कम होती है, क्योंकि वे गांवों में लगने वाले हाट-बाजारों में जरूरत का सामान खरीदने या छोटे-मोटे सामान बेचने जाते हैं और इस कारण स्कूल नहीं आ पाते। सपनों की शाला में इन मुद्दों को समझने और जनजातीय मूल्यों को बरकरार रखते हुए आधुनिक शिक्षा प्रणाली से बच्चों को जोडऩे का प्रयास किया जाता है। 

The Indian Tribal | A child immersed in drawing her imagination
एक बच्ची अपनी कल्पना को चित्रित करने में डूबी हुई

वर्तमान में स्कूल सामुदायिक भवन में चलाया जाता है और स्थानीय लोग इसमें पूरा सहयोग कर रहे हैं। यहां 40 बच्चे पढ़ते हैं। यह स्कूल कक्षा 1 से 7 तक के बच्चों के लिए है। यह राज्य सरकार के पाठ्यक्रम के तहत संचालित हो रहा है। स्कूल में चार पूर्णकालिक और तीन अंशकालिक शिक्षक हैं। यही नहीं, बच्चों को बर्तन बनाने की कला सिखाने के लिए गांव से एक कुम्हार भी आते हैं। 

सपनों की शाला में कार्यरत एक शिक्षक लोकेश कुंजाम 2018 से यहां विज्ञान और पर्यावरण पढ़ाते हैं। वह बताते हैं कि हमारे यहां हर रोज पढ़ाई से पहले एक घंटे तक असेंबली होती है। यह सामान्य प्रार्थना से अलग कार्यक्रम है। इसमें बच्चे बारी-बारी से गाते हैं, कहानियां सुनाते हैं और कुछ अपने अभिनय कौशल का प्रदर्शन भी करते हैं। यानी बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर पूरा जोर दिया जाता है। लोकेश कहते हैं कि बच्चों द्वारा अपने शिक्षक चुनने का भी हक दिया जाता है। यह अलग तरह का प्रयोग है। 

शिक्षक कुंजाम ने बताया कि सभी शिक्षक आमतौर पर शनिवार को ही यह योजना तैयार कर लेते हैं कि उन्हें पूरे सप्ताह क्या-क्या और कैसे पढ़ाना है। वे छात्रों को घेरे हुए हमेशा कक्षाओं के अंदर नहीं बैठते। वह बच्चों को एकल अंक सिखाने के लिए पत्थरों का उपयोग करते हैं।बच्चों में सामाजिक मसले सुलझाने की कला विकसित करने के लिए बाल संसद की अवधारणा भी शुरू की गई है। इसके तहत बच्चे यह तय करते हैं कि झगड़ा होने पर क्या करना है और शौचालय जैसे स्कूल से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों को कैसे हल करवाना है। शिक्षकों का पूरा प्रयास यही रहता है कि बच्चों के साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए। यदि छात्र फर्श पर बैठते हैं, तो शिक्षक भी वैसा ही करते हैं, वे स्वयं कुर्सी पर नहीं बैठते।

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In Numbers

49.4 %
Female Literacy rate of Scheduled Tribes

Update

NCST notice to Odisha Govt over tribal girl’s death, mass food poisoning

The National Commission for Scheduled Tribes (NCST) has issued notices to Mayurbhanj District Collector, Superintendent of Police, and the Secretary of the State ST & SC Development Department in connection with the tragic death of a 12-year-old tribal girl and the hospitalisation of over 100 students following a mass food poisoning at a government-run residential school earlier this month. The NCST has demanded a detailed Action Taken Report (ATR) within seven days. "The Commission, under the powers vested in it by the Constitution, has directed the authorities to submit full facts of the incident and preventive measures taken. Failure to comply may lead to the issuance of a summons and the invocation of civil court powers," an official statement from the NCST stated. The tragic incident took place on April 12 at the Kakabandh Ashram School in the Rasgovindpur block where students reportedly fell ill after consuming a meal consisting of pakhala (fermented rice), aloo masala, and saag. Parents of the victims alleged that the food served was stale and leftover from the previous day. The tragedy led to outrage in the area and led to clashes between local tribal communities and police personnel during the funeral procession. Chief Minister Mohan Charan Majhi ordered a high-level probe, following which the school's headmaster, Jayant Kumar Panigrahi, was placed under suspension for gross negligence. The State government also announced an ex-gratia compensation of Rs Seven lakh for the family of the deceased girl.
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The Indian Tribal is India’s first bilingual (English & Hindi) digital journalistic venture dedicated exclusively to the Scheduled Tribes. The ambitious, game-changer initiative is brought to you by Madtri Ventures Pvt Ltd (www.madtri.com). From the North East to Gujarat, from Kerala to Jammu and Kashmir — our seasoned journalists bring to the fore life stories from the backyards of the tribal, indigenous communities comprising 10.45 crore members and constituting 8.6 percent of India’s population as per Census 2011. Unsung Adivasi achievers, their lip-smacking cuisines, ancient medicinal systems, centuries-old unique games and sports, ageless arts and crafts, timeless music and traditional musical instruments, we cover the Scheduled Tribes community like never-before, of course, without losing sight of the ailments, shortcomings and negatives like domestic abuse, alcoholism and malnourishment among others plaguing them. Know the unknown, lesser-known tribal life as we bring reader-engaging stories of Adivasis of India.

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